मात्र 21 साल की उम्र में पाकिस्तानी टैंकों के परखच्चे उड़ा दिए थे शहीद अरुण क्षेत्रपाल ने

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11:41 am 7 Apr, 2016


“यह आपके बेटे के संबंध में है, जो निश्चित रूप से भारत का हीरो है। हालांकि, उस दिन (युद्ध के दिन) हम दोनों ही सैनिक थे, एक-दूसरे से अंजान, अपने-अपने देशों की सुरक्षा और सम्मान के लिए लड़ रहे थे। मुझे आपको बताने में बेहद अफ़सोस हो रहा है कि आपके बेटे की मृत्यु मेरे हाथों हुई। अरुण का साहस आदर्श था और वह बेखौफ़ होकर अपनी जान की परवाह किए बगैर अपने टैंक के साथ बढ़ रहा था। और आख़िर में सिर्फ़ हम दोनों बचे। हम दोनों एक-दूसरे के सामने थे। हम दोनो ने ही गोले दागे। पर यह तो किस्मत थी मुझे जीना था और उसे ‘अमर’ होना था।”

यह शब्द पाकिस्तानी ब्रिगेडियर ख्वाजा मोहम्मद नसीर के हैं। जो उन्होंने ‘परमवीर चक्र’ लेफ्टिनेंट अरुण क्षेत्रपाल के पिता ब्रिगेडियर एम.एल. क्षेत्रपाल से कहे थे। वर्ष 2001 में अरुण के पिता ब्रिगेडियर एम.एल. क्षेत्रपाल अपने जन्मस्थान पाकिस्तान गए थे, और उनकी मेजबानी कर रहे थे, पाकिस्तानी ब्रिगेडियर नसीर।

किसी भी पिता के लिए यह गर्व की बात होगी कि दुश्मन सेना का ब्रिगेडियर उसके बेटे की ‘अमर शौर्य गाथा’ बयान कर रहा है।

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4 अक्टूबर 1950 को जन्मे लेफ्टिनेंट अरूण क्षेत्रपाल, लेफ्टिनेंट कर्नल एम.एल.क्षेत्रपाल (जो बाद में ब्रिगेडियर बनाए गए) के बेटे हैं। अरुण वर्ष 1967 में एनडीए में शामिल हुए। बाद में उन्होंने भारतीय सैन्य अकादमी में दाखिला लिया। जून 1971 में अरुण 17 पूना हॉर्स में अधिकृत किए गए।

44 साल पहले 1971 के भारत-पाकिस्तान के बसंतर की ऐतिहासिक युद्ध के हीरो रहे ‘परमवीर चक्र’ लेफ्टिनेंट अरुण क्षेत्रपाल उस समय मात्र 21 साल के थे।

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पर उन्हें कम उम्र का कहना नादानी होगी। बचपन से ही वह भारत माता की रक्षा के सपने देखते थे। उनकी नस-नस में सिर्फ़ देश भक्ति का लहू दौड़ता था। भारत-पाकिस्तान के बसंतर युद्ध से कुछ दिन पहले ही उनको आर्मी के 17 पूना हॉर्स में शामिल किया गया था। आख़िर, भारत माता के लिए खुद को न्योछावर करने का सुअवसर सबको कहां मिलता है।

अरुण क्षेत्रपाल के बचपन की फोटो

अरुण क्षेत्रपाल के बचपन की फोटो

देश और सेना के लिए अरुण का समर्पण अतुलनीय था। युद्ध की घोषणा होने की वजह से अरुण को वापस 17 पूना हॉर्स जाना था। वह अपने एक साथी जवान के साथ ट्रेन में थे। अरुण ने उस वक़्त आर्मी समारोह में पहने जाने वाली यूनिफॉर्म पहन रखी थी। जब उनके साथी जवान ने युद्ध के लिए सफ़र कर रहे अरुण से उनके यूनिफॉर्म पर हैरानी जताई, तो जो जवाब अरुण ने दिया वह उनके निडर इरादों और आत्मविश्वास को बयान करते हैं। अरुण ने कहा थाः

“मेरा लाहौर में गोल्फ खेलने का प्लान है और मुझे यकीन है कि वहां उस रात डिनर पार्टी होगी, जब हम युद्ध जीत जाएंगे। तब मुझे इस नीले रंग की यूनिफॉर्म की जरूरत पड़ेगी।”

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जब 21 साल के इस भारत के सपूत की शहादत से लाल हो गई बसंतर नदी। 

