बहन जो चीज़ मैं तुम्हें बेहद सरलता से भेंट कर सकता हूं, वह तुम्हारे प्रति मेरा स्नेह है

author image
11:51 pm 17 Aug, 2016


“भाई, जो प्रेम और विश्वास की लढ़ियां हमारे दिल में बंधी है, वह किसी भी धागे से कहीं अधिक मजबूत हैं। हमें एक दूसरे से जो प्यार और सम्मान मिलता है, उसका आभार चुकाने के लिए एक दिन कभी भी काफी नहीं हो सकता।”

तीन बहनें और एक बड़े भैया के बीच सबसे छोटा होने के कारण हमेशा से ही परिवार में सबसे दुलारा रहा। हालांकि, शिक्षण के लिए बोर्डिंग स्कूल भेजे जाने के कारण हम भाई-बहनों का साथ थोड़ा कम ही रहा। पर जितने भी पल हमने साथ-साथ गुजारे, उसे हमने एक पवित्र प्रेम की डोर में बड़े ही भोलेपन से नटखट शैतानियों, अडिग विश्वास और कभी न साथ छूटने वाले भाव को सरलता और सहजता से सजाया है।

परन्तु मुझे लगता है आजकल के इस बदलते परिवेश में और त्यौहारों की तरह रक्षाबंधन का भी औचित्य बदला है इस बंधन के मिठास के बदले अब दिखावे कड़वाहट ने जगह बना ली है रक्षाबंधन का जो रस था, उसमें सादगी, उन्माद और उत्सव की मिश्रित चाशनी घुली रहती थी। अब महज़ धन और अवकाश के घोल ने इसका स्वाद खट्टा किया है। मुझे याद है उन दिनों जब मैं बोर्डिंग स्कूल में पढ़ा करता था, तो रक्षाबंधन के त्यौहार पर सिर्फ एक दिन का अवकाश होता था। ऐसे में घर दूर होने कि वजह से जाना मुमकिन नहीं हो पाता था। फिर भी शायद ही ऐसा कोई साल बीता, जब मेरी कलाई पर राखी न बंधी हो। बहनें रंगबिरंगे धागों पर झिलमिलाते चमकीले कागजों को काट कर, उसपर विश्वास के मोती लगा कर ‘राखी’ का रूप देती थीं। उन राखियों में उनका लगन और अनमोल प्रेम प्रतिबिम्बित होता था। वो राखियां आज के दौर में बनी सोने चांदी की राखियों से बहुमूल्य होती थीं। मैं भी उन राखियों को अपनी कलाई पर बांधने के लिए आतुर रहता था। और कभी-कभी तो मैं इन्हें एक-दो दिन पहले ही अपनी कलाई पर खुद बांध कर इतराता घूमता था। कह सकता हूं कि हमारे इस अभिन्न प्रेम की प्रतीक ये भावनात्मक राखियां इस त्यौहार के औचित्य को हमेशा ही हमारे बीच ज़िंदा रखती हैं।

इस बार डाक समस्या के कारण बहनों द्वारा भेजी गई राखियां अभी तक प्राप्त नहीं कर पाया हूं। ऐसा भी संभव है कि इस बार रक्षाबंधन के दिन मेरी कलाई में राखी न हो। ऐसे में बहनों का बार-बार फ़ोन कर के चिंता व्यक्त करना भी सहज है। पर यह चिंतन सांसारिक या आकांक्षी न होकर भावनात्मक चिंतन ज्यादा है। इस त्यौहार का प्राण ही इसकी भावनात्मक सादगी है। यही कारण है कि यह त्यौहार किसी भी तरह के दिखावे और विलासिता से बहुत दूर दिखता है। श्रीकृष्ण ने द्रौपदी को बहन माना। यह आत्मीयता स्नेह और संवेदनाओं से जुड़ा था चित्तौड़ की राजमाता कर्मावती ने मुग़ल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजकर अपना भाई बनाया यह बंधन शक्ति कि लालसा न होकर भावपूर्ण विचार का प्रतीक था इसमें प्रेम और परम्पराओं की रक्षा का पवित्र भाव था


आतुर मैं भी हूं कि इस आत्मीयता और स्नेह के बंधन को अपने कलाइयों पर सजाऊं, पर निराश नहीं हूं, क्योंकि रक्षाबंधन भावनाओं की विशालता का त्यौहार है पवित्र प्रेम के प्रतीक यह कोमल धागे हमारे ह्रदय के कपास से बने होते हैं, जो अगर किसी कारणवश ‘राखी’ का रूप न भी ले पाएं, तब भी यह प्रेम और विश्वास के बंधन में हमें बांधे रखती हैं

“बहन हर रक्षाबंधन की तरह इस बार भी तुम्हे कुछ भेंट करना चाहता हूं, पर कब कभी भी तुम्हारी खुशियां, तुम्हारी मुस्कराहट के तुल्य वस्तु  की तलाश में निकलता हूं, तो सैदव ही खुद को असमर्थ पाता हूं।एक चीज़ जो मैं तुम्हे बेहद सरलता से भेंट कर सकता हूं, वह है मेरा तुम्हारे प्रति स्नेह है। जो मेरा कर्तव्य ही नहीं, बल्कि मेरी निष्ठा भी है। इसे सहर्ष स्वीकार करना।”

यह सच है कि दुनिया का कोई भी प्राणी किसी प्रकार का भी बंधन स्वीकार नहीं करता। मानव जिस बात को बंधन समझता है, वह तुरंत उसे काट डालने का प्रयास करता है। प्रेम ही एकमात्र ऐसा बंधन है, जिसमें बंधने की इच्छा हर किसी की होती है। इसलिए रक्षाबंधन सबसे न्यारा और प्यारा बंधन कहलाता है

आशा करता हूं कि आप स्नेह और विश्वास के इस त्यौहार को और भी खास बनाएंगे। अगर आप अपने भाई-बहन के करीब हैं, तो जाइए बिना किसी दिखावे के बेहद सादगी से गले लगा कर और अगर उनसे दूर हैं तो उनसे बात करके अपनी भावनाओं और संवेदनाओं को व्यक्त करिए। और विश्वास दिलाइए कि यह बंधन आपकी भावनाओं में गुथकर और भी मजबूत होता जाएगा। मेरी और समस्त टॉपयप्स टीम की तरफ से आप सभी को रक्षाबंधन की मंगल कामनाएं।

Popular on the Web

Discussions