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3 तानाशाह जिन्होंने अकेले ही बदल डाली अपने देश की तस्वीर

4:25 pm 7 Feb, 2018

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हम में से अधिकांश लोगों ने अपने स्कूल की किताब में एडोल्फ हिटलर के बारे में पढ़ा है। तानाशाही शासन का जिक्र होते है सबसे पहला नाम हमारे दिमाग़ में हिटलर और नाज़ी जर्मनी का ही आता है, लेकिन इतिहास में सिर्फ हिटलर ही एकमात्र तानाशाह नहीं थाष उसके अलावा भी बहुत से तानाशाह थे और आज भी हैं। हालांकि, सवाल ये उठता है कि क्या सारे तानाशाह हिटलर जितने ही खतरनाक और क्रूर होते हैं? शायद नहीं, इतिहास के इन 3 तानाशाहों के बारे में शायद आप ज़्यादा कुछ नहीं जानते होंगे, लेकिन ये तानाशाह बुरे और क्रूर नहीं थे, बल्कि इन्होंने अपने प्रयासों से देश का बहुत विकास किया और उसकी तस्वीर ही बदल दी।

1. मुस्तफा केमाल अतातुर्क, तुर्की

मुस्तफा को कट्टर और धार्मिक मुस्लिम इस्लाम का दुश्मन मानते थे, लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि आज दुनिया में तुर्की का जो स्थान है और जो उसका विकास हुआ है वह सिर्फ़ मुस्तफा के प्रयासों का ही नतीजा है। प्रथम विश्व युद्ध के बाद तुर्क साम्राज्य के पतन के बाद मुस्तफा ने तुर्कियों की स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी और 1923 में तुर्क गणराज्य का गठन किया। वह तुर्की के पहले राष्ट्रपति बने और अपनी मौत तक इस पद पर कायम रहे। 1938 में मुस्तफा की मौत हो गई।

Dictator

मुस्तफा की सबसे बड़ी उपलब्धि थी कि उन्होंने कट्टर इस्लमाकि ओट्टोमन साम्राज्य को धर्मनिरपेक्ष गणराज्य में बदल दिया। उन्होंने यह सब कानून के दायरे में रहकर अपने शक्तिशाली भाषणों के ज़रिए किया। उनका मानना था कि मॉर्डन युग में अरबी सिस्टम को फॉलो करना उचित नहीं है। मध्य-पूर्व की बजाय उन्होंने पश्चिमी दर्शनशास्त्र, फैशन और शिक्षा को तुर्की में लागू किया और उन्होंने अरबी लिपी को भी खत्म कर दिया। मुस्तफा ने हज़ारों नए स्कूल बनाए जहां आधुनिक शिक्षा दी जाती थी। महिलाओं को समान अधिकार दिए। धर्मनिरपेक्षता को बढ़ावा। यदि कोई नागरिक धर्म परिवर्तन करना चाहता है तो उसे उसकी छूट थी। उन्होंने इस्लाम के प्रति लोगों का नज़रिया बदल ही डाला।

2. ‘अफ्रीका के चे ग्वेरा’ थॉमस शंकर, बुरकीना फासो

थॉमस शंकर देश में भ्रष्टाचार, गरीबी और फ्रांसीसी साम्राज्यवाद से दंग आ गए थे, इसलिए उन्होंने पश्चिम अफ्रीकी देश के ‘अपर वोल्टा’ इलाके में सैनिक विद्रोह के ज़रिए कब्ज़ा जमा लिया और वहां के पहले प्रेसिडेंट बनें। उन्होंने प्रेसिडेंट बनने के चार साल के अंदर ही इस देश को अफ्रीका का सबसे प्रगतिशील राष्ट्र बना दिया। वर्ष 1983 में जब वो प्रेसिडेंट बने तब उनकी उम्र सिर्फ़ 33 साल थी।


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उन्होंने अपर वोल्ट का नामकरण किया बुरकीना फासो, जिसका मतलब होता है, न्याय की भूमि। इसके बाद उन्होंने देश को बदलने के काम शुरू कर दिया। वह दूसरों की मदद या कर्ज़ लेकर देश को आगे नहीं बढ़ाना चाहते थे। उन्होंने आत्मनिर्भरता को तवज्जो दी। उन्होंने 2.5 मिलियन बच्चों का टीकाकरण किया। पूरे देश को सड़क और रेलमार्ग से जोड़ा, वो भी बिना किसी बाहरी मदद के। थॉमस शंकर ने महिलाओं का खतना, बहुविवाह, जबरन शादी कराना, सरकारी अधिकारियों द्वारा अपनी पुरानी कार के बदले नई कार लेने जैसी नीतियों को खत्म कर दिया। उनके शासनकाल में देश में पैदावर भी बढ़ी। उन्होंने अपने साथ ही बाकी सरकारी कर्मचारियों का वेतन भी कम कर दिया, ताकि देश की ज़रूरतें पूरी हो। हैरानी की बात ये है कि उनके समय में देश की साक्षरता दर 13 से बढ़कर 73 प्रतिशत हो गई थी। उन्होंने सरकार में महिलाओं की भागीदारी को भी बढ़ावा दिया। 15 अक्टूबर 1987 में 37 साल की उम्र में उनकी हत्या कर दी गई।

3. ली कुआन यू, सिंगापुर

ली कुआन सिंगावुर के पहले प्रधानमंत्री थे। उन्होंने देश पर 3 दशक तक शासन किया। सिंगापुर को तीसरी दुनिया के गरीब देश से वैश्विक आर्थिक केंद्र बनाने का श्रेय ली कुआन को ही जाता है। हालांकि, उनके ऊपर अधिकारवादी यानी दंबग रूप से शासन करने के आरोप लगे थे, लेकिन इस बात में कोई दो राय नहीं है कि सिंगापुर को आर्थिक रूप से समृद्ध बनाने का श्रेय उन्हीं को जाता है।

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सिंगापुर के पास अपना कोई प्राकृतिक संसाधन नहीं, बावजूद इसके ली ने इस देश को दुनिया के अमीर देशों की सूची में शामिल कर दिया। ली कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से फर्स्ट क्लास बैरिस्टर ग्रैज्युएट थे। उनकी नीति और राजनीति पर बहुत मज़बूत पकड़ थी। उनका मानना था कि भ्रष्टाचार ऊपर से शुरू होता है और फिर नीचे तक पहुंच जाता है। उन्होंने कानून बनाया कि जो भी व्यक्ति अपनी संपत्ति का सही ब्योरा नहीं देगा वो भ्रष्टाचार का दोषी माना जाएगा। ली की कई नीतियां विवादों में भी रही। बिना मुकदमे के हिरासत में लेने की उनकी नीति की भी आलोचना हुई, लेकिन उनका मानना था कि ये देश के भले के लिए है।

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