हठयोगी, औघड़, योगी बाबा गोरखनाथ को माना जाता है शिव का रूप

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9:52 pm 11 Mar, 2016


भक्त उन्हें अवधूत, सिद्ध, औघड़, परम तेज़ योगी के नाम से जानते हैं। उन्हे शिव का रूप भी कहा जाता है। यह वही योगसिद्ध गुरु हैं, जिन्होंने न केवल हठयोग की परम्परा की शुरुआत की, बल्कि इसका विस्तार भी किया। इनके नाम पर एक नगर का नाम रखा गया। यही नहीं, गुजरात में एक पर्वत चोटी का नामकरण भी उनके नाम से प्रेरित होकर किया गया था। अपनी सिद्धियों की वजह से वह आम इन्सानों के बीच एक ऊंचे पर्वत सरीखे थे।

यह कोई और नहीं, बल्कि नाथ संप्रदाय को विश्व में ख्याति दिलाने वाले तीव्र और प्रखर योगी ‘बाबा गोरखनाथ’ हैं।

गुरु गोरखनाथ हठयोग के आचार्य थे। कहा जाता है कि एक बार गोरखनाथ समाधि में लीन थे। इन्हें गहन समाधि में देखकर मां पार्वती ने भगवान शिव से उनके बारे में पूछा। शिवजी बोले, लोगों को योग शिक्षा देने के लिए ही उन्होंने गोरखनाथ के रूप में अवतार लिया है। इसलिए गोरखनाथ को शिव का अवतार भी माना जाता है।

बाबा गोरखनाथ जब अवतरित हुए

बाबा गोरखनाथ के जन्मकाल पर विद्वानों में मतभेद हैं। जनश्रुति के अनुसार बाबा गोरखनाथ का जन्म किसी स्त्री के गर्भ से नहीं हुआ था। कहते हैं कि बाबा गोरखनाथ गुरु मत्स्येन्द्रनाथ के मानस पुत्र थे और उनके प्रिय शिष्य भी रहे।

ऐसा कहा जाता है कि एक बार भिक्षाटन के क्रम में गुरु मत्स्येन्द्रनाथ एक गांव में पहुंचे। किसी एक घर में भिक्षा के लिए आवाज लगाने पर गृह स्वामिनी ने भिक्षा देकर आशीर्वाद के रूप में पुत्र की याचना की। गुरु मत्स्येन्द्रनाथ सिद्ध तो थे ही, उनका हृदय दया ओर करुणामय भी था। अतः गृह स्वामिनी की याचना स्वीकार करते हुए एक चुटकी भर भभूत देते हुए पुत्र फल का आशीर्वाद दिया। उन्होंने गृह स्वामिनी से कहा कि उन्हें एक महा तेजस्वी पुत्र रत्न की प्राप्ति होगी, जिसकी ख्याति दिग-दिगन्त तक फैलेगी।

गोरखनाथ मंदिर-गोरखपुर wikimapia

गोरखनाथ मंदिर-गोरखपुर wikimapia

बारह वर्ष बीतने के बाद गुरु मत्स्येन्द्रनाथ का उसी ग्राम में पुनः आगमन हुआ। जिस गृह स्वामिनी को अपनी पिछली यात्रा में गुरु ने आशीर्वाद दिया था, उसके घर के पास आने पर गुरु को बालक का स्मरण हो आया। उन्होंने घर में आवाज लगाई और गृह स्वामिनी से प्रश्न किया “क्यों तेरा बालक 12 साल का होगा? कहा है मुझे उसके दर्शन करा।”

गृहस्वामिनी कुछ देर तो चुप रही, फिर उसने संकोच के साथ बताया कि अविश्वास की वजह से उसने उनके द्वारा प्रदत्त भभूति को गोबर में फेंक दिया था।

बाबा गोरखनाथ की प्राचीन मूर्ति answcdn

बाबा गोरखनाथ की प्राचीन मूर्ति answcdn

गुरु मत्स्येन्द्रनाथ सिद्ध महात्मा थे। वह जानते थे कि उनके द्वारा सिद्ध किया भभूत कभी निष्क्रिय नहीं हो सकता। वे गोबर के स्थान के पास गए और उन्होंने बालक को पुकारा। उनके बुलावे पर एक बारह वर्ष का तीखे नाक नक्श, उच्च ललाट एवं आकर्षण की प्रतिमूर्ति स्वस्थ बच्चा गुरु के सामने आ खड़ा हुआ। गुरु मत्स्येन्द्रनाथ बच्चे को लेकर चले गए। यही बच्चा आगे चलकर अघोराचार्य गुरु गोरखनाथ के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

