डिजिटल मीडिया के युग में पोस्टकार्ड को बचाने की मुहिम चला रहे हैं लोखंडे

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10:49 am 7 Dec, 2015

डिजिटल मीडिया के इस युग में एक व्यक्ति ऐसा भी है, जो पुरानी संचार प्रणाली को जिन्दा रखना चाहता है। जी हां, पुणे के सामाजिक कार्यकर्ता और उद्यमी प्रदीप लोखंडे ऐसा ही कर रहे हैं। उन्होंने पुरानी प्रणाली को बचाने का तरीका भी खोज लिया है।

वह पोस्टकार्ड के माध्यम से 58 लाख ग्रामीण लोगों के साथ संचार स्थापित करते हैं। इसी क्रम में उन्हें रोज़ाना 150 पोस्टकार्ड प्राप्त होते हैं। इसके इलावा उनके पास 49 हजार गांवों की सूची है, जिनमें 58 सौ से अधिक गांवों का वह दौरा कर चुके हैं।

प्रदीप लोखंडे कहते हैंः

“एक पोस्टकार्ड अब भी मेरे चेहरे पर मुस्कान भर देता है । मुझे महाराष्ट्र के गांवों के बच्चों से 94,000 पोस्टकार्डस मिल चुके हैं , जिनकी वजह से लगभग 3055 पुस्तकालयों को खोलने में मदद मिली।”

भारत के पोस्टकार्ड मैन के रूप में पहचाने जाने वाले लोखंडे का पता सिर्फ़ एक लाइन का है – प्रदीप लोखंडे , पुणे, 411,013

और इसकी वजह है सैकड़ों चिट्ठियां, जो उन्हें रोज प्राप्त होती हैं।

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पोस्टकार्ड लिखने की इस परम्परा की शुरूआत की थी लोखंडे के पिता और पत्नी ने। इन दोनों ने मिलकर करीब 20 हजार से अधिक पोस्टकार्ड 47 सौ गांवों में शिक्षकों, सरपंचों और पोस्टमास्टरों को साप्ताहिक बाजार के बारे में जानकारी हासिल करने के लिए लिखी थी। लेकिन इसका नतीजा सही नहीं था।


यही वजह है कि लोखंडे को उन गांवों में जाने की जरूरत महसूस हुई साथ ही वहां रोजगार दर, साक्षरता आदि पर काम करने की प्रेरणा भी। और धीरे-धीरे उनको पोस्टकार्ड्स के जवाब भी मिलने शुरू हो गए।

1996 में, उन्होने अपने पास उपलब्ध आंकड़ों को लेकर टाटा टी और पार्ले जैसी कंपनियों से संपर्क साधा। लोखंडे का मानना था कि कंपनियां इस संवाद के आधार पर उपभोक्ताओं के व्यवहार को अच्छी तरह समझ सकती हैं और इससे ग्रामीण भारत में अधिक रोजगार के अवसर पैदा हो सकते हैं।

इसी क्रम में उन्होंने रूरल रिलेशन्स नामक संगठन की शुरुआत की। उसके बाद से लेकर अब तक अलग-अलग अभियानों से जुड़े रहे हैं। करीब 540 गांवों में उन्होंने 600 कम्प्युटर लगाए हैं, ताकि बच्चों को स्कूल जाने के लिए प्रोत्साहित किया जा सके। साथ ही लोगों को उनके व्यापार आदि में मदद मिल सके।

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प्रदीप लोखंडे की पृष्ठभूमि सामान्य रही है। उन्होंने नॉन रेसिडेंट विलेजर्स (एन.आर.वी.) कॉन्सेप्ट की शुरुआत की है। इसके माध्यम से शहर चले गए लोगों को प्रोत्साहित किया जाता है कि वे एक गांव गोद लें और इसका विकास करें।

लोखंडे कहते हैंः

“हम से हर कोई एन आर वी है, हमारी जड़ें किसी ना किसी रूप से गांवों से जुड़ी हैं । एक एन आर वी होने के नाते हमे हमेशा तत्पर्य होकर ग्रामीण भारत का समर्थन और योगदान करना चाहिए ताकि उनका विकास हो सके ।”

उन्होने, छात्रों के बीच पढ़ने की आदतों को मन में बिठाने के लिए ज्ञान -कुंजी नाम के पुस्तकालय की शुरूवात की  ।  यह पुस्तकालय छात्रों के लिए और छात्रों से ही था , जिसमे मौजूद किताबें उनके जन्मदिन के मौके पर छात्रों द्वारा दान की गयी थी   ।

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