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‘विद्रोही कवि’ के रूप में विख्यात काजी नजरुल इस्लाम के बारे में ये 15 बातें आप यकीनन नहीं जानते होंगे

10:05 am 26 May, 2018

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काजी नजरुल इस्लाम की चर्चा के बिना बांग्ला साहित्य पर बात नहीं हो सकती है। साहित्य की दुनिया में उनका एक अलग ही स्थान है। नजरुल विद्रोही कवि के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने अपने क्रांतिगीतों माध्यम से समाज की पुरानी अवधारणाओं को तोड़ा है। कवि नजरुल ने अपने गीतों में लगातार धार्मिक चरमपंथ की आलोचना की है। वह धार्मिक सदभावना में विश्वास रखने वाले व्यक्ति थे साथ ही मानवतावाद के प्रवक्ता भी। अपनी विशिष्ट शैली की वजह से वह भारतीय साहित्य में अमर हो गए। विद्रोह कवि के बारे में हम आपके जो कुछ बताने जा रहे हैं, उस बारे में आपको संभवतः नहीं पता होगा।

 

1. पश्चिम बंगाल में जन्में थे

 

 

कवि नजरुल का जन्म 24 मई, 1899 को पश्चिम बंगाल के चुरुलिया में हुआ था। उनके पिता काजी फकीर अहमद एक स्थानीय मस्जिद में इमाम थे।

 

2. उन्हें अजीब नाम से बुलाया जाता था

 

 

बांग्लाभाषी समाज में बच्चों के आमतौर पर दो नाम होते हैं। एक का इस्तेमाल दस्तावेज में होता है और दूसरे का इस्तेमाल घर में प्यार से बुलाने के लिए। नजरुल को घर में प्यार से दुखु मियां के नाम से बुलाते थे। इसका मतलब तो आप समझ ही गए होंगे।

 

3. शुरुआती शिक्षा मदरसे में हुई

 

 

उनकी शुरुआती शिक्षा मदरसे में हुई, जहां वह कुरान, इस्लामिक दर्शन और हदीथ पढ़ने जाते थे। हालांकि, पिता की असामयिक मौत की वजह से उनकी पढ़ाई वाधित हो गई। महज 10 साल की आयु में नजरुल पिता की जगह मस्जिद में इमाम बना दिए गए।

 

4. बांग्ला साहित्य से लगाव

 

 

मस्जिद में मन नहीं लगा तो नजरुल अपने चाचा के थिएटर ग्रुप के साथ रहने लगे। यह थिएटर ग्रुप अलग-अलग जगहों पर नाटकों का मंचन करता था। इसी दौरान युवा नजरुल बांग्ला और संस्कृत साहित्य के संपर्क में आए।

 

5. पौराणिक कथाओं का प्रभाव

 

 

कवि नजरुल जल्द ही हिन्दू पौराणिक कथाओं के मुरीद हो गए। उन्होंने पुराण, महाभारत, रामायण आदि से प्रभावित होकर व्यापक अध्ययन किया। इन कथाओं के आधार पर उन्होंने कई नाटक भी लिखे।

 

6. आगे की पढ़ाई

 

 

आगे की पढ़ाई के लिए कवि नजरुल ने नाटक ग्रुप छोड़ दिया। परिजनों ने उनका दाखिला एक अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय में करवाया लेकिन बाद में वे इसकी फीस देने में असमर्थ थे। यही वजह है कि उन्हें स्कूल छोड़ देना पड़ा और वह एक रसोइए के रूप में काम में लग गए। हालांकि, नजरुल तमाम विपत्तियों से लड़ते हुए आगे बढ़ना जानते थे। वर्ष 1914 में उन्होंने एक बार फिर स्कूल में पढ़ाई शुरू की। वह बांग्ला, संस्कृत, हिन्दुस्तानी शास्त्रीय संगीत, अरबी और फारसी साहित्य पढ़ने लगे।

