पिछले साल अक्टूबर के पहले हफ्ते में जम्मू कश्मीर पुलिस के एक इंस्पेक्टर अल्ताफ अहमद डार की आतंकी हमले में मौत होती है, अल्ताफ की मौत से राज्य पुलिस प्रमुख टीवी कैमरे पर रुआंसे दिखे।

 

उनको अंतिम विदाई देने के लिए तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ़्ती मोहम्मद सईद के साथ पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और राज्य के पुलिस प्रमुख के साथ पूर्व डीजीपी भी उपस्थित थे।

 

इस अवसर पर तमाम पुलिस कर्मी आपस में गले मिलकर रोते हुए दिखे। एक इंस्पेक्टर रैंक के अफसर के लिए इस तरह की अंतिम विदाई देश में कहीं भी नहीं सुनी गयी थी लेकिन अफ़सोस की बात यह है कि पाकिस्तान से लेकर दुनिया जहां की बिना वजह की जानकारियाँ देश को देने में लगी नेशनल मीडिया के लिए यह बड़ी खबर नहीं थी। किसी टीवी चैनल या अखबार वाले ने अल्ताफ के घर वालों से बात करने की जहमत नहीं उठायी, न ही उनके सहयोगियों के साक्षात्कार चलाये ताकि देश को पता चलता की कश्मीर वही नहीं है जिसकी अब तस्वीर बनती जा रही है।

 

अल्ताफ की मौत पर पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में यूनाइटेड जिहाद काउंसिल ने जश्न मनाया क्योंकि उसके दफ्तर में हिट लिस्ट वाले बोर्ड पर सबसे बड़ी तस्वीर अल्ताफ की ही लगी थी। अल्ताफ कश्मीर पुलिस में वन मैन आर्मी कहा जाता था, एक ऐसा बंदा जिसने अपने दम पर घाटी से हिजबुल मुजाहदीन का लगभग सफाया कर दिया था। अल्ताफ की नियुक्ति कांस्टेबल के रूप में हुई थी और आतंक के साथ ही हवाला मामलों में उनकी पकड़ को देखते हुए उन्हें कई प्रमोशन मिले और वो स्पेशल सेल के इंस्पेक्टर के रूप में काम कर रहे थे। एक ऐसा इंस्पेक्टर जिसे विभाग की तरफ से गाड़ी, आवास और अलग दफ्तर मिला हुआ था। एक ऐसा इंस्पेक्टर जिसके पास प्रशिक्षण के लिए आईपीएस जाते थे और एनआईए के लोग जाते थे।

 

2005 में अल्ताफ जब श्रीनगर में एक थाने के मुंशी थे तब एसपी सिटी मोहम्मद इरशाद ने एक केस में उनकी काबीलियत पहचानी और उनको एसआईटी में ले आये। उसी समय शहर के एक प्रतिष्ठित व्यवसायी नजीर महाजन की हत्या हो गयी थी, इस हाईप्रोफाइल मर्डर की गुत्थी को मुंशी अल्ताफ ने सुलझा लिया और मामले में महाजन का बेटा गिरफ्तार किया गया। इसी समय अल्ताफ ने एक लैपटॉप लिया, उसका जिक्र करना इस लिए भी जरूरी है की अभी जिस बुरहान वानी के चलते कश्मीर जल रहा है उसकी काबीलियत इंटरनेट के इस्तेमाल में भी थी। लैपटॉप लेने के बाद अल्ताफ ने इंटरनेट का बखूबी इस्तेमाल करना शुरू किया और जल्दी ही वो विभाग में और आतंकियों के बीच भी, अल्ताफ लैपटॉप के नाम से मशहूर हो गए।

 

