वेश्यालय की मिट्टी से बनती है माँ दुर्गा की प्रतिमा, जानिए क्यों है ऐसी मान्यता

2:49 pm 6 Oct, 2016


भारत कई त्योहारों का देश है। यहां हर प्रांत के अपने त्योहार और पर्व हैं। इसी कड़ी में एक ऐसा पर्व है, जो न केवल संपूर्ण बंगालवासियों के मन-मस्तिष्क में ऊर्जा और ताजगी का संचार करता है, बल्कि पूरे भारतवर्ष में भी इसे उत्साह के साथ मनाया जाता है। यहां हम बात कर रहे है दुर्गा पूजा की।

दुर्गा पूजा में पूजने जाने वाली दुर्गा माँ की मूर्तियों का अलग ही महत्व है। आपको शायद ही ज्ञात हो कि मूर्ति को बनाने में इस्तेमाल की जाने वाली मिट्टी की अपनी खास मान्यता है।

इन मूर्तियों को बनाने में खास तरह की मिटटी का इस्तेमाल किया जाता है जो कि सोनागाछी से आती है। सोनागाछी कोलकाता का रेडलाइट इलाका है, जो सेक्स वर्कर्स के लिए जाना जाता है।

रेड लाइट इलाके की मिट्टी के इस्तेमाल के बिना अधूरी है मूर्ति

जो कारीगर इन मूर्तियों को बनाते हैं, उनका मानना है कि जब तक मूर्ति को बनाने में सोनागाछी की मिट्टी का उपयोग नहीं किया जाता, मूर्ति पूर्ण नहीं मानी जाती।

इसे लेकर इनकी अपनी कई मान्यताएं है। एक मान्यता है कि जब भी कोई व्यक्ति ऐसी जगह पर जाता है तो वह अपनी सारी अच्छाइयां बाहर ही छोड़ जाता है, यही कारण है कि सेक्स वर्कर के घर के बाहर की मिट्टी को मूर्ति में लगाया जाता है।

ऐसी ही एक और मान्यता है कि नारी, ‘शक्ति’ का एक स्वरूप है, ऐसे में अगर उसकी कहीं गलती है तो उसके लिए समाज जिम्मेदार है। इसलिए यहां की मिट्टी के इस्तेमाल के पीछे उन्हें सम्मान देने का उद्देश्य भी है।

इससे जुड़ी एक और मान्यता के बारे में बताया जाता है कि दुर्गा माँ ने अपनी एक भक्त वेश्या को सामाजिक तिरस्कार से बचाने के लिए उसे वरदान दिया था कि उसके यहां की मिट्टी के उपयोग के बिना प्रतिमाएं पूरी नहीं होंगी।

दुर्गा पूजा के वक्त इस मिट्टी का इस्तेमाल बंगाल ही नहीं, बल्कि देशभर में किया जाता है। इस मिट्टी की कीमत 300 से 500 रुपए बोरी तक है। इस मिट्टी से बनी एक मूर्ति की कीमत पांच हजार रुपए से लेकर 15 हजार तक होती है।

नवरात्र के दिनों में पश्चिम बंगाल के मूर्तिकार देश के विभिन्न जगहों पर जाते हैं और इस मिट्टी से बनी प्रतिमाओं की बिक्री करते हैं। वेश्याओं के द्वारे की मिट्टी से बनी दुर्गा माँ की मूर्तियों की सबसे अधिक मांग पश्चिम बंगाल और देश के विभिन्न स्थानों  में रहने वाले बंगालियों में है, लेकिन अब दूसरे राज्यों के लोगों में भी इसकी मांग बढ़ने लगी है।

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