 

7. ब्रिटिश आर्मी से जुड़े

 

 

हालांकि, नजरुल ने 10वीं तक की पढ़ाई की थी, लेकिन वह बोर्ड की परीक्षा में शामिल नहीं हो सके। वह 18 साल की उम्र में ही ब्रिटिश आर्मी से जुड़ गए। आर्मी से जुड़ने के दो कारण थे। एक तो वह राजनीति में रुचि रखते थे, साथ ही उन्हें एडवेन्चर बेहद पसंद था।

 

8. पहली कृति का प्रकाशन

 


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नजरुल की पहली कविता मुक्ति वर्ष 1919 में बंगीय मुसलमान साहित्य पत्रिका में प्रकाशित हुई। इसके एक साल बाद ही उनका पहला उपन्यास बंधोन हारा भी प्रकाशित हुआ।

 

9. बने विद्रोह कवि

 

 

वर्ष 1922 में उन्हें विद्रोही कवि के उपनाम से नवाजा गया। दरअसल, इसी साल उनकी कविता विद्रोही प्रकाशित हुई थी। नजरुल की यह कविता बंगाल के क्रांतिकारी युवाओं से प्रभावित थी, जो अंग्रेजी सरकार के खिलाफ असहयोग आंदोलन आंदोलन को तेज कर रहे थे। इस कविता के प्रकाशित होने के बाद ही नजरुल घर-घर में पहचाने जाने लगे।

 

10. गृहस्थी में प्रवेश

 

 

नजरुल की पत्नी प्रमिला त्रिपुरा के नायब की बेटी थीं। प्रमिला ब्रह्म समाज से भी जुड़ीं थीं। इस विवाह की घटना से बंगाल में खासा विवाद हो गया। बंगाल के मुसलमानों का एक वर्ग इस विवाह के खिलाफ था, वहीं ब्रह्म समाज से जुड़े लोग भी इसका विरोध कर रहे थे।

 

11. राजनीति में पदार्पण

 

 

नजरुल का झुकाव शुरू से ही राजनीति की तरफ था। वह वर्ष 1925 में बंगाल प्रोविन्सियल कांग्रेस से जुड़ गए। वह राजनीतिक दल की पत्रिका का संपादन भी कर रहे थे।

 

12. गिरफ्तारी

 

 

धुमकेतु नामक कविता लिखने के बाद वह अंग्रेजों के निशाने पर आ गए। उनको गिरफ्तार कर लिया गया और देशद्रोह का आरोप लगाया गया। जेल में रहने के दौरान नजरुल ने विरोध-स्वरूप 40-दिन तक उपवास रखा। इस दौरान उन्होंने कई कृतियों की रचना की, जिन्हें ब्रिटिश सरकार ने प्रतिबंधित कर दिया।

 

13. रबीन्द्रनाथ ने की सराहना

 

 

कविगुरु रबीन्द्रनाथ ठाकुर ने अपने नाटक वसन्त को नजरुल को समर्पित किया है। बाद में कविगुरु को धन्यवाद ज्ञापन करने के लिए नजरुल ने आज सृष्टि सुखेर उल्लासे नामक कविता लिखी।

 

14. संगीत के क्षेत्र में देन

 

 

नजरुल को बांग्ला गजल का रचयिता माना जाता है। नजरुल की कोशिशों की वजह से बंगाल में मुसलमानों का रुझान बांग्ला भाषा, साहित्य, कला-संस्कृति की तरफ बढ़ा। नजरुल ने मां काली पर कई गीत लिखे। इसके अलावा उन्होंने भजन और कीर्तन भी लिखे। नजरुल के गीतों की शैली को नजरुल गीति कहते हैं।

 

15. देहावसान

 

 

वर्ष 1976 में नजरुल का देहावसान हो गया। यह निश्चत रूप से बांग्ला भाषा-साहित्य के लिए एक अपूरणीय क्षति की घटना थी।

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