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अटल बिहारी वाजपेयी ने हिन्दी को विश्व पटल पर स्थापित किया, पढ़िए संयुक्त राष्ट्र में उनका ऐतिहासिक भाषण

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5:42 pm 16 Aug, 2018

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अटल बिहारी वाजपेयी आजाद भारत के अति-महत्वपूर्ण नेताओं में एक रहे हैं। श्री वाजपेयी ने भारत के राजनीतिक, सामाजिक, सामरिक और आर्थिक क्षेत्रों में आमूल-चूल बदलाव किए। यही नहीं, वह राजनेता होने के साथ ही एक प्रख्यात पत्रकार, साहित्यकार और विचारक भी रहे हैं। माना जाता है कि वाजपेयी ने हिन्दी भाषा को विश्व पटल पर स्थापित करने में महती भूमिका निभाई थी। वर्ष 1977 में संयुक्त राष्ट्र में उनका हिन्दी में दिया गया भाषण एक ऐतिहासिक घटना थी। यह पहली बार था, जब किसी भारतीय ने संयुक्त राष्ट्र में हिन्दी में अपना वक्तव्य रखा था।

हमनें यहां अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों को शब्दसः रखा है।

 

 

“सरकार की बागडोर संभाले केवल छ: महीने हुए हैं। फिर भी इतने कम समय में हमारी उपलब्धियां उल्लेखनीय हैं। भारत में मूलभूत मानवाधिकार पुन: प्रतिष्ठित हो गए हैं। जिस भय और आतंक के वातावरण ने हमारे लोगों को घेर लिया था वह अब खत्म हो गया है। ऐसे संवैधानिक कदम उठाए जा रहे हैं कि यह सुनिश्चित हो जाए कि लोकतंत्र और बुनियादी आजादी का अब फिर कभी हनन नहीं होगा।

अध्यक्ष महोदय, वसुधैव कुटुम्बकम की परिकल्पना बहुत पुरानी है। भारत में सदा से हमारा इस धारणा में विश्वास रहा है कि सारा संसार एक परिवार है। अनेकानेक प्रयत्नों और कष्टों के बाद संयुक्त राष्ट्र के रूप में इस स्वप्न के साकार होने की संभावना है। यहां मैं राष्ट्रों की सत्ता और महत्ता के बारे में नहीं सोच रहा हूं। आम आमदी की प्रतिष्ठा और प्रगति मेरे लिए कहीं अधिक महत्व रखती है।

 


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अंतत: हमारी सफलताएं और असफलताएं केवल एक ही मापदंड से मापी जानी चाहिए कि क्या हम पूरे मानव समाज, वस्तुत: हर नर, नारी और बालक के लिए न्याय और गरिमा की आश्वस्ति देने में प्रयत्नशील हैं। अफ्रीका में चुनौती स्पष्ट है प्रश्न ये है कि किसी जनता को स्वतंत्रता और सम्मान के साथ रहने का अनपरणीय अधिकार है या रंगभेद में विश्वास रखने वाला अल्पमत और किसी विशाल बहुमत पर हमेशा अन्याय और दमन करता रहेगा। नि:संदेह रंगभेद के सभी रूपों का उन्मूलन होना चाहिए।

हाल में इजराइल ने वेस्ट बैंक को गाजा में नई बस्तियां बसाकर अधिकृत क्षेत्रों में जनसंख्या परिवर्तन करने का जो प्रयत्न किया है, संयुक्त राष्ट्र को उसे पूरी तरह अस्वीकार और रद्द कर देना चाहिए। यदि इन समस्याओं का संतोषजनक और शीघ्र ही समाधान नहीं होता इसके दुष्परिणाम इस क्षेत्र के बाहर भी फैल सकते हैं। यह अति आवश्यक है कि जेनेवा सम्मेलन का शीघ्र ही पुन: आयोजन किया जाए और उसमें पीएलओ को प्रतिनिधित्व दिया जाए। अध्यक्ष महोदय, भारत सब देशों से मैत्री चाहता है और किसी पर प्रभुत्व स्थापित नहीं करना चाहता।

भारत न तो आणविक शस्त्र शक्ति है और ना बनना चाहता है। नई सरकार ने अपने असंदिग्ध शब्दों में इस बात की पुनर्घोषणा की है। हमारी कार्यसूची का एक सर्वस्पर्शी विषय जो आगामी अनेक वर्षों और दशकों में बना रहेगा वह है मानव का भविष्य। मैं भारत की ओर से इस महासभा को आश्वासन देना चाहता हूं कि हम एक विश्व के आदर्शों की प्राप्ति और मानव के कल्याण तथा उसके गौरव के लिए त्याग और बलिदान की बेला में कभी पीछे नहीं रहेंगे।”

 

 

अटल बिहारी बाजपेयी भारत के एक महान नेता रहे हैं, जिन पर आने वाली पीढ़ियां निश्चित तौर पर गर्व करेंगी।

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