फोन काल ट्रेकिंग से लेकर लोकेशन पता करने में भी अल्ताफ माहिर हो चुके थे और सामान्यतया एक दो हमराही लेकर मिशन पर निकल जाते। लगभग दस साल इस रूप में अल्ताफ लैपटॉप ने दो सौ से अधिक इनकाउंटर किये। हिजबुल मुजाहिदीन की टॉप लीडरशिप को साफ़ कर देने के बाद घाटी में लश्कर के कमांडर अबू कासिम को अल्ताफ ट्रैक कर रहे थे, सटीक सूचना पर 7 अक्टूबर 15 को केवल एसएचओ गजनफर अहमद को लेकर निकले। जानकारी दुरुस्त थी लेकिन इस बार समय उनका नहीं था, अबू कासिम की तरफ से फायरिंग में अल्ताफ और हमराही गजनफर बुरी तरह घायल होते हैं। सेना के हेलीकॉप्टर से दोनों घायलों को बादामीबाग बेस अस्पताल लाया गया लेकिन वहां से अच्छी खबर नहीं आई।

 

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पुलिस हेडक्वार्टर में सियापा छा गया और सैंतीस साल के अल्ताफ अपने पीछे चार और दो साल के, दो बच्चे छोड़ कर जा चुके थे। बीस लाख का ईनामी अबू कासिम हालांकि सितम्बर के अंतिम सप्ताह में मारा गया लेकिन वह अपने साथियों का एक बड़ा काम आसान कर गया था क्योंकि अल्ताफ लैपटॉप न केवल घाटी में वरन सरहद पार भी अच्छी पकड़ रखते थे और उनके नाम का एक आतंक था।

 

इतनी लम्बी कहानी सुनाने का मकसद सिर्फ यही है कि जब हम किसी पोस्टर ब्वाय की चर्चा करते हैं तो दिल्ली से आने वाली खबरों में अल्ताफ लैपटॉप के पोस्टर की कौन कहे, उनका नाम भी कोई नहीं जानता होगा।

 

आपको पता है कि अगर महबूबा मुफ़्ती इस समय कश्मीर की मुख्यमंत्री नहीं रहतीं तो क्या करतीं? वो बुरहान वानी के चहारुम पर पहुँच जातीं, आवाम पर हो रहे अत्याचार पर लानत भेजतीं, अपनी पार्टी के लिए सपोर्ट मांगतीं ताकि सरकार बनने पर हालात दुरुस्त किये जा सकें और चलते समय परिजनों को कुरआन की एक प्रति भेंट करतीं।

 

राष्ट्रवादी कहे जा रहे लोगों को अचरज होगा लेकिन यही तरीका है जिसे अपनाकर मुफ़्ती साहब ने अपनी बेटी का कैरियर चढ़ाया है।

 

कहा जाता है कि सूबे में नेशनल कांफ्रेंस की काट के लिए दिल्ली ने मुफ़्ती सईद को बढ़ावा देना शुरू किया था और मुफ़्ती साहब ने अपनी बेटी के लिए नए ढंग से पोलिटिक्स डिजाइन की और ऊपर से तुर्रा यह की मुफ़्ती साहब की छवि एक उदारवादी की रही, उधर हलाक़ आतंकी के घर जाकर सांत्वना और कुरआन बांटने की महबूबा शैली से अलगाववादी भी यह समझते रहे कि मेनस्ट्रीम में महबूबा उनका प्रतिनिधित्व कर ही रही हैं। ऐसी हालत में जब बाबरी से लेकर गुजरात तक के लिए भाजपा को कोसने वाले लोगों की प्रिय महबूबा के पिता ने साझा सरकार बनाने का निर्णय लिया तो यह देश से अधिक घाटी के लिए ही झटका था। अब बुरहान मामले में महबूबा के एक मंत्री कह रहे हैं कि इस ऑपरेशन में मुख्यमंत्री को अँधेरे में रखा गया।

 

