मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का सुप्रीम कोर्