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Ravish Kumar Calls Hackers Cowards And Believes They Belong To A Political Party

Published on 12 December, 2016 at 3:43 pm By

Reacting to the recent hacking of his Twitter account, journalist Ravish Kumar of NDTV, has termed the hackers coward.

He claimed that they sit at the headquarters of some political party, and then commit acts of cowardice. He also doubts that they will be caught.


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Recently, Twitter accounts of NDTV journalists Barkha Dutt and Ravish Kumar were hacked by a group called Legion and data such as email and passwords were made public.

Barkha Dutt cobrapost

Barkha Dutt cobrapost

In a blog titled “hum fakir nahin hain jo jhola lekar chal de,” he said, “Whoever is trying to scare journalists are actually trying to scare the public.”

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“If you want to remain safe in these difficult times, you don’t just need to change your passwords, you also need to change your political beliefs from time to time,” he added.

On December 10 night, Legion also hacked senior journalist Barkha Dutt’s Twitter account as well. Earlier, Congress Vice President Rahul Gandhi and industrialist Vijay Mallya’s accounts were hacked.


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Claiming that they use Twitter as ‘a means to reach the public’, the hackers revealed that they would be targeting Lalit Modi’s account next. They also warned that if any one of them is arrested, they would leak over one TB of confidential data.

Here’s The Original Text From Ravish Kumar’s Blog:

“मेरे हमसफ़र दोस्तों….

किसी को मेरे ईमेल और फोन में क्या दिलचस्पी हो सकती है वो हैक करने की योजना बनाएगा। शनिवार की मध्यरात्रि मेरी वरिष्ठ सहयोगी बरखा दत्त का ईमेल हैक कर लिया गया। उनका ट्वीटर अकाउंट भी हैक हुआ। उसके कुछ देर बाद मेरा ट्वीटर अकाउंट हैक कर लिया गया। उससे अनाप शनाप बातें लिखीं गईं। जब मैंने एक साल से ट्वीट करना बंद कर दिया है तब भी उसका इतना ख़ौफ़ है कि कुछ उत्पाति नियमित रूप से गालियां देते रहते हैं। ये सब करने में काफी मेहनत लगती है। एक पूरा ढांचा खड़ा किया जाता होगा जिसके अपने ख़र्चे भी होते होंगे। ढाई साल की इनकी मेहनत बेकार गई है मगर उस डर का क्या करें जो मेरा नाम सुनते ही इनके दिलों दिमाग़ में कंपकपी पैदा कर देता है। ज़रूर कोई बड़ा आदमी कांपता होगा फिर वो किसी किराये के आदमी को कहता होगा कि देखता नहीं मैं कांप रहा हूं। जल्दी जाकर उसके ट्वीटर हैंडल पर गाली दो। दोस्तों, जो अकाउंट हैक हुआ है उस पर मेरा लिखा तो कम है, उन्हीं की बदज़ुबान और बदख़्याल बातें वहां हैं। मैं चाहता हूं कि वे मुझसे न डरें बल्कि मेरा लिखा हुआ पढ़ें।

मेरी निजता भंग हुई है। मेरा भी ईमेल हैक हुआ है। बरखा दत्त की भी निजता भंग हुई है। मैं सिर्फ रवीश कुमार नहीं हूं। एक पत्रकार भी हूं। कोई हमारे ईमेल में दिलचस्पी क्यों ले रहा है। क्या हमें डराने के लिए? आप बिल्कुल ग़लत समझ रहे हैं। ये आपको याद दिलाया जा रहा है कि जब हम इन लोगों के साथ ऐसा कर सकते हैं तो आपके साथ क्या करेंगे याद रखना। पत्रकारों को जो भी ताकतें डराती हैं दरअसल वो जनता को डराती हैं। अगर हमारी निजता और स्वतंत्रता का सवाल आपके लिए महत्वपूर्ण नहीं है तो याद रखियेगा एक दिन आपकी भी बारी आने वाली है। जिस लोकतंत्र में डर बैठ जाए या डरने को व्यापक मंज़ूरी मिलने लगे वो एक दिन ढह जाएगा। आपका फर्ज़ बनता है कि इसके ख़िलाफ़ बोलिये। डरपोकों की बारात बन गई है जो किसी मुख्यालयों के पीछे के कमरे में बैठकर ये सब काम करते हैं। अभी तो पता नहीं है कि किसकी हरकत है। जब राहुल गांधी के बारे में ठोस रूप से पता नहीं चल सका तो हम लोगों को कौन पूछ रहा है। आख़िर वो कौन लोग हैं, उन्हें किसका समर्थन प्राप्त है जो लगातार हमारे ट्वीटर अकाउंट पर आकर गालियां बकते हैं। अफवाहें फैलाते हैं। आपको बिल्कुल पता करना चाहिए कि क्या यह काम कोई राजनीतिक पार्टी करती है। ऐसा काम करने वाले क्या किसी राजनीतिक दल के समर्थक हैं। पता कीजिए वर्ना आपका ही पता नहीं चलेगा।