कश्मीर के साथ दिक्कत यह है कि वहां की पुलिस को पिछले दस साल के भीतर इतने अधिकार दिए जा चुके हैं कि वह दुनिया की सबसे शक्तिशाली पुलिस फ़ोर्स में से एक बन गयी है, ऐसा इसलिए किया गया क्योंकि फ़ौज को अलग जिम्मेदारियां दी गयीं ताकि दुनिया को यह न लगे की वहां चप्पे चप्पे पर फ़ौज ही है। जाहिर है पुलिस वहां की है तो लोग भी वहीँ के होंगे यानी बहुसंख्यक मुसलमान। अल्ताफ लैपटॉप की चर्चा के बाद इस मुद्दे पर आने का कारण यह है कि हमें सच्चाई से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए। फौजी तो कुछ दिनों के लिए आते हैं और फिर अपनी जानकारी नयी टीम को दे कहीं और पोस्टिंग पर चले जाते हैं लेकिन पुलिस वालों को तो घूमफिर कर उसी इलाके में रहना होता है। पुलिस किसी को, कभी भी पूछताछ के लिए उठा सकती है, एक चौकी इंचार्ज भी काफी बड़ी हैसियत रखता है। इस बदलाव के चलते हुआ यह की अधिकांश लोगों के लिए बस दो ही रास्ते हैं, या तो मुखबिर बनें या फिर अलगाववादी।

 

कश्मीर की पुलिस को वहां टेरर मशीन कहा जाता है, ध्यान रहे ‘टेरर’ की उत्पत्ति भी सरकारी मशीनरी के लिए ही हुई थी, यह अलग बात है कि तमाम शब्दों की तरह यह शब्द भी अब अपना मूल अर्थ खो चुका है और सरकार की जगह गैर सरकारी गुटों के लिए इस्तेमाल होता है।

 

उमर अब्दुल्ला ने कहा की उनके कार्यकाल में बुरहान की कोई शिकायत नहीं मिली, मिलती भी कैसे?  जमीन पर उसके ऊपर फायरिंग के कुल जमा चार केस थे जिनमें भी कोई मारा नहीं गया था, उसे सोशल मीडिया का हीरो बताया जा रहा था। यहाँ एक बात और ध्यान दीजियेगा की वह खुद को हिजबुल का कमांडर कह रहा था और अभी तक के जितने हार्ड कोर आतंकी रहे हैं घाटी में उनकी तरह नहीं था। पहले वालों की तस्वीरें नहीं मिलती थीं और यह आकर्षक स्टाइल में अपनी तस्वीरें खुद ही फैला रहा था लेकिन वह इस बात से अंजान तो रहा नहीं होगा की ऐसा करने से उसको ट्रैक करने में आसानी होगी।

 

कश्मीर की सीआईडी और आईबी में भी देश के जांबाज अफसरों की टीम रहती है और ऊपर से वह खुद को सबके सामने ला ही रहा था। जब कुछ महीने पहले मैंने कश्मीर में एक पत्रकार मित्र से बुरहान के बारे में पूछा था तो उनकी राय थी कि यह इण्डिया का एजेंट है और इसे सोशल मीडिया पर इतनी छूट इसलिए मिली हुई है कि पुराने लोगों का कद कम किया जाए और समय देख कर उसे मुख्यधारा में ले लिया जाए। अब यह बात दूर से कश्मीर को देखने वालों को जल्दी समझ में नहीं आएगी।

 


कश्मीर में जो कुछ भी चल रहा है उसमें विश्वसनीयता का बहुत बड़ा संकट है, यह संकट दिल्ली या इस्लामाबाद के रुख पर नहीं वरन आपस में ही है।

 

