भारतीय सेना में बढ़ रही है महिलाओं की हिस्सेदारी, जानिए 12 तथ्य

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10:55 am 30 Jun, 2016


सांख्य दर्शन के अनुसार नारी प्रकृति का स्वरूप है, अतएव स्त्री ईश्वर की सर्वश्रेष्ठ कृति है। माता, बहन, पत्नी और पुत्री की भूमिका में वह जहां 21 कुलों का उद्धार करती है, वहीं शक्ति के रूप वह असुरों का संहार करती है। भारतीय प्राच्य इतिहास नारी की त्याग-तपस्या की गाथाओं से भरा पड़ा है। किसी युग में महिलाएं पुरुषों से कमतर नहीं रहीं।

वैदिक युग में महिलाएं युद्ध में भी भाग लेती थीं। हालांकि, मध्यकाल के पुरुषवादी समाज ने नारी को कुंठित मर्यादाओं के नाम पर चार-दीवारी में कैद कर रखने में कोई कसर नहीं छोडी, परन्तु तब भी महिलाओं ने माता जीजाबाई और रानी दुर्गावती की तरह न केवल शास्त्रों से, अपितु शस्त्रों का वरण कर राष्ट्र की एकता और संप्रभुता की रक्षा की।

आज सारा देश स्त्री शक्ति को नभयोद्धाओं के नए रूप में देखकर आह्लादित हो रहा है।

परन्तु अपने विशिष्ट शारीरिक विन्यास के कारण पुरुषों से आमतौर पर कमजोर समझी जाने वाली महिलाओं को ‘प्रतिरक्षा सेवाओं’ में इतनी आसानी से स्वीकृत नहीं किया गया। आज हम आपको इन 10 बिंदुओं के माध्यम से भारतीय प्रतिरक्षा जगत में मातृशक्ति की बढ़ती हिस्सेदारी के बारे में बतायेंगे।

1. साल 1992 में पहली बार भारतीय सेना में मेडिकल फील्ड के इतर, महिलाओं के लिए द्वार खुले और 25 महिला कैडेट्स ने ऑफिसर ट्रेनिंग एकेडमी(गया) से 6 सितम्बर 1993 को अपनी ट्रेनिंग पूरी की। इसके पहले महिलाएं सेना में केवल मेडिकल सर्विसेस के लिए ही नियुक्त की जाती थीं।

2. मौजूदा दौर में महिला अफसर सेना के लीगल, शिक्षा, इंजीनियरिंग, ऑर्डिनेंस, इंटेलीजेंस और एयर ट्रैफिक सिंग्नल जैसी स्ट्रीम में अपनी सेवाएं दे रही हैं। परन्तु इन स्ट्रीम्स में उनकी भर्ती केवल शार्ट सर्विस कमीशन(SSC) में ही होती हैं, यानी अधिकतम 14 वर्षों तक ही वे सेना को सेवाएं दे सकती हैं। परमानेंट कमीशन केवल मेडिकल विंग की महिला अधिकारियों को प्राप्त होता है।

3. पुनीता अरोरा सेना के दूसरे सबसे बड़े पद लेफ्टीनेंट जनरल बनने वाली पहली महिला अधिकारी बनीं। उन्होंने अपने 36 साल के सेवाकाल में 15 सैन्य मैडल्स प्राप्त किए। इसी तरह 1968 में IAF ज्वाइन करने वाली पद्मावती बंदोपाध्याय भी एयर मार्शल का पद प्राप्त करने वाली पहली महिला बनीं।

4. अपने साहसिक और रोमांचक कारनामों के लिए भी ये महिला अफसर प्रसिद्ध हैं। 2005 और 2012 में 7 महिला अफसरों ने दुनिया की सबसे ऊंची पर्वत चोटी माउंट एवरेस्ट (8848 मीटर) पर फतह हासिल करते हुए तिरंगा फहराया।

5. पहले सेना के कुछ नियमों के कारण महिलाओं को फ्रंटलाइन में नियुक्त नहीं किया जाता था,बाद में कुछ संशोधनों के बाद ये तय किया गया की महिला अधिकारी कॉम्बेट जोन से न्यूनतम 50 मीटर पहले तक नियुक्त की जा सकती हैं।

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6. कैप्टन मिताली मधुमिता को फरवरी 2011 में सेना के पदकों से सम्मानित किया गया। वह इन पदकों को प्राप्त करने वाली पहली महिला अफसर हैं।

7. स्वतंत्र भारत की 62वीं वर्षगांठ यानि 15 अगस्त 2009 को मेजर ए.आर.रामकृष्णन की अगुआई में 22 महिला अफसरों का दल, सियाचीन ग्लेशियर में दुनिया के सबसे ऊंचे युद्ध क्षेत्र “इंदिरा कौल” तक पहुंचने में कामयाब रहा।

8. न केवल थल सेना, बल्कि भारतीय वायु सेना भी अपनी महिला अफसरों की बहादुरी से मुग्ध है। 1993 में ही 13 महिला कैडेट्स ने एयरफ़ोर्स ट्रेनिंग एकेडमी से अपनी ट्रेनिंग पूरी की। गुंजन सक्सेना पहली महिला थीं, जिन्होंने कारगिल युद्ध क्षेत्र में उड़ान भरी थी। इस जांबाजी के लिए उन्हें ‘शौर्यवीर’ पदक से भी नवाजा गया।

9. पांच वर्ष पूर्व OTA (गया) में तलवारबाजी में तमिलनाडु की महिला ऑफिसर ‘दिव्या अजिथ’ ने 244 जेंटलमैनों को हराकर ‘स्वोर्ड ऑफ़ ऑनर’ सम्मान प्राप्त किया। वे यह सामान प्राप्त करने वाली एकमात्र महिला हैं।

10. पिछले साल गणतंत्र दिवस से एक रोज पूर्व, विंग कमांडर पूजा ठाकुर ने सारी पुरानी परम्पराओं को तोड़ते हुए अमेरिकन प्रेजीडेंट बराक ओबामा को ‘गार्ड ऑफ़ ऑनर’ देने वाले दल का नेतृत्व किया।

11. भारतीय सेना में महज 6 से 8 फीसदी महिला ही सेवारत हैं,वो भी केवल ऑफिसर रैंक में ही पदस्थ हैं। पुरुषों के मुकाबले महिला अधिकारियों की ट्रेनिंग थोड़ी आसान होती है,जो शायद जरूरी भी है। लेकिन महिला अधिकारियों का समर्पण काबिल-ए-तारीफ़ है। हर मोर्चे पर ये महिला अधिकारी अपने आपको साबित कर चुकी हैं।

12. आज महिलाएं BSF,Navy और NSG में कमांडर के पद को सुशोभित कर रही हैं। आज वो फाइटर प्लेन से दुश्मनों के बंकरों को नष्ट करने की योग्यता रखती हैं। वो दिन दूर नहीं जब स्नाइपर सेल में भी महिलाएं तैनात होंगी।

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