महज 5 साल की उम्र में खो दिए थे अपने दोनों हाथ और पैर, आज हैं एक काबिल अफसर

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2:00 pm 30 Jun, 2016


नन्ही चींटीं जब दाना ले कर चढ़ती है

चढ़ती दीवारों पर सौ बार फिसलती है

मन का विश्वास रगों मे साहस भरता है

चढ़ कर गिरना, गिर कर चढ़ना न अखरता है

मेहनत उसकी बेकार नहीं हर बार होती

कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती।

सोहनलाल द्विवेदी की यह चन्द पंक्तियां अक्सर मुझे प्रेरणा देती रहती हैं। मैने अक्सर देखा है लोग अपनी कमज़ोरी या असफलता से हताश होकर जीने की आस छोड़ देते हैं, लेकिन यकीन मानिए आपके आसपास ऐसे बहुत से लोग मौजूद हैं, जिनसे आप जीना सीख सकते है। ऐसे लोग समाज के लिए प्रेरणा होते हैं, जिन्होंने अपनी कमजोरी को अपनी ताकत बनाई और लोगो में जीने की अलख जगाई। आइये, आज आपको उन्हीं भारतीयों में से एक ऐसे साहसी आदमी से मिलवाते हैं, जिनसे आप जीने की कला सीख सकते हैं।

हैदराबाद के रहने वाले 29 वर्षीय राजा महेंद्र प्रताप ने महज 5 साल की उम्र में एक हादसे में अपने दोनो हाथ पैर खो दिए थे। विकलांग हो चुके बचपन की वजह उन्हे 10 साल घर में ही बिताने पड़े। वह स्कूल तक नहीं जा सके। लेकिन आज वे ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC) के अहमदाबाद ऑफिस में फाइनेंशियल एंड अकाउंट्स ऑफिसर के पद पर तैनात हैं।

एक ग़लती की वजह से विकलांग हुआ बचपन

हैदराबाद के रहने वाले प्रताप की एक गलती ने उनको बचपन में ही विकलांग कर दिया था। दरअसल, प्रताप के दोस्तों ने उनसे शर्त लगाई कि वह खुले बिजली के तार से लोहे की छड को नहीं पकड़ सकता। प्रताप ने बिना सोचे-समझे साहस दिखाया और उस लोहे की छड को पकड़ लिया, जिससे खुले बिजली के तार जुड़े हुए थे।

इस घटना का परिणाम यह हुआ कि हाई वोल्टेज करंट की चपेट में आने से प्रताप के दोनों हाथ और पैर भयंकर रूप से झुलस गए। इन अंगों को उनके शरीर से अलग करना पड़ा।

शर्म महसूस करते थे माता-पिता

प्रताप की ज़िंदगी चाहरदीवारी में क़ैद हो गई थी। यहां तक कि उनके पिता भी उन्हें बोझ समझने लगे थे। उनके पिता उन्हें घर आए लोगों से मिलने भी नही देते थे। पिता को शायद अपने बेटे की लाचारी पर शर्म आती थी। प्रताप के लिए ज़िंदगी इस कदर बदतर हो गई थी कि उनके कपड़े सिलने के नाप लेने के लिए दर्जी को घर पर बुलाया जाता था। इसी तरह बीमार होने पर डॉक्टर भी उनके घर पर आता था। प्रताप कहते हैं कि उनकी ज़िंदगी में सिर्फ़ मायूसी रह गई थी।


बहनों ने बढ़ाया हौसला तो बिना हाथ पैरो के जीना सीख लिया

ऐसी कठिन परिस्थिति में उनकी तीन बड़ी बहनों ने उनको साहस बंधाया। प्रताप को यह समझ आ गया था कि ज़िंदगी की गाड़ी आगे खीचाने के लिए उन्हें अपनी इसी कमज़ोरी को ताक़त बनाना होगा। उन्होंने उन दस वर्षो में घर पर रहते हुए अपनी बहनों की मदद से उनकी ही कई किताबे पढ़ी और उनसे ज्ञान लिया। चल नहीं पाने के बावजूद इस दौरान प्रताप ने अपने शरीर को घुटनो के सहारे घिसते हुए चलने का प्रयत्न किया। अब धीरे-धीरे प्रताप ने अपने मुंह और टखने के सहारे चलना सीख लिया और चीजें उठाना शुरू कर दिया।