वहां के आन्दोलन में हर किसी को डबल एजेंट समझा जाता है। वहां मरने के बाद कद कुछ अधिक ही बड़ा हो जाता है। अफजल गुरु के जीते जी अलगाववादियों का कोई वकील उसके पक्ष में नहीं आया था, अफजल के पहले के नायक मकबूल बट पर पाकिस्तान में भी उन्हीं धाराओं में मुकदमा चला जिनमें भारत में चलता रहा और फिर तिहाड़ में फांसी हुई। बुरहान की मौत के बाद एक पूर्व अलगाववादी के बेटे जुनैद कुरैशी की क्लिप कुछ चैनलों पर चली जिनमें जुनैद बन्दूक उठाने से घाटी को हुए घाटे की बात करते हैं और युवाओं से मुख्यधारा में आने की अपील कर रहे हैं। एम्सटर्डम में रहने वाले जुनैद भी घाटी के युवाओं पर असर नहीं कर सकते क्योंकि उनके पिता हाशिम कुरैशी को भी वहां लोग इन्डियन एजेंट ही मानते हैं जबकि पाकिस्तान में लम्बी कैद काटने के बाद श्रीनगर में भी मुकदमा अभी चल ही रहा है। कांग्रेस को छोड़ वहां की दोनों मुख्यपार्टियों नेशनल कांफ्रेंस और पीडीपी के नेता लोग भी ऐसा ही रवैया रखते हैं जो सत्ता में आते ही दिल्ली के साथ हो जाते हैं और विपक्ष में रहते ही अभी के उमर अब्दुल्ला की तरह की बात करने लगते हैं।

 

कश्मीर में अभी जिस पैलेट गन के मारे हुए लोगों से अस्पताल भरे हुए हैं वह छोटी समस्या नहीं है, अस्पतालों में जगह नहीं है, डॉक्टरों को आराम करने की फुर्सत नहीं मिल रही है और दिल्ली से भी आँख के विशेषज्ञ डॉक्टर वहां पहुंचे हुए हैं, उसकी खरीद उस समय उमर अब्दुल्ला सरकार के समय ही की गयी थी जब सौ से अधिक पत्थरबाज मारे गए थे। उस समय महबूबा मुफ़्ती ने इन छर्रे वाली बंदूकों का जमकर विरोध किया था और अब महबूबा के एक मंत्री नईम अख्तर का बयान आया है कि जब तक कोई दूसरा कम घातक हथियार नहीं मिल जाता तब तक इस ‘नेसेसरी ईविल’ का इस्तेमाल होता रहेगा।

 

राज्य की पुलिस को क्यों इनका इस्तेमाल करना पड़ रहा है वह समझना किसी के लिए भी मुश्किल नहीं है और उस पर चर्चा करने से कोई फायदा भी नहीं होने वाला लेकिन इतना तो तय है कि सरकार बहुत से मामलों पर कमजोर पड़ रही है। यह महबूबा और हुर्रियत, दोनों के लिए काफी शर्मनाक स्थिति है क्योंकि हुर्रियत के लोग महबूबा को अपना मानते रहे हैं। याद करिए की यासीन मालिक और शब्बीर शाह जैसे चरमपंथी लोगों को कितनी मेहनत से शांत करके उनके गुप्त ठिकानों से बाहर निकाल लाने में सफलता मिली थी और उन लोगों ने हथियार छोड़ दिए थे और उनका आन्दोलन केवल तकरीरों तक ही सिमट गया था।

 

यासीन मलिक के तो दिल्ली में दो अपने लोगों की चर्चा होती थी जिनमें से एक अजित डोभाल इस समय काफी महत्वपूर्ण पद पर हैं लेकिन इस समय घाटी में जो माहौल बना हुआ है उससे तो यही लगता है कि हमारी गुप्तचर एजेंसियां कश्मीर में कमजोर पड़ रही हैं। पत्थरबाजी तो वहां एक रश्म की तरह ही हो गयी थी, खासकर जुमे की नमाज के बाद लेकिन ऐसा मंजर नब्बे के दशक के बाद वापस आया है।

 