युग युगांतर तक जीवित रहे बाबा गोरखनाथ

बाबा गोरखनाथ का जीवन अलौकिक और रहस्मय रहा है। ऐसी मान्यता है कि वह अमर है। बाबा गोरखनाथ हर युग में अवतरित हुए है। कहते हैं कि सर्वप्रथम सतयुग में उन्होंने पंजाब में साधना की थी। उसके बाद त्रेतायुग में उन्होंने उत्तर प्रदेश के एक स्थान गोरखपुर में रहकर ही साधना की, जहां उन्हें भगवान राम के राज्याभिषेक के लिए निमंत्रण भी भेजा गया था। मान्यताओं के मुताबिक, उस दौरान वे तपस्या में लीन थे, इसके बावजूद उन्होंने भगवान राम को आशीर्वाद दिया था।

बाबा गोरखनाथ द्वापरयुग में भी अपना प्रकाश फैलाते रहे। कहते हैं कि जहां उन्होंने तप किया था, वहीं पर रुक्मिणी और कृष्ण का विवाह संपन्न हुआ था।यह भी मान्यता है कि अलौकिक विवाह में बाबा गोरखनाथ आशीर्वाद देने के लिए उपस्थित थे।

बाबा गोरखनाथ का एक प्रसंग भीम से भी जुड़ा है। ऐसी मान्यता है कि राजसूय यज्ञ के समय तब स्वयं भीम बाबा गोरखनाथ को आमंत्रित करने के लिए गए थे। जब भीम वहां पहुंचे, तब गोरखनाथ तप में लीन थे। इंतज़ार करते-करते भीम एक स्थान पर विश्राम करते सो गए। माना जाता है कि भीम के भार की वजह से धरती दबकर सरोवर बन गई। आज भी मंदिर के प्रांगण में वह सरोवर मौजूद है। प्रतीक के रूप में उस स्थान पर भीम की विश्राम करती हुई मूर्ति को भी स्थापित किया गया है।


बाबा गोरखनाथ के संबंध में प्रचलित हैं कई दंत-कथाएं

बाब गोरखनाथ को भारत में एक महान योगी का दर्जा प्राप्त है। बाबा गोरखनाथ का मानना था कि सिद्धियों के पार जाकर शून्य समाधि में स्थित होना ही योगी का परम लक्ष्य होना चाहिए, परंतु उनकी सिद्धियां प्राप्त करना बहुत ही कठिन कार्य है। बाबा गोरखनाथ ने कई कठ‍िन (आड़े-त‍िरछे) आसनों का आविष्कार किया, जिसमें सिद्ध हो जाने के बाद व्यक्ति ब्रह्मलीन हो जाता है। जहां उसे परम शक्ति का अनुभव होता है। बाबा गोरखनाथ की तरह उनकी सिद्धियां और उनसे जुड़े प्रसंग भी अलौकिक हैं।

समाधि से शून्य तक

प्रसंग है कि एक बार बाबा गोरखनाथ गंगा के किनारे ध्यान की ऐसी गहन अवस्था में बैठे कि उन्होंने रेत में समाधि बना ली। कहा जाता है कि बाबा गोरखनाथ ने अट्ठारह महीने से भी अधिक समय तक उस स्थान पर समाधि बनाए रखा। जब कुछ किसानों ने फसल लगाने के लिए उस स्थान को जोता तो उन्होंने देखा कि ज़मीन से खून निकल रहा है। मिट्टी हटाने पर तब वहां बाबा गोरखनाथ के दर्शन हुए।

तत्पश्चात किसानों ने भरसक प्रयास किया कि इस सिद्ध योगी को जगाया जाए। परंतु बाबा गोरखनाथ ध्यान में लीन रहे। जब यह बात उनके गुरु मत्स्येंद्रनाथ को पता चली, तब उन्होंने चुटकी बजा कर उनको जगाया।

