कट्टरपंथियों पर कहरः बांग्लादेश में 3 हजार जिहादी हिरासत में

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2:31 pm 12 Jun, 2016


बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों, धर्मनिरपेक्ष ब्लॉगरों पर हो रहे लगातार हमलों की घटनाओं से सबक लेते हुए यहां की पुलिस ने 3 हजार से अधिक इस्लामिक कट्टरपंथियों को हिरासत में लिया है। इनमें से 37 संदिग्ध इस्लामिक आतंकवादी बताए जा रहे हैं।

पिछले एक सप्ताह में चार हिन्दू पुजारियों की हत्या कर दी गई, जिससे यहां रहने वाले अल्पसंख्यक समुदायों में दहशत का माहौल है।

इन घटनाओं के बाद अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के दबाव में बांग्लादेश की सरकार को कार्रवाई के लिए बाध्य होना पड़ा है। बांग्लादेश की सरकार देश में आतंकवादी संगठन इस्लामिक स्टेट की मौजूदगी से इन्कार करती रही है, लेकिन पिछले एक साल में करीब 20 हत्याओं की जिम्मेदारी इस संगठन ने ली है।

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, पिछले छह महीने में 50 के करीब लोग इन हमलों में मारे गए हैं, लेकिन अनधिकृत आंकड़े इसकी संख्या 150 से अधिक बताते हैं।

अपनी जान गंवाने वाले लोगों में ब्लॉगर्स, प्रोफेसर, समलैंगिक अधिकार एक्टिविस्ट और अल्पसंख्यक शामिल हैं। इस्लामिक स्टेट के अलावा हरकत-उल-जिहाद-अल इस्लामी, जागृत मुस्लिम जनता, जमात उल मुजाहिदीन जैसे आतंकवादी संगठन भी सक्रिय हैं।

इन लोगों की हत्याओं का तरीका कमोवेश एक जैसा ही है। इनकी हत्या सरेआम सड़क पर या घर में घुस कर धारदार हथियार से हमला कर की जाती है। 4-5 की समूह में हमलावर अल्लाहू अकबर का नारा लगाते हुए बेखौफ हमला करते हैं।

बांग्लादेश की सरकार अब तक यह मानने के लिए तैयार नहीं है कि ये घटनाएं सीधे तौर पर इस्लामिक आतंकवाद से जुड़ी हुई हैं। बल्कि हसीना की सरकार इसे सरकार को अस्थिर करने की साजिश मानती है।


अगर इतिहास पर नजर डालें तो पता चलता है कि बांग्लादेश में धर्मनिरपेक्ष और कट्टरपंथियों के बीच लंबे समय से नहीं बन रही है।

वर्ष 2001 में बेगम खालिदा जिया की बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने अमीर मोतीउर रहमान निजामी के कट्टरपंथी संगठन जमात-ए-इस्लामी के साथ मिलकर सरकार का गठन किया। 1971 में बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में हुए नरसंहार में उसकी भूमिका के लिए निजामी को बांग्लादेश के अंतर्राष्ट्रीय अपराध ट्राइब्युनल ने दोषी ठहरा दिया और उसे मौत की सजा सुनाई।

दरअसल, निजामी पाकिस्तानी समर्थक अल-बद्र मिलिशिया का नेता था, जिसने पाकिस्तान से मुक्ति की मांग कर रहे हजारों बंगालियों की हत्या करने का हुक्म दिया था। निजामी को उसके अपराध के लिए 11 मई 2016 को फांसी दे दी गई।

इस घटना के बाद बांग्लादेश में हिंसा की एक नई लहर चल पड़ी। निजामी को फांसी पर चढ़ाए जाने का विरोध सिर्फ जमात-ए-इस्लामी नहीं कर रही है, बल्कि हसीना की सरकार को पाकिस्तान और तुर्की का विरोध भी झेलना पड़ रहा है।

निजामी को जिस दिन फांसी दी गई, संयोग से उस दिन भारत के विदेश सचिव एस. जयशंकर ढाका में थे, जहां उन्होंने अल्पसंख्यकों पर लगातार हो रहे हमलों पर चिन्ता जताई। भारत ने बांग्लादेश से कट्टरपंथ को कुचलने का अाह्वान किया है।

फिलहाल, हसीना की सरकार द्वारा कट्टरपंथियों पर कड़ी कार्रवाई को भारत के दबाव के परिप्रेक्ष्य में देखा जाना चाहिए। भारत की कोशिश रहेगी कि बांग्लादेश इस्लामिक जिहादियों का गढ़ न बने। ऐसा होने की स्थिति में आंच की जद में भारतीय सीमा भी आएगी।

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