Advertisement

ट्रेन में भीख क्यों मांग रहे हैं प्रोफेसर साहब, जानकर आपको यकीन नहीं होगा !

4:26 pm 20 Nov, 2017

Advertisement

भारत में एक प्रोफेसर की मासिक आमदनी एक लाख रुपए से ऊपर होती है। हालांकि, इतनी बड़ी कमाई के बावजूद एक प्रोफेसर ट्रेनों में भीख मांगने का काम करते हैं। आपको यह जानकर हैरत हो रही होगी। हालांकि, यह सच है। नेक उद्येश्य के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। और कहते हैं कि अगर उद्येश्य नेक हो तो कोई भी काम छोटा नहीं होता। ये साबित कर दिया है प्रोफ़ेसर संदीप देसाई ने।

प्रोफेसर देसाई भी नेक काम ही कर रहे हैं। वह अपने लिए भीख नहीं मांगते, बल्कि गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए भीख मांग रहे हैं। एक बार सुनने में यह जरूर अटपटा और अचंभित करने वाली बात लग सकती है। प्रोफ़ेसर देसाई ने ग्रामीण इलाकों में गरीब बच्चों की शिक्षा के लिए धनराशि जुटाने के लिए भीख मांगने का रास्ता चुना और एक बड़ी रकम जुटा ली है। वह अब तक करीब 50 लाख रुपए जुटा चुके हैं। संदीप को मुंबई की लोकल में भीख मांगते देखा जा सकता है।

एनडीटीवी रिपोर्ट के अनुसार:

“साल 2012 में संदीप मुंबई की स्थानीय ट्रेनों में जाने-पहचाने चेहरा बन गए थे। महाराष्ट्र और राजस्थान के गरीब बच्चों को अंग्रज़ी माध्यम की शिक्षा देने के नाम पर वे यात्रियों से भीख मांग कर पैसे जमा किया करते थे। एक बार भीख मांगने के जुर्म में उन्हें हर्जाना भी भरना पड़ा था।”


Advertisement
आपको जानकर हैरानी होगी कि संदीप ने 50 लाख से ज्यादा की धनराशि मात्र 2 साल में ही जुटा लिए थे। एनडीटीवी से बात करते हुए यात्री रौनक महेता ने कहा कि वे लगातार 2 साल से इस शख्स को रोज देखता हूं। अगर ये सच्चा नहीं होता तो रोज नहीं दिखता।

मीडिया से बात करते हुए संदीप बताते हैं:

“भारत में बहुत से बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें उचित शिक्षा नहीं मिल पाती है। ऐसे बच्चों के लिए यदि हम कुछ कर पाते हैं तो इससे बड़ी खुशी की बात और कुछ नहीं हो सकती।”

लगातार प्रयासों से संदीप महाराष्ट्र के यवतमाल ज़िले में एक और उदयपुर के सिपुर, सदकडी और नैजहार गांव में तीन स्कूल खोलने में सफल रहे, जिनमें से यवतमाल और उदयपुर का स्कूल सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त है। मुंबई के संदीप देसाई मरीन इंजीनियर थे और उन्होंने मैनेजमेंट कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया था। वह समाज के लिए कुछ बेहतर करना चाहते थे। यही वजह है कि उन्होंने अपने इस आइडिया को उन्होंने सबसे पहले अपने दोस्त नजरुल इस्लाम को बताया, जिन्होंने ने उनका साथ भी दिया।

परोपकार के काम से जो आत्मसंतोष मिलता है वो किसी और काम से नहीं मिलता। जानकार अच्छा लगता है कि हमारे बीच आज भी ऐसे लोग मौजूद हैं।

Advertisement


  • Advertisement