पूर्व गृहमंत्री चिदम्बरम अब लेख लिख रहे हैं लेकिन यह नहीं बताते की मनमोहन सिंह सरकार के दूसरे टर्म में क्यों हुर्रियत से एक बार भी बात नहीं हुई? अटल बिहारी वाजपेयी कहिये या उनके सलाहकार वृजेश मिश्र की राय लेकिन उस समय बात होती थी और अटल जी अपने ही लोगों की तमाम आलोचनाओं के बाद भी कहते थे कि बात करने से क्या बिगड़ जाएगा। वो सही थे क्योंकि बात न करने से जरूर बहुत कुछ बिगड़ जाता है।

 

सोशल मीडिया और इंटरनेट के युग में कश्मीर के युवा भी बदलती दुनिया को देख रहे हैं लेकिन वो बेजार हैं क्योंकि वहां रोजगार नहीं है। कुछ कानूनी बंदिशों के चलते शुरू से ही वहां प्राइवेट नौकरियां नहीं हैं और सरकारी तंत्र भी देश की तरह ही बीमार है, भ्रष्टाचार चरम पर है। ऐसे में एक मुनाफे वाली इंडस्ट्री है जो दिख रही है, अब वो जाएँ कहाँ? उनको भी पता है कि पाकिस्तान के साथ जाने का मतलब क्या है, आज़ादी और भी खतरनाक बात है क्योंकि अव्वल तो कश्मीर में लद्दाख और जम्मू भी है ही लेकिन जो उनको आज़ादी के सपने दिखा रहे हैं वो बता नहीं सकते कि पाकिस्तान, चीन और भारत के बीच उनकी क्या हालत होगी? ये जो मुनाफे वाली इंडस्ट्री है इसमें अवाम को छोड़ कर बाकी सभी पार्टियों के पास बे हिसाब वाली संपत्ति है, माहौल शांत हो जाने पर इस इंडस्ट्री को घाटा होने लगेगा इसलिए सम्बंधित पार्टियाँ नहीं चाहतीं कि माहौल पटरी पर आए। जिसको आप शांति कहते हैं वह भी वहां ऊपर ऊपर ही दिखती है क्योंकि अब वहां का समाज काफी बदल चुका है, पाकिस्तान का ऑपरेशन जिब्राल्टर इसलिए नाकाम हो गया था कि कबाइलियों और उनके भेषभूसा में घुसे पाकिस्तानी सैनिकों का स्थानीय लोगों को कोई समर्थन नहीं किया था, उल्टा उन्हें पकड़वाने लग गए थे जबकि पाकिस्तान ने सोचा था कि स्थानीय लोग भारत के खिलाफ विद्रोह कर देंगे लेकिन तब से झेलम में काफी पानी बह चुका है।

 

दिल्ली से लगातार गलतियाँ होती रही हैं और सत्ता प्राप्ति के खेल ने माहौल बिगाड़ने का पूरा इंतजाम किया है। हमें यह याद रखना चाहिए कि जब एक निर्दल प्रत्याशी जिसे जनता भी चुनाव विजेता ही मान रही थी और सारे विशेषज्ञ भी हरा दिया जाता है तो वो पाकिस्तान जाकर सैयद सलाउद्दीन बन जाता है, लोकतंत्र में रूचि रही होगी तभी उसने चुनाव लड़ा होगा लेकिन मुख्यधारा के जरिये ही सवालों के जवाब तलाशने की नाकाम कोशिश के बाद वह आज देश की मोस्ट वांटेड लिस्ट में है।

 

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सैयद सलाउद्दीन intoday

ये डबल एजेंट वाले गेम में फंस कर कश्मीर कराह रहा है, जन्नत की हकीकत जानते हुए भी अपनी आँखों की रोशनी गँवा रहा है और दिल्ली हमेशा की तरह पुराने चश्मे को उतारने के लिए तैयार नहीं है इस नाते क्यों न कश्मीरी युवा उस जुनैद कुरैशी की बात मानें जो दूर देश से उन्हें शांति के सन्देश दे रहा है।

 

