मिलिए देशभक्त सिक्युरिटी गार्ड से जो 17 सालों से शहीदों के परिजनों को लिख रहा है चिट्ठियां

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12:13 pm 3 May, 2016


“मैं इन पत्रों को कारगिल युद्ध के समय से लिख रहा हूं। मुझे लगता है कि सेना में जाना कठिन काम है और यह देश का कर्तव्य है की उन शहीदों का सम्मान किया जाए, जिन्होंने हमारे लिए अपना जीवन बलिदान किया है। ऐसे बहुत से लोग हैं, जो अपनों को खोने के बाद दुःख के काले बादल के साए में जी रहे हैं। हमें उन परिवारों के प्रति अपने नैतिक कर्तव्यों को पूरा करना चाहिए।”

37 वर्षीय जितेंद्र सूरत के एक निजी फर्म में सुरक्षा गार्ड हैं। वह इस भावना के साथ देश भर में शहीदों के परिवारों का शुक्रिया अदा करने के लिए पोस्टकार्ड लिखते हैं, ताकि श्रद्धांजलि अर्पित कर सकें। साथ ही उन्हें यह एहसास दिला सकें कि कोई है, जो उनके बारे में सोचता है। वह अपने पत्रों में स्वीकारते हैं कि अगर इस देश के नागरिक अमन चैन से हैं, तो उन शहीदों के वजह से हैं।

आज जितेंद्र के पास लगभग 20,000 शहीदों का ब्यौरा है, जिनमे उनके नाम, यूनिट नंबर, उनका पता आदि विवरण मौजूद है। यही नहीं, उन्होंने शहीद हुए सैनिकों के परिवार को 3000 से भी ज़्यादा पत्र लिख चुके हैं। जो शहीदों के सम्मान को संबोधित करते हैं।

शहीदों के परवार को खत लिखते हुए इस देश-भक्त को लगभग 17 साल हो चुके हैं। पोस्टकार्ड सहित अन्य खर्च भी वह अपनी जेब से ही करते हैं। उनको इन पत्रों के बदले में जवाब भी आते हैं, जो जितेंद्र के लिए किसी मुराद पूरी होने से कम नहीं है।

“एक शहीद के पिता ने मुझे एक बार कॉल किया था और उन्होंने मुझसे मिलने की इच्छा भी जताई थी। हालांकि, हम आज तक मिल नही सके,  लेकिन मैं उन्हें आमतौर पर फोन करके यह याद दिलाता रहता हूं कि गुजरात में एक व्यक्ति है, जो आपके बेटे के बारे में सोचता रहता है।”

राजस्थान के भरतपुर जिले में कुटखेड़ा गांव के निवासी जितेंद्र ने अपने बेटे का नाम हरदीप सिंह रखा है यह नाम जम्मू-कश्मीर में 2003 में आतंकवादियों से लड़ते शहीद हुए सैनिक हरदीप से प्रेरित है

जितेंद्र का कमरा किसी संग्रहालय से कम नही लगता। उनका कमरा शहीदों और उनकी स्मृति चिन्ह की तस्वीरों से भरा है। साथ में उनके द्वारा बनाए गए दस्तावेज़रूपी रजिस्टर एक युग को समेटे हुए हैं। वह शहीदों के घर पर बिताए अपने जीवन के अनमोल पलों को याद करते हुए कहते हैंः


“जब कभी में किसी शहीद के परिवार से मिलने जाता हूं, तो उनसे  बात करता हूं और साथ ही यह कोशिश करता हूं कि उन वीर शहीदों के बारे में दिलचस्प बातें जान सकूं। तब मैं अपने रजिस्टर में इन तथ्यों को संजो कर उन्हें अपने तरीके से हमेशा के लिए अमर कर देता हू।”

जितेंद्र खुद सेना में शामिल होना चाहते थे, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। यही नहीं, वह शहीदों को  शुक्रिया कहने के लिए उनके परिवारों से व्यक्तिगत रूप से मिल भी चुके हैं, लेकिन यह सफ़र इतना आसान नही था। वह कहते हैंः

“मध्यमवर्गीय पृष्ठभूमि होने के कारण यह इतना आसान नहीं था। मेरा परिवार सोचता है कि मैं पागल हो गया हूं, लेकिन मैने भी यह दृढ-संकल्प कर लिया है कि जब तक सांस चलेगी, तब तक यह करता रहूंगा।”

जितेंद्र की यह पहल जरूर आंख खोलने वाली है। जहां भारत और यहां की सरकार राजनीति में फंस कर अपने वीर सपूतों को भूलते जा रही है. वहीं इस आम आदमी का प्रयास उसे सबसे ख़ास बनाती है।

शहीदों के लिए इस सच्ची श्रधांजलि के बारे में आपकी क्या राय है?

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