प्रताप ने वह काम कर दिखाया, जिसे सोच पाना भी नामुनकिन था। प्रताप ने अपने मुंह और टखने की सहायता से कंप्यूटर चलाना शुरू कर दिया, जबड़े की सहायता से लिखना शुरू कर लिया और घुटनों की सहायता से चलना शुरू कर दिया।

जब प्रताप की हिम्मत और लगन बन गयी मिसाल

हालांकि, प्रताप को स्कूल जाने का अवसर तो प्राप्त नही हुई लेकिन उन्होंने दसवीं और बारहवीं की पढ़ाई घर से ही पूरी की। उनको सिर्फ़ परीक्षा देने के लिए ही बाहर भेजा जाता था। उन्होंने एक मोची की मदद से अपने लिए एक स्पेशल सैंडल बनवाई। हैदराबाद की ओस्मानिया यूनिवर्सिटी से उन्होंने पहले बी.कॉम और फिर फाइनेंस में एमबीए किया। एमबीए के लिए प्रताप को नेशनल सेंटर फॉर प्रमोशन ऑफ इम्प्लॉयमेंट फॉर डिसेबल्ड पीपुल से स्कॉलरशिप मिली थी। आज वह खुद इतने सक्षम हो गए हैं कि विकलांग बच्चो को छात्रवृत्ति देते हैं।

समाज ने नकारा, लेकिन नही टूटी हिम्मत

अब उन्हें काम की तलाश थी उन्हें जॉब के लिए कई कॉल आए, लेकिन जब उनका साक्षात्कार हुआ तो प्रताप की विकलांगता देखकर लोगों की मानसिकता बदल गई, क्योंकि कोई भी एक विकलांग व्यक्ति को अपनी कम्पनी में लेने को तैयार नही था। उनको ये विश्वास नहीं था कि उनको दिया गया काम वो पूरा कर पाएगा या नहीं।

समाज के इस रवैये ने प्रताप को तोड़ कर रख दिया था, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने हिम्मत नहीं हारी।अंतत: प्रताप को दिल्ली के नेशनल हाउसिंग बैंक में असिस्टेंट मैनेजर की नौकरी मिल गई। और यह पहला मौका था जब उनके पिता को अपने पुत्र पर गर्व महसूस हुआ था। आज वह ऑयल एंड नेचुरल गैस कॉर्पोरेशन (ONGC) के अहमदाबाद ऑफिस में फाइनेंशियल एंड अकाउंट्स ऑफिसर के पद पर हैं।

इच्छा शक्ति से गिरा दी विकलांगता की दीवार

अब प्रताप समाज के साथ कदम मिला कर चल रहे हैं। उन्हें उनके सहकर्मियों से भी काफ़ी प्रोत्साहन मिलता रहता है। उनके सभी सहयोगी उनके हुनर और काबिलियत की तारीफ करते नहीं थकते। वह अपने दैनिक जीवन के सारे काम खुद करते हैं और यहाँ तक प्रताप बस, ट्रेन और प्लेन में भी बिना किसी की मदद के आसानी से चढ़ लेते हैं।

खुद पर हंसना सीख लिया

प्रताप बताते हैं कि उनकी कमज़ोरी ही आज उनकी ताक़त है। वह कहते हैं कि उन्होंने खुद पर हंसना सीख लिया है। जब भी कोई उन्हें विकलांग या नाटा कहता है तो उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा देते है। जिससे सामने वाले को खुद की ग़लती पर एहसास होता है। खुद पर हसने वाले आदमी को संसार में आगे बढने से कोई नही रोक सकता है, क्योंकि वह दूसरों की बातों से भटकने के बजाय अपने लक्ष्य की तरफ अग्रसर रहता है।

प्रताप के जीवन से हम सभी लोगों को यह सीख लेनी चाहिए कि इस दुनिया में कुछ भी ना-मुमकिन नहीं है। आप अपनी बड़ी-से-बड़ी कमजोरी को भी ताकत बना सकते हैं। हम सभी उनके बेहतर भविष्य के लिए कामना करते हैं। साथ ही जीवन को बिना पछतावे से जीने के लिए बहुमोल सीख देने के लिए धन्यवाद करते हैं।

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