जानते हैं क्या हुआ था जुनैद के अब्बा के साथ? श्रीनगर से इंडियन एयर लाइंस के जहाज का अपहरण हाशिम कुरैशी ने किया, जहाज लाहौर ले जाया गया, युवा हाशिम के साथ उनका चचेरा भाई भी था। जम्मू कश्मीर लिबरेशन फ्रंट की तरफ से कश्मीर की आज़ादी के लिए यह काण्ड बताया गया। खुद भुट्टो हवाई अड्डे आये और हाशिम का हीरो की तरह स्वागत हुआ, रेडियो और अखबारों में उसकी तारीफ हुई लेकिन हफ्ते भर के भीतर पाकिस्तानी एजेंसियों ने रिपोर्ट दे दी कि हाशिम रॉ का एजेंट है और उसे जेल में फेंक दिया गया। हाँ इस घटना से हुआ यह कि भारतीय क्षेत्र से पाकिस्तान की सिविल उड़ानों पर भी इंदिरा सरकार ने रोक लगवा दी जिसका फायदा यह हुआ कि बांग्लादेश मुक्ति संग्राम में सिविल उड़ानों से फौजियों को ढाका उतारने का प्लान फेल हो गया।

 

हाशिम क़ुरेशी (बाएँ) और वो अपहृत विमान.

हाशिम क़ुरेशी (बाएँ) और वो अपहृत विमान.

रॉ के पूर्व अफसर आर.के.यादव अपनी किताब में साफ़ लिखते हैं कि वह हमारा ही एजेंट था जिसकी लम्बी कैद के बाद पाकिस्तान से रिहाई हुई तो रॉ ने ही विदेश में पुनर्वास में पूरी मदद की, इधर श्रीनगर में भी जहाज अपहरण और देशद्रोह का मुकदमा चलता ही रहा। अब यह कम से कम कश्मीर के युवा तो जानते ही होंगे तो वो फिर क्यों मानें जुनैद की बात लेकिन वो घाटी में जिनकी बात मानते है उनसे तो बात करनी ही चाहिए क्योंकि हाफिज सईद के फ्रीडम मार्च से वहां कुछ निकलने वाला नहीं, न ही पाकिस्तान के ब्लैक डे से।

 

वैसे अभी महबूबा हैं तो जब वहां एक और तूफान आया था तब इनकी बहन चर्चा में थीं, जब मुफ़्ती साहब के केंद्र में मंत्री बनने के हफ्ते भर के भीतर ही रुबिया सईद का अपहरण हो गया था। वो भी एक खेल ही था, अपना अधिकांश समय लन्दन में बिताने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला उस समय भी लन्दन ही थे, भागे-भागे आए। वो आतंकवादियों की रिहाई के लिए सहमत नहीं थे, उन्होंने साफ़ कहा कि इससे हालात और खराब होंगे और उन्होंने अपने इस्तीफे की पेशकश भी कर दी थी। घाटी में भी लोग समझ ही रहे थे कि रुबिया की हत्या तो हो नहीं सकती क्योंकि फिर वो लोग जमीन पर समर्थन खो देंगे जो अपना आन्दोलन चला रहे हैं, फिर भी फारुख को मनाया गया और चार आतंकियों की रिहाई होती है जिसे अलगाववादी अपनी बड़ी जीत मान कर जुलुस बना कर उन कैदियों को जेल तक लेने आए। आज उन्ही फारुख अब्दुल्ला के बेटे उमर ने बुरहान के मरते ही पहले दिन कह दिया कि अब हालात और खराब होंगे।

 

अपहरण से बचाने के पश्चात मुफ़्ती मो. सईद अपनी पुत्री रुबिया सईद के साथ I

अपहरण से बचाने के पश्चात मुफ़्ती मो. सईद अपनी पुत्री रुबिया सईद के साथ

ऐसी स्थिति है जहाँ कुछ पता ही नहीं है कि कौन किधर है, साथ ही यह भी किसलिए किधर है तो उन हालातों में दिल्ली को जिस सावधानी की जरूरत है वह न मीडिया बरत रही है न नेतागण। कश्मीर हमारा है तो घाटी के लोग किसके हैं? वो भी तो हमारे हैं?

