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‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की बात करने वालों को ‘गुलग’ में डाल देते थे, दी जाती थी यातनाएं

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9:40 pm 2 Mar, 2017

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‘अभिव्यक्ति की आजादी’ पर बहस छिड़ी है। अखबार से लेकर टीवी तक अटे पड़े हैं। यहां तक कि सोशल मीडिया भी इसी रंग में रंगा दिख रहा है। ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ को लेकर बहस पहले भी होती रही है। लेकिन अब जो बहस हो रही है, वह पहले से कहीं अधिक परिष्कृत है। इसकी वजह फेसबुक व ट्वीटर जैसे संवाद-माध्यम हैं।

अब हर कोई (जिसे तथाकथित मेनस्ट्रीम मीडिया टॉम, डिक एंड हैरी कहा करता है) अपनी बात रख सकता है। उसे जन-जन तक पहुंचा सकता है। यह सही मायने में ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का दौर है। धड़ल्ले से फेसबुक और ट्वीटर का उपयोग करिए। अपनी बात रखिए। बेलाग रखिए। कहीं कोई रोकटोक नहीं है। इतना खुलापन होने के बावजूद वामपंथी छात्र समूह और वाम राजनीतिक दल ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ पर पहरा होने की शिकायत करते हैं।

जब अभिव्यक्ति की आजादी की बात चली है, तो ‘गुलग’ की बात लाजिमी है।

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गुलग में कैदियों से हाड़तोड़ मेहनत कराई जाती थी।

सोवियत संघ में तात्कालीन कम्युनिस्ट शासन के दौरान निर्जन साइबेरियाई क्षेत्रों में बने ये ‘गुलग’ दरअसल यातनागृह हुआ करते थे, जहां इन कैदियों से भारी मेहनत करवाई जाती थी। गंभीर यातनाएं दी जाती थीं। कम्युनिस्ट शासन के दौरान साइबेरिया के अलग-अलग हिस्सों में बने इन गुलग में लगभग डेढ़ करोड़ लोगों को सजा दी गई। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यहां 5 लाख से अधिक कैदी भूखे मर गए। वहीं, कुल 20 लाख से अधिक लोगों ने वामपंथियों की यातनाएं सहते हुए अपनी जान गंवा दी।

खास बात यह है कि ‘गुलग’ में उन लोगों को भेजा जाता था जो ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की बात करते थे।


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जो लोग कम्युनिस्ट शासन से इत्तेफाक नहीं रखते थे, वह ‘गुलग’ में सजा काटने के ‘हकदार’ थे। ‘गुलग’ में उन लोगों को भी जगह दी गई थी, जिन्होंने कम्युनिस्ट शासन के खिलाफ चुटकुले सुनाए। ‘गुलग’ भेजे जाने वाले लोगों में ऐसे भी लोग थे, जो अपने निजी काम की वजह से नौकरी पर अनुपस्थित हो गए थे। इनमें ऐसे लोग भी शामिल थे, जिन्होंने लाल झंडा थामने से मना कर दिया था या कम्युनिस्टों के प्रति प्रतिबद्धता नहीं जताई थी।

‘गुलग’ के बारे में अलेक्जेन्डर सोल्जनित्सिन ने अपनी पुस्तकों में विस्तार से लिखा है।

सोल्जनित्सिन ने गुलग कारावासों की तुलना समुद्र में बिखरे हुआ द्वीपों से की थी, जहां कैदियों को निर्वासित किया जाता था। कालांतर में ‘गुलग’ मार्क्सवादियों के जुर्म व्यवस्था के रूप में बाकी दुनिया के सामने आया। कम्युनिस्ट शासन के खिलाफ बोलने की जुर्रत करने वाले बुद्धिजीवी सोल्जनित्सिन को कम्युनिस्ट सरकार ने इसी तरह के एक ‘गुलग’ में भेजा था, जहां उन्हें यातनाएं दी जाती थीं।

पुस्तक ‘द गुलग आर्किपलेगो’ के लिए उन्हें नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। यह पुस्तक वर्ष 1973 में छप कर आई थी।

सोवियत संघ की गुलग प्रणाली बहुत हद तक अंग्रेजों की कालापानी की सजा से प्रेरित था।

इतना तो तय है कि सोवियत संघ अगर आज भी कम्युनिस्ट शासन होता तो आधे से अधिक लोग ‘गुलग’ में सजा काट रहे होते। फिलहाल कुछ इसी तरह का हाल कम्युनिस्ट देश उत्तर कोरिया में है।

भारत में अब भी ‘अभिव्यक्ति की आजादी है’। भरपूर है। हम यहां कुछ भी बोल लेते हैं। लिख लेते हैं। यहां तक कि सत्ता के शीर्ष पर बैठे व्यक्ति की तस्वीर को जूते से पीट देते हैं। इसके बावजूद हमें कोई कुछ नहीं कहता। ईश्वर को धन्यवाद है कि हम भारत में रहते हैं, तात्कालीन सोवियत संघ में नहीं।

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