वर्ष 1971 भारत-पाकिस्तान युद्ध में पश्चिम पाकिस्तान में भीषण युद्ध चल रहा था। पाकिस्तान ने कश्मीर को पंजाब से अलग करने के लिए शकरपुर में बसंतर नदी पर सैन्य बलों का अभेद्य किले जैसा जमावड़ा कर लिया था। बसंतर का युद्ध इस दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि बिना इसके फ़तह किए अखनूर में लडती भारतीय सेना के लिए आगे बढ़ना नामुमकिन था।

परिवार संग अरुण क्षेत्रपाल

परिवार संग अरुण क्षेत्रपाल

भारतीय सेना के पास एक ही रास्ता बच गया था और वह था बसंतर नदी को पार करके पाकिस्तान की सीमा में सेंध मार दुश्मनों के हौसलों को पस्त करना। लेकिन यह इतना आसान नहीं था। शकरपुर में बड़ी संख्या में तैनात दुश्मन के टैंक और राहों में बिछे माइन-फील्ड्स किसी काल से कम नहीं थे। लेकिन यह इतिहास लिखने का दिन था। यह दिन अमर होने का था।


दिन था 16 दिसंबर। पाकिस्तान के दस टैंक के मुकाबले खड़े थे भारत के तीन टैंक।

पाकिस्तानी टैंक तेजी से बसंतर नदी की और बढ़ रहे थे, जिसके सामने दीवार बन कर खड़े थे, भारत के तीन टैंक। कर्नल मल्होत्रा, लेफ्टिनेंट अहलावत और सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण क्षेत्रपाल भारतीय सेना की कमान संभाल रहे थे। 3 टैंकों के भीषण आक्रमण से 7 पाकिस्तानी टैंक ध्वस्त हो गए, लेकिन इस लड़ाई में कर्नल मल्होत्रा और लेफ्टिनेंट अहलावत बुरी तरह से जख्मी हो गए। ऐसे समय में पूरी जिम्मेदारी अरुण क्षेत्रपाल के कंधों पर आ गई।

पाकिस्तानी टैंको को क़ब्ज़े में लिए हुए भारतीय सैनिक ninefinestuff

पाकिस्तानी टैंको को क़ब्ज़े में लिए हुए भारतीय सैनिक ninefinestuff

जब मिला वापस लौटने का आदेश, तो बंद कर दिया वायरलेस।

दुश्मन टैंक के हमले से अरुण क्षेत्रपाल के टैंक में आग लग गई। उन्हें लौटने के आदेश मिल गए, पर अरुण के दिमाग़ में कुछ और ही चल रहा था। उन्होंने निडरता से संदेश दियाः

 “मेरी बंदूक चल रही है, मैं अभी नही लौटूँगा, आउट।”

3 टैंकों से अकेले घिरे अरुण क्षेत्रपाल ने वायरलेस बंद कर दिया। देखते ही देखते पाकिस्तान के दो टैंक को उन्होंने अकेले ही उड़ा दिया। लेकिन तभी एक गोला उनके टैंक पर आकर गिरा।

अरुण बुरी तरह घायल हो गए। टैंक के ड्राईवर ने टैंक वापस ले जाने की गुजारिश की, लेकिन अरुण ने मैदान में डटे रहने का आदेश दिया। दुश्मन का आखिरी टैंक उनसे मात्र 100 मीटर की दूरी पर था। दोनों ही टैंकों ने एक-दूसरे गोले दागे। इस तरह आख़िरी पाकिस्तानी टैंक का भी काम तमाम हो गया। इसके साथ ही भारत के इस वीर सपूत ने भी हमेशा के लिए अपनी आंखें मूंद ली।

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सेकेंड लेफ्टिनेंट अरुण क्षेत्रपाल के अदभुत शौर्य और पराक्रम की वजह से भारत को न केवल एक जीत मिली, बल्कि 1971 के युद्ध का पासा ही पलट गया। बसंतर की जीत ने पाकिस्तान के हौसले पस्त कर दिए। भारतीय सेना नें इस भीषण युद्ध में पाकिस्तान के 45 टैंको के परखच्चे उड़ा दिए और दस पर कब्ज़ा कर लिया।

अरुण क्षेत्रपाल के माता-पिता

अरुण क्षेत्रपाल के माता-पिता

अरुण क्षेत्रपाल के अद्भुत शौर्य और पराक्रम के लिए उन्हें मरणोपरांत परमवीर चक्र से सम्मानित किया गया। युद्ध के लिए घर से निकलते वक़्त मां ने उनसे कहा थाः

“बेटा ! तुम्हारे दादा एक बहादुर सैनिक थे, और ठीक वैसे ही तुम्हारे पिता। एक शेर की तरह लड़ना कायरों की तरह वापस नहीं लौटना! ”

जब तिरंगे में लिपट कर आया, उस मां का कलेजा! तो उसकी शहादत को किसी और तरह के बहादुरी का प्रमाण नही चाहिए था।

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