 

चिदंबरम साहब के लेख लिखने से वर्तमान सरकार पर उनकी भड़ास तो निकल जायेगी, सरकारें तो आती-जाती रहती हैं लेकिन सबको साथ मिलकर वहां जाना होगा, पाकिस्तान में मार्च निकल सकता है तो हमें भी अपने कश्मीरी लोगों तक पहुंचना होगा जो कम से कम इंटरनेट पर रोक लगाकर फिर अमन चैन की ट्विट करने से नहीं ही होगा। वैसे मामला गंभीर है और बड़े बड़े लोग अपनी राय दे रहे हैं लेकिन आप जानते हैं कि दिल्ली से श्रीनगर सबसे अधिक कौन मंत्री जाता रहा है? राजीव जी के मंत्री स्व. राजेश पायलट, जो सीएम के मेहमान बना करते थे। हल तो कुछ निकला नहीं अलबत्ता उनके बेटे को सीएम की बेटी से प्रेम हो गया। दोनों ने शादी की और खुद लंदन में शादी करने वाले प्रगतिशील फारुख साहब अपनी बेटी की शादी में दिल्ली नहीं आये, और तो और कभी दिल्ली की पेज थ्री पार्टियों में दिखते रहने वाले उमर अब्दुल्ला साहब ने भी अपनी बहन की शादी अटेंड नहीं की क्योंकि उसने कश्मीर से बाहर शादी कर ली, हालाँकि उमर साहब ने भी यही किया और फिलहाल तलाक भी ले चुके हैं।

 

कारण और समाधान पर बात करने का कोई मतलब नहीं क्योंकि जिनको करना है वो करना ही नहीं चाहते। कुछ मसले बनाए ही इसलिए जाते हैं कि उनसे पॉलिटिक्स खेली जाती रहे, अब राजा हरि सिंह, नेहरू और पटेल की बात करके क्या फायदा? उससे तो कुछ निकलने वाला नहीं। हमें यह भी सोचना चाहिए कि क्यों हमेशा यही पढ़ाया गया कि कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है? किसी और सूबे के बारे में यह पंक्ति क्यों नहीं रटवाई गयी? राज्य यानी पोलिटिकल स्टेट की परिभाषा में एक शर्त होती है कि उसके ‘दायरे में रहने वाली जनता द्वारा स्वाभाविक रूप से राज्य की आज्ञा का पालन’, ऐसी नौबत क्यों आ जाती है कि एक बड़ी आबादी इससे इन्कार कर देती है? फिर वहीं यह सवाल भी उठता है कि देश के अन्य हिस्सों में संविधान और राज्य की धज्जियाँ उड़ाने के लिए सड़क पर निकले गुटों पर तो कभी पैलेट गन से छर्रे नहीं मारे जाते फिर कश्मीर ही क्यों और क्यों कश्मीरी युवा सुरक्षाबलों पर पत्थर बरसाते हैं? उन ताकतों को मजबूती कैसे मिलती जाती है जो इन्हें प्रेरित करते रहते हैं? देश वहां कमजोर क्यों पड़ जाता है?

 

वही सूबा है न जहाँ अल्ताफ लैपटॉप शहीद हो गए अपने छोटे बच्चों की परवाह किये बगैर? वही सूबा है न जहाँ बिजबेहड़ा में अमरनाथ यात्रियों की बस दुर्घटनाग्रस्त होती है तो इतने गरम माहौल में अभी स्थानीय लोग राहत और बचाव के लिए आगे आते हैं? जमीन हमारी है तो लोग भी हमारे ही हैं। क्या कोई समझेगा कश्मीर को? वहां जिन आँखों में रोशनी बची है उन्हें इन्तजार है सुहानी सुबह का, जो कभी तो होगी।

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