इस रेल परियोजना की वजह से खतरे में है कावेरी नदी का अस्तित्व, जानिए क्या है मामला

5:04 pm 25 Sep, 2016


कावेरी नदी के पानी को लेकर तमिलनाडु और कर्नाटक के बीच विवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन आपको यह जानकर हैरत होगी कि इस नदी का अस्तित्व खतरे में है। कावेरी के पानी पर किसका हक है, इस बात पर तो चर्चा होती है, लेकिन इस बात का कभी जिक्र नहीं होता कि कावेरी नदी देश की उन नदियों में से एक है, जिनके साथ बड़े पैमाने पर दुर्व्यवहार होता रहा है।

वर्ष 2014 के जुलाई महीने में सरकार ने नेशनल ग्रीन ट्राइब्युनल की हरी झंडी के बाद कोडागु में 55 किलोमीटर तक हाई-टेन्सन इलेक्ट्रिक केबल लाइन बिछाने की परियोजना पर काम करना शुरू किया। यहां मैसूर-कोडागु रेल परियोजना पर काम चल रहा है, जिसके लिए करीब 20 हजार से अधिक हरे-भरे पेड़ काट दिए गए हैं।

इसका नतीजा यह हुआ कि इस साल बारिश कम हुई, और कावेरी का जलस्तर बेहद कम हो गया।

दरअसल, कोडागु की पहाड़ियां ही कावेरी नदी का उद्गम स्थल हैं और नदी को बचाए रखने के लिए यहां पर्यावरण की रक्षा करना बेहद जरूरी है।

इस रिपोर्ट में कूर्ग वाइल्ड-लाइफ सोसायटी के अध्यक्ष चेप्पुदिरा मुथन्ना के हवाले से बताया गया है कि इस इलाके में सिर्फ पांच लाख की आबादी रहती है और यह इलाका सभी बड़े शहरों से सड़कमार्ग से जुड़ा हुआ है। यहां रेल परियोजना की कोई जरूरत नहीं है। वह कहते हैं कि रेल परियोजना की वजह से यहां के वन्यजीवन को भयावह नुकसान होगा।

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मुथन्ना पूछते हैं कि इस परियोजना पर खर्च किया जाने वाला 1800 करोड़ रुपए कोडागु के संरक्षण पर खर्च क्यों नहीं किया जा सकता?

बताया गया है कि सरकार द्वारा प्रस्तावित इस रेल परियोजना की वजह से करीब 50 हजार पेड़ों को काट दिया जाएगा। कहा जा रहा है कि अगर पेड़ नहीं हुए तो कावेरी नदी का अस्तित्व खतरे में होगा। मुथन्ना कहते हैं कि प्रत्येक पेड़ 30 से 40 हजार लीटर पानी संरक्षित रखते हैं।

इन पेड़ों की जड़ों से पानी निकलकर जमीन के अंदर बेहद छोटी धाराओं का सृजन करती हैं। इसकी नमी हवा में मिलकर बारिश का कारण बनती है।

इस बीच, मैसूह-कोडागु रेल परियोजना का विरोध कर रहे एक याचिका में कहा गया है कि अलग-अलग कथित विकासमूलक परियोजनाओं के नाम पर अब तक लाखों पेड़ काट दिए गए। इससे पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचा है।

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