आज ही के दिन फांसी के फंदे को चूमा था मदनलाल धींगड़ा ने

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1:45 pm 17 Aug, 2016


भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में मदनलाल धींगड़ा का उल्लेख अप्रतिम क्रान्तिकारी के रूप में हैं। युवा मदनलाल भारत को गुलामी से निकाल बाहर करने के जतन में लगे थे। यहां तक कि वह इंग्लैंड में अपनी पढ़ाई के दौरान आजादी के विचार से ओत-प्रोत रहे। उन्होंने अपने लंदन प्रवास के दौरान विलियम हट कर्जन वायली नामक एक ब्रिटिश अधिकारी की गोली मारकर हत्या कर दी।

यह घटना 20वीं सदी के भारतीय स्वतन्त्रता आन्दोलन की प्रथम महत्वपूर्ण घटनाओं में से एक है।

18 सितम्बर 1883 को पंजाब के प्रान्त के एक सम्पन्न हिन्दू परिवार में जन्में मदनलाल धींगड़ा का परिवार अंग्रेजों का विश्वासपात्र था। हालांकि, जब उन्हें क्रान्तिकारी गतिविधियों में लिप्त होने के आरोपों में लाहौर के कॉलेज से निकाल दिया गया, तब उनके परिवार वालों ने उनसे नाता तोड़ लिया।

परिवार से अलग होकर मदनलाल ने अलग-अलग जगहों पर काम किया। वह क्लर्क भी बने और जीवनयापन के लिए तांगा भी चलाया। उन्होंने कुछ दिनों के लिए कारखाने में श्रमिक का काम भी किया। बाद में वर्ष 1906 में बड़े भाई की सलाह पर वह उच्च शिक्षा प्राप्त करने लंदन चले गए। वहां उन्होंने यूनिवर्सिटी कालेज लन्दन में इन्जियरिंग में दाखिला ले लिया। इंग्लैंड में पढ़ाई के लिए उनके बड़े भाई ने आर्थिक सहायता की थी, वहीं कुछ राष्ट्रवादी कार्यकर्ताओं ने भी उनकी मदद की थी।

धींगड़ा अपने लंदन प्रवास के दौरान भारत के प्रख्यात राष्ट्रवादी विनायक दामोदर सावरकर एवं श्यामजी कृष्ण वर्मा के सम्पर्क में आए।

खुदीराम बोस, कन्हाई लाल दत्त, सतिन्दर पाल और काशी राम जैसे क्रान्तिकारियों को अंग्रेजों द्वारा मृत्युदंड दिए जाने की घटना से धींगड़ा बेहद उद्वेलित हुए।


१ जुलाई सन् १९०९ की शाम को इण्डियन नेशनल ऐसोसिएशन के वार्षिकोत्सव में भाग लेने के लिये भारी संख्या में भारतीय और अंग्रेज इकठे हुए। जैसे ही भारत सचिव के राजनीतिक सलाहकार सर विलियम हट कर्जन वायली अपनी पत्नी के साथ हाल में घुसे, ढींगरा ने उनके चेहरे पर पाँच गोलियाँ दागी; इसमें से चार सही निशाने पर लगीं। उसके बाद धींगड़ा ने अपने पिस्तौल से स्वयं को भी गोली मारनी चाही किन्तु उन्हें पकड़ लिया गया।

उन्होंने लंदन में 1 जुलाई 1909 को एक कार्यक्रम के दौरान भारत सचिव के राजनीतिक सलाहकार सर विलियम हट कर्जन वायली की गोली मारकर हत्या कर दी। मदनलाल धींगड़ा ने अपने पिस्तौल से खुद को भी गोलियां मारनी चाही, लेकिन वह ऐसा नहीं कर सके। उन्हें पकड़ लिया गया।

मामले की सुनवाई पुराने बेली कोर्ट में हुई। अंग्रेजों की अदालत ने उन्हें मृत्युदंड का आदेश दिया और 17 अगस्त 1909 को उन्हें पेंटविले जेल में फांसी दे दी गई। इस तरह मदनलाल धींगड़ा मर कर भी अमर हो गए।

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