आप सोचिये कि आपका पासवर्ड कोई चुरा ले। आपके ईमेल में जाकर ताक झांक करे तो क्या आपको ठीक लगेगा। क्या आप ऐसी साइबर और राजनीतिक संस्कृति चाहेंगे? आपका जवाब हां में होगा तो एक दिन आपके साथ भी यही होगा। हैकरों ने बता दिया है कि भारत साइबर सुरक्षा के मामले में कमज़ोर है। हैकिंग पूरी दुनिया में होती है लेकिन यहां की पुलिस भी इसके तार को जोड़ने में अक्षम रहती है। साइबर सुरक्षा के नाम पर अभी तक दो चार चिरकुट किस्म के नेताओं के ख़िलाफ़ लिखने वालों को ही पकड़ सकी है। वो नेता चिरकुट ही होता है जो अपने ख़िलाफ़ लिखी गई बातों के लिए किसी को अरेस्ट कराता है या अरेस्ट करने की संस्कृति को मौन सहमति देता है। जब हम लोगों के अकाउंट हैक किये जा सकते है तो ज़रूरत है कि लोगों को बेहतर तरीके साइबर सुरक्षा के मामले में जागरूक किया जाए। गांव देहात के लोगों के साथ ऐसा हुआ तो उन पर क्या बीतेगी। हमारा तो लिखा हुआ लुटा है, अगर ग़रीब जनता की कमाई लुट गई तो मीडिया ही नहीं जाएगा। ज़्यादा से ज्यादा किसी रद्दी अख़बार के कोने में छप जाएगा जिसके पहले पन्ने पर सरकार का ज़रूरत से ज़्यादा गुणगान छपा होगा।

मैं ढाई साल से इस आनलाइन सियासी गुंडागर्दी के बारे में लिख रहा हूं। आख़िर वे कितने नकारे हो सकते हैं जो किसी का ईमेल हैक होने पर खुशी ज़ाहिर कर रहे हैं। क्या अब हमारी राजनीति और फोकटिया नेता ऐसे ही समर्थकों के दम पर घुड़की मारेंगे। ये जिस भी दल के समर्थक या सहयोगी है उसके नेताओं को चाहिए कि अपने इन बीमार सपोर्टरों को डाक्टर के पास ले जाएं। इनकी ठीक से क्लास भी लें कि ये ढाई साल से मेरे पीछे मेहनत कर रहे हैं और कुछ न कर पाये। अगर किसी नेता को दिक्कत है तो ख़द से बोले न, ठाकुर की फौज बनाकर क्यों ये सब काम हो रहा है। अगर इतना ही डर हो गया है तो छोड़ देंगे। लिखा तो है कि अब छोड़ दूंगा। ऐश कीजिए। चौराहे पर चार हीरो खड़ा करके ये सब काम करने वाले इतिहास के दौर में हमेशा से रहे हैं। इसलिए भारतीय साहित्य संस्कृति में चौराहा बदमाश लंपटों के अड्डों के रूप में जाना जाता है। हमारी भोजपुरी में कहते है कि लफुआ ह, दिन भर चौक पर रहेला। ज़ाहिर है अकाउंट हैक होने पर इन जश्न मनाने वाले लोगों के बारे में सोच कर मन उदास हुआ है।ये घर से तो निकलते होंगे मां बाप को बता कर कि देश के काम में लगे नेताओं का काम करने जा रहे हैं। लेकिन वहां पहुंच कर ये गाली गलौज का काम करते हैं। आई टी सेल गुंडो का अड्डा है। दो चार शरीफों को रखकर बाकी काम यही सब होता है। लड़कियां ऐसे लड़कों से सतर्क रहें। इनसे दोस्ती तो दूर परिचय तक मत रखना। वो लोग भी बीमार हैं जो ऐसे लोगों का समर्थन करते हैं।


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तो दो बाते हैं। एक तो किसी का भी अकाउंट हैक हो सकता है। हैक करने वाला अक्सर दूर देश में भी बैठा हो सकता है। आई टी सेल इस तरह का काम करने वालों को ठेका भी दे सकता है. आपको ताज़िंदगी मालूम न चलेगा। मैं तो यह भी सोच कर हैरान हूं कि आख़िर वो कौन लोग होंगे जो बरखा दत्त का ईमेल पढ़ना चाहेंगे। मेरा ईमेल पढ़ना चाहेंगे। अगर इतनी ही दिलचस्पी है तो घर आ जाइये। कुछ पुराने कपड़े हैं, धोने के लिए दे देता हूं। जाने दीजिए, समाज में ऐसे लोग हमेशा मिलेंगे लेकिन आप जो खुद को चिंतनशील नागरिक समझते हैं, इस बात को ठीक से समझिये। हमारे बाहने आपको डराया जा रहा है। हमारा क्या है। फिर से नया लिख लेंगे। आप नहीं पढ़ेंगे तो भी लिख लेंगे। हम फ़कीर नहीं हैं कि झोला लेकर चल देंगे। हम लकीर हैं। जहां खींच जाते हैं और जहां खींच देते हैं वहां गहरे निशान पड़ जाते हैं। सदियों तक उसके निशान रहेंगे। मैं किसी के बोलने देने का इंतज़ार नहीं करता हूं। जो बोलना होता है बोल देता हूं। कुलमिलाकर निंदा करते हैं और जो भी भीतर भीतर गुदगुदा रहे हैं उन्हें बता देते हैं कि आप एक बेहद ख़तरनाक दौर में रह रहे हैं। आपके बच्चे इससे भी ख़तरनाक दौर में रहेंगे। पासवर्ड ही नहीं, राजनीतिक निष्ठा भी बदलते रहिए। साइबर और सियासत में सुरक्षित रहने के लिए आप इतना ही कर सकते हैं। इतना कर लीजिए।”

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