लोग कहते थे ‘बहू होके नोट कमावे है, कैरेक्टरलेस है’, पर जब जीते पदक तो सबके मुंह पर ताले लग गए

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4:52 pm 5 Apr, 2016

‘तू लड़की है, आख़िर कर ही क्या लेगी? तेरा काम है पति की सेवा करना और बच्चे संभालना। गांव की बहू होकर मर्दों के संग अखाड़े में कुश्ती करती है, कैरेक्टरलेस है।’

ऐसे ही न जाने कितने तानों के जहर वह पीती रही है। यह कहानी है भिवानी में रहने वाली एक लड़की नीतू सरकार की, जिसकी 13 साल की छोटी उम्र में शादी करा दी गई। 14 की उम्र में वह जुड़वा बच्चों की मां बन गई। लेकिन उसने अपने सपनों को मरने नहीं दिया। उसने बचपन से पहलवान बनने का सपना संजोकर रखा था, और इसे पूरा किया।

नीतू जब 13 साल की थी, जब उसकी शादी 30 साल के व्यक्ति के साथ कर दी गई, जिसकी मानसिक हालत ठीक नहीं थी। यही नहीं, उसके ससुर ने उसके साथ बलात्कार की कोशिश की। गुड्डे गुडिए से खेलने की उम्र में उसे घर से भागना पड़ा।

गौरतलब है कि भारत में बाल विवाह वर्ष 1929 के बाद से ही गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था, लेकिन नीतू की कहानी एक उदाहरण है कि आख़िर परम्परा के नाम पर कानून कैसे तोड़ा जाता है। नीतू उन बुरे दिनों को याद करते हुए कहती हैः

“मैं 13 साल की थी, मेरे पड़ोस से दो लड़कियां भाग गई और इससे मेरा परिवार डर गया। उन्होंने सोचा कि मैं भी ऐसा ही करूंगी। इसलिए उन्होंने मेरी शादी करा दी। असल में उनकी गलती की सज़ा मुझे मिली।”

नीतू को अपना ससुराल छोड़ कर वापस आने पर परिवार और समाज की आलोचना झेलनी पड़ी। नीतू के विरोध के बावजूद उसी साल रोहतक के संजय कुमार के साथ उसकी दूसरी शादी करा दी गई। हालांकि, संजय नीतू का बहुत ख्याल रखता था, लेकिन महज 14 साल की उम्र में जुड़वां बच्चों की मां बनने के साथ ही, उसका पहलवान बनने का सपना पूरी तरह से खत्म होता दिखने लगा। नीतू कहती हैंः

“मैं कुश्ती को लेकर तभी से डूबी रहती थी, जब में छोटी थी। 2010 कॉमनवेल्थ गेम्स का आयोजन भारत में हो रहा था, तब मैं टीवी पर कुश्ती देख रही थी। तभी मुझे अचानक यह अहसास हुआ कि इसमें मैं अपना भविष्य आज़मा सकती हूं।”

ज़िंदगी के उठापटक से रूबरू हो रही नीतू ने ग़रीबी को मर्दों के अखाड़े में पटकने का फ़ैसला लिया। लेकिन मर्द होने के अहंकार में चूर समाज ने फिर से पटकनी दे दी। नीतू को वहां अभ्यास करने से मना कर दिया गया।

गांव के लोग हैरान थे कि इस गांव की बहू मर्दों के साथ कुश्ती कर रही है। लोगों ने उसके पति के भी कान भरे। नीतू की सास भी उसके कुश्ती के खिलाफ थी, लेकिन नीतू के सपनों के बीच कोई नहीं आ सकता था। नीतू बताती है कि घर के काम में व्यस्त रहने की वजह से खुद को फिट रखने के लिए समय नहीं मिल पाता था। उसका वजन बढ़ कर 80 किलो से उपर हो गया था। इसके बाद उसने सुबह 3 बजे जाग कर दौड़ना शुरू कर दिया।

यह उसकी रोज़ की दिनचर्या बन गई थी। वह रोज़ सुबह जल्दी उठती और गांव वालों के जागने से पहले घर लौट आती थी।


कहते हैं भगवान के घर में देर है, अंधेर नही। नीतू के सपनों ने 2011 में आकार लेना शुरू किया। जब उसकी मुलाकात कोच ज़ीले सींग से हुई। उन्होंने नीतू को प्रोत्साहित किया। नीतू कहती हैंः

“उन्होने मुझे समझाया कि अगर मैरी कॉम, माँ बनने के बाद पदक जीत सकती हैं, तो तुम क्यों नही कर सकती। उनकी इस बात ने मेरा बहुत आत्मविश्वास बढ़ाया।”

नीतू ने फिर रोहतक में प्रशिक्षण लेना शुरू कर दिया। जल्दी ही उसकी मेहनत रंग लाई। एक नेशनल इवेन्ट में नीतू ने अपना पहला कांस्य पदक जीता, उसके बाद से उसने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।

इसके बाद उसने राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय मेडलों के अंबार लगा दिए।

नीतू ने राज्य स्तर पर दर्जनों स्वर्ण, रजत और कांस्य जीते हैं। नवंबर 2014 में राष्ट्रीय सीनियर चैंपियनशिप में कांस्य जीता, तो जनवरी 2015 में राष्ट्रीय खेलों में भी कांस्य हासिल किया। अप्रैल 2015 में राष्ट्रीय जूनियर चैंपियनशिप में चांदी का तमगा पाया। ब्राजील में अगस्त 2015 में विश्व जूनियर चैंपियनशिप में नीतू ने हिस्सा लिया।

नीतू को अपना सपना पूरा होने से अधिक खुशी इस बात से होती है, कि लोगों का लड़कियों को देखने का नज़रिया बदला है। वह कहती हैः

“जो लोग मेरी कुश्ती को लेकर नाराज़ थे, वे अब मेरी उपलब्धियों पर गर्व करते हैं। उन्होने मुझे उसी अखाड़े में बुला कर सम्मानित किया, जहां कभी अभ्यास के लिए मना कर दिया गया था। और तो और वे अपनी बेटियों को मेरी तरह बनने के लिए कहते हैं। इससे मुझे खुशी होती है।”

हालात कैसे भी हों, सपनो को पा लेने की जिद कभी नही छोड़नी चाहिए। नीतू कहती हैं कि अगर जिंदगी के उतार-चढ़ाव में टूट जाती, तो इस मुकाम तक नहीं पहुंच सकती। अगर जज्बा व हिम्मत है, तो इन्सान जिंदगी में कुछ भी कर सकता है।

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