गोरखनाथ से जुड़ा है खिचड़ी त्योहार

एक बार बाबा गोरखनाथ भिक्षाटन करते हुए गोरखपुर के समीप ज्वाला मंदिर पहुंचे। उस दिन मकर संक्रांति का त्योहार था। एक सिद्ध योगी को देख कर ज्वाला मां प्रसन्न हुईं और उन्होंने बाबा को भोजन के लिए आमंत्रित किया। गोरखनाथ बाबा ने आग्रह स्वीकार कर लिया और ज्वाला मां से अनुरोध किया कि आप पानी गर्म करें तब तक मैं भिक्षाटन करके चावल और दाल का प्रबंध करता हूं। उसी दिन के बाद से मकर संक्रांति के दिन खिचड़ी बनाने की परंपरा शुरु हुई।

गोरखनाथ मंदिर- गोरखपुर, खिचड़ी चढ़ाने उमड़े भक्त jagran

गोरखनाथ मंदिर- गोरखपुर, खिचड़ी चढ़ाने उमड़े भक्त jagran

जिस स्थान पर आज गोरखपुर है, पहले वहां घने जंगल थे। यहां चोर लूटेरे और डकैतों का वास था। बाबा गोरखनाथ ने इसी पुण्यभूमि को अपनी तपस्या और साधना के लिए चुना, जो बाद में गोरखपुर कहलाया। उनकी आध्यात्मिक उपस्थिति का अनुभव करने के लिए उनके द्वारा स्थापित आश्रम आज भी गोरखपुर में है। इस आश्रम का समय काल के साथ विस्तार होता रहा। उनके अनुयायियों ने बाद में बड़ा मन्दिर, मठ, तालाब, बाग-बगीचा आदि बना कर उनकी तपो-भूमि का आध्यात्मिक आनंद लेने के लिए विकसित किया, जो गोरखपुर में गोरखनाथ मंदिर के नाम से जाना जाता है।

बाबा गोरखनाथ ने नेपाल और पाकिस्तान में भी की साधना

नेपाल में स्थित बाबा गोरखनाथ की गुफा ytimg

नेपाल में स्थित बाबा गोरखनाथ की गुफा ytimg

बाबा गोरखनाथ ने नेपाल और पाकिस्तान में भी योग साधना की थी। पाकिस्तान के सिंध प्रान्त में स्थित गोरख पर्वत का विकास एक पर्यटन स्थल के रूप में किया जा रहा है। इसके निकट ही झेलम नदी के किनारे रांझा ने गोरखनाथ से योग की दीक्षा ली थी। नेपाल में भी गोरखनाथ से सम्बंधित कई तीर्थ स्थल हैं। बाबा गोरखनाथ के नाम से ही नेपाल के गोरखाओं का पड़ा गोरखा नेपाल में एक जिला है।

मान्यता है कि बाबा गोरखनाथ ने अपने भक्तों को सबसे पहले यहीं दर्शन दिया था। गोरखा जिला में एक गुफा है, जहां गोरखनाथ का पग चिह्न है और उनकी एक मूर्ति भी है। यहां हर साल वैशाख पुर्णिमा के दिन ‘रोट महोत्सव’ नामक उत्सव बड़े ही धूमधाम से मनाया जाता है।

गोरखनाथ मंदिर- पाकिस्तान hinduexistence

गोरखनाथ मंदिर- पाकिस्तान hinduexistence

गोरखनाथ बाबा ने 13वीं सदी में गोरखवाणी का प्रचार-प्रसार किया था। वह एकेश्वरवाद पर बल देते थे, ब्रह्मवादी थे तथा ईश्वर के साकार रूप के सिवाय शिव के अतिरिक्त कुछ भी सत्य नहीं मानते थे। उनका मठ संसार में दुखी रहने वाले मनुष्यों के लिए आस्था का मुख्य केन्द्र बन गया। इस मठ की ख्याति अनेक देशों तक पहुंची है। गोरखनाथ मठ के महन्त गुरु गोरखनाथ के प्रतिनिधि माने जाते हैं।

नेपाल में स्थित गोरखनाथ मंदिर gorakhshyanath

नेपाल में स्थित गोरखनाथ मंदिर gorakhshyanath

ऐसे तेज़ प्रखर महयोगी, अघोरी, शिव रूप को मेरा शत-शत नमन।

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