हाजी अली दरगाह; जिसके रुतबे पर समंदर भी सिर झुकाता है

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6:18 pm 6 Jul, 2016


खुदा अपने वलियों से होता है राज़ी

मिलेगी ये दर से हमें सरफ़राज़ी

यहाँ दिल से माँगो ये हाजी अली हैं

खुदा के वली हैं

हिन्दुस्तान की ज़मीन पर अनेक शहरों में मुख़्तलिफ़ इबादत की जगह हैं। बेशक़ इन्हें मंदिर, मस्जिद, दरगाह, गिरजाघर, गुरुद्वारा के अलग-अलग नाम से पुकारा जाता हैं, पर हैं तो सभी उसी मालिक की इबादत की जगह। उन्ही में से एक है हम सब के प्यारे, अवाम के आका हाजी अली शाह बुखारी की दरगाह। जो हाज़ी अली नाम से मशहूर है।

हाजी अली दरगाह, मुंबई। हाजियों के हाजी, वलियों के वली, समंदर के नवाज़, दिलों के सरताज, लहरों के बादशाह पिया हाज़ी अली के सजदे में ज़ाहिद कहते हैं कि उनका रुतबा इतना बड़ा है कि उनके नूर के आगे पूरी दुनिया छोटी नज़र आती है। हम बसर इस काबिल भी नही हैं कि उनके सजदे में चादर बिछा सकें, क्योंकि इस फकीर ने तो समंदर बिछा रखा है।

हाजी अली की दरगाह मुंबई के वरली तट के निकट स्थित एक छोटे से टापू पर स्थित हैं। इसे सैय्यद पीर हाजी अली शाह बुखारी की स्मृति में वर्ष 1431 में बनाया गया था।

माना जाता है कि यह दरगाह करीब 500 साल पुरानी है। मस्जिद, दरगाह, दरगाह के पास बने मकान और दरगाह का मुख्य दरवाज़ा इन सभी की नए सिरे से तामीर वर्ष 1948 से लेकर वर्ष 1980 के बीच हुई है। दरगाह के अंदर तरह-तरह के कक्ष हैं। कव्वालखाना और महिलाओं के विश्राम करने की जगह का निर्माण 1940 से 1950 के बीच किया गया था।

रोज करीब 5 से 10 हजार लोग इस दरगाह पर सलामी देने आते हैं। लोगों की तादाद जुम्मा, जुम्मेरात और इतवार के दिन 10 से 20 हजार तक पहुंच जाती है। साथ ही लाखों की तादाद में लोग रमज़ान और बकरीद के अगले दिन अपनी बिगड़ी किस्मत को संवारने हाज़ी अली के दरगाह पर आते हैं।

दरगाह का क्षेत्र समंदर के 4500 मीटर के दायरे में फैला हुआ है। इसलिए हाजी अली को समंदर का बादशाह भी नवाज़ा जाता है। दरगाह की मस्जिद और बाहरी दीवारें ख़ासकर सफेद रंग से नूर समेटे हुए है। दरगाह के ही पास एक 85 मीटर की मीनार है जो इस पाक दरगाह की पहचान है। कहते हैं इस मीनार की बुलंदियों को सूरज भी सलाम करता है।


दरगाह शरीफ में पाक धागा बांधने की रिवायत है। यह धागा लाल और पीले रंग का होता है। इस धागे को बांध कर दरगाह शरीफ में आने वाला मुरीद अपने दिल से दुआ मांगता।मुअज्जिन दरगाह की मीनार पर चढ़कर दिन में पांच बार अज़ान देते हैं और अपने मुसलमान भाइयों को नमाज़ के लिए बुलाते हैं।

हाजी अली शाह बाबा वाकई में रहम के सागर हैं, इसलिए हाजी अली दरगाह पर आने वाले हर मुरीद की हर जायज़ मन्नत पूरी होती है। इसी वजह से कहा जाता है कि पिया हाजी अली के दर से कोई खाली हाथ नहीं जाता। मुराद पूरी होने के बाद बाबा के मुरीद उनका शुक्रिया अदा करने के लिए दरगाह में सलामी देते हैं और फूल और चादर चढ़ाते हैं।

पीर साहब की रहमत

वर्ष 1944 में जब मोहम्मद हाजी अबु बकर दरगाह के हुकूमरान बने तो उन्होंने दरगाह के लिए एक पक्का रास्ता बनाने की सोची। पर साथ में उन्हें यह भी डर था कि कहीं बारिश की वजह से रास्ता टूट ना जाए। एक दिन अबु बकर साहब के पास एक बुजुर्ग आए और उन्होंने बताया कि हाज़ी अली साहब उन्हे ख्वाब में आए थे और उन्होंने उनसे पूछा कि उन्होंने दरगाह में हाज़िरी भरना क्यों बंद कर दिया ?

तब हाजी अली शाह ने उस बुजुर्ग से कहा कि दरगाह के लिए रास्ता ठीक न होने की वजह से उन्हे वहां जाने में मुश्किल होती है। और इसलिए वह दरगाह नहीं जा पाते। इस पर हाजी अली शाह ने कहा दरगाह का रास्ता तैयार हो गया है। और उन्हें दरगाह जाने में किसी मुश्किल का सामना नहीं करना पड़ेगा।

हालांकि, दरगाह के लिए रास्ते का निर्माण कार्य तब शुरू भी नहीं हुआ था। पर यह हाज़ी अली शाह की तरफ से यह इशारा था कि अब उन्हें अधिक इंतज़ार नहीं करना चाहिए। दरगाह के रास्ते का काम शुरू कर देना चाहिए।

यह पीर साहब की रहमत ही है कि आज तक दरगाह के रास्ते को कोई नुकसान नहीं हुआ है। आप मुंबई के मानसून से भलीभांति वाकिफ़ होंगे कि कैसे बरसात के मौसम में वहां की सड़कों का बुरा हाल हो जाता है। लेकिन इसे आप चाहें पीर साहब का तमाशा कह लें, या चमत्कार कि आज तक किसी को दरगाह पहुंचने के लिए इन रास्तों पर तकलीफ़ों का सामना नहीं करना पड़ा है।

इस दरगाह पर सभी धर्म के लोग अपनी मुरीद लेकर आते हैं। यहां हर एक मज़हब के फूलों की खुशबू महकती है। यह नूरानी जगह हाजी अली बाबा की मस्ती है। फकीरों के लिए यह जन्नत है। आजतक लाखों परेशानहाल लोगों ने इस दरबार से अपनी मुरादें पाई हैं और रहमतों से अपनी झोलिया भरी हैं। बदनसीब आए नसीब चमका कर गए, फकीर आए माला-माल होकर गए।

ऐसा लगता है कि समंदर के सीने पर बाबा हाजी अली की दरगाह के सूरत में रहमत का समंदर अपनी रोशनी बांट रहा है।

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