बाड़मेर का यह मंदिर हो सकता था खजुराहो जितना प्रसिद्ध; पत्थरों में पिरोया है सौन्दर्य

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11:16 pm 26 Feb, 2016

राजस्थान के बाड़मेर जिले में स्थित किराडू मंदिर अपनी शिल्प कला के लिए विख्यात है। इन मंदिरों का निर्माण 11वीं सदी में हुआ था। किराडू को राजस्थान का खजुराहो भी कहा जाता है। नींव के पत्थर से लेकर छत के पत्थरों में सौंदर्य जैसे पिरोया हुआ है।

मंदिर परिसर में बने गजधर, अश्वधर और नरधर, नागपाश से समुद्र मंथन और स्वर्ण मृग का पीछा करते भगवान राम की उत्कीर्णित मूर्तियां जीवन्त प्रतीत होती हैं। ऐसा लगता है मानो ये प्रतिमाएं शांत होकर भी आपको खुद के होने का एहसास करा रही हैं।

ऐसी नायाब खूबसूरत कला के बावजूद किराडू को खजुराहो जैसी ख्याति नहीं मिल पाई, क्योकि यह जगह पिछले 900 सालों से वीरान है। आज भी यहां पर सिर्फ दिन में कुछ चहल-पहल रहती है।

शाम होते ही यह जगह वीरान हो जाती है। सूर्यास्त के बाद यहां कोई नहीं रुकता। कुछ लोगों का मानना है की किराडू मुगलों के आक्रमण की वजह से वीरान हुए थे।

कुछ अन्य विशेषज्ञ इसका खंडन करते हैं। वे कहते हैं कि मुगलों के आने से दो दशक पहले ही यह क्षेत्र वीरान हो गया था।

एक साधू के शाप से वीरान हुआ क्षेत्र!

किवदंतियों के मुताबिक, इस शहर पर एक साधु का श्राप लगा है। करीब 900 वर्ष पूर्व परमार राजवंश का यहां राज था। उन दिनों इस शहर में एक ज्ञानी साधु भी रहने आए थे। यहां पर कुछ दिन बिताने के बाद साधु देश भ्रमण पर निकले, तो उन्होंने अपने साथियों को स्थानीय लोगों के सहारे छोड़ दिया।

एक दिन सारे शिष्य बीमार पड़ गए और बस एक कुम्हारिन को छोड़कर अन्य किसी भी व्यक्ति ने उनकी देखभाल नहीं की। साधु जब वापस आए तो उन्हें यह सब देखकर बहुत क्रोध आया। साधु ने कहा कि जिस स्थान पर दया भाव ही नहीं है, वहां मानव-जाति को भी नहीं होना चाहिए।

इस घटना से क्रुद्ध होकर उन्होंने संपूर्ण नगरवासियों को पत्थर बन जाने का श्राप दे दिया। जिस कुम्हारिन ने उनके शिष्यों की सेवा की थी, साधु ने उसे शाम होने से पहले यहां से चले जाने को कहा और यह भी सचेत किया कि पीछे मुड़कर न देखे। लेकिन कुछ दूर चलने के बाद कुम्हारिन ने पीछे मुड़कर देखा और वह भी पत्थर की बन गई।

कहा जाता है कि इस श्राप के बाद अगर शहर में शाम ढलने के पश्चात कोई रहता था, तो वह पत्थर का बन जाता था। यही कारण है कि यह शहर सूरज ढलने के साथ ही वीरान हो जाता है।

निर्माताओं के बारे में नहीं है पुख्ता जानकारी


किराडू के मंदिरों का निर्माण भी इसके इतिहास सरीखा ही संदेहास्पद है। यह मंदिर किसने बनवाया, क्यों बनवाया किसी को नहीं पता। हालांकि, यहां पर 12वीं शताब्दी के तीन शिलालेख उपलब्ध हैं, पर उन पर भी इनके निर्माण से सम्बन्धित कोई जानकारी नहीं है।

यहां मिला पहला शिलालेख विक्रम संवत 1209 माघ चतुर्दशी तदनुसार अर्थात 24 जनवरी 1153 का है, जो गुजरात के चालुक्य कुमार पाल के समय का है। दूसरा विक्रम संवत 1218 (1161 ईसवी) का है, जिसमें परमार सिंधुराज से लेकर सोमेश्वर तक की वंशावली दी गई है और एक अन्य तीसरा विक्रम संवत 1235 (1178 ईसवी) का है। जो गुजरात के चालुक्य राजा भीमदेव द्वितीय के सामंत चौहान ‘मदन ब्रह्मदेव’ के काल खंड का है।

इतिहासकारों का मत है कि किराडू के मंदिरों का निर्माण 11वीं शताब्दी में हुआ था तथा इनका निर्माण परमार वंश के राजा दुलशालराज और उनके वंशजों ने किया था।

खजुराहो की भांति हैं ‘किराडू’ के मंदिर

किराडू में किसी समय पांच भव्य मंदिरों कि एक श्रृंखला थी। सोमेश्वर मंदिर भगवान शिव को समर्पित है। भगवान शिव को समर्पित इस मंदिर की बनावट दर्शनीय है। अनेक खम्भों पर टिका यह मंदिर भीतर से दक्षिण के मीनाक्षी मंदिर की याद दिलाता है, तो इसका बाहरी आवरण खजुराहो के मंदिर का अहसास कराता है।

काले व नीले पत्थर पर हाथी-घोड़े व अन्य आकृतियों की नक्काशी मंदिर की सुन्दरता में चार चांद लगाती है। मंदिर के भीतरी भाग में बना भगवान शिव का मंडप भी बेहतरीन है।

बेजोड़ स्थापत्य कला के अद्भुत नमूने हैं किराडू के मंदिर

किराडू श्रृंखला का दूसरा मंदिर भगवान विष्णु को समर्पित है। यह मंदिर सोमेश्वर मंदिर से छोटा है, किन्तु स्थापत्य व कलात्मक दृष्टि से काफी समृद्ध है। इसके अतिरिक्त किराडू के अन्य 3 मंदिर हालांकि खंडहर में तब्दील हो चुके हैं, लेकिन इनके दर्शन करना भी एक सुखद अनुभव है।

पूर्वार्ध में आये भूकम्प से इन मंदिरों को बहुत नुकसान पहुंचा और सदियों से वीरान रहने के कारण इनका ठीक से रख रखाव भी नहीं हो पाया। आज इन पांच मंदिरों में से केवल विष्णु मंदिर और सोमेश्वर मंदिर ही ठीक हालत में है। सोमेश्वर मंदिर यहाँ का सबसे बड़ा मंदिर है।

ऐसी मान्यता है कि विष्णु मंदिर से ही यहां के स्थापत्य कला की शुरुआत हुई थी और यहीं सोमेश्वर मंदिर को इस कला के उत्कर्ष का अंत माना जाता है।

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