गंवाना पड़ा एक हाथ और एक पैर, फिर भी नहीं मानी हार; चलाते हैं रिक्शा

9:11 pm 24 Oct, 2016


जिंदगी उस फलसफे का नाम है, जिसमें कभी तो आप जिस चीज को चाहते हैं वह आपको मिलती है, तो कभी-कभी मनचाही चीज नहीं मिलती। विषम परिस्थितियों में एक इंसान अपने आपको किस तरह से रखता है, उसका सामना किस तरह करता है, यही उसके व्यक्तित्व को उजागर करता है।

हम यहां जिस शख्स के बारे में बात करने जा रहे हैं, उनसे एक सीख सीखने को मिलती है कि अपनी मेहनत और मजदूरी से मिलने वाले रुपयों की खुशबू, उसका सुकून ही सर्वोपर्रि होता है।  मेहनत से कमाए गए एक रुपए से मिलने वाली संतुष्टि की बराबरी किसी से नहीं की जा सकती, वह अनमोल है।

ऐसे ही एक शख्स हैं हरियाणा के कुरुक्षेत्र के रहने वाले पुन्नू राम, जिन्होंने अपनी गरीबी और दिव्यांगता को अपने हौसलों पर हावी नहीं होने दिया। महज 12 साल की उम्र में एक दुर्घटना में अपने पैर गंवाए और 5 साल पहले हाथ की नस ब्लॉक होने के कारण अपनी एक बाजू भी कटवानी पड़ी। इन विषम परिस्थितियों के सामने भी नहीं झुक कर वह दो साल से रिक्शा चला अपना जीवनयापन कर रहे हैं।

एक हाथ और एक पैर नहीं, लेकिन ये उनका हौसला ही है कि वह कभी टूटे नहीं। किसी पर निर्भर नहीं रहे। दो साल पहले अपनी पत्नी को खो चुके, अपने दो बेटों राहुल और शुभम  की परवरिश, उनकी देखभाल की जिम्मेदारी उठाते हुए उन्होंने रिक्शा चलाना शुरू किया। पुन्नू का अरमान है कि उनके बच्चे पढ़-लिखकर अपने बेहतर भविष्य की ओर जाएं, ताकि उन्हें किसी के सामने हाथ न फैलाने पड़े।

दिन में सवारियों को लेते हुए 40 से 50 किलोमीटर तक का सफर तय करने वाले पुन्नू राम कहते हैं:

“जो काम मिला मैंने कभी हार नहीं मानी, तो जब तक अपना हाथ पैर चलेगा हम रिक्शा चलाएंगे।”

दिन के करीबन 150 रुपए तो कभी 200 रुपए कमाने वाले पुन्नू अपने काम को लेकर बताते हैं कि दूसरे जो रिक्शा चलाते हैं उनकी दो टांगें हैं और इनकी एक ही टांग है लेकिन कोई भी रिक्शा चलाने में इनकी बराबरी नहीं कर सकता।

सच में, परिस्थितियों का रोना रोके जो अपने क़दमों को रोक लेते हैं उनके लिए जीवन का एक प्रेरक है पुन्नू राम की जिंदादिली। यहां देखिए दिन-रात अपने बच्चों के लिए जीने वाले इस रिक्शावाले की जिंदादिली की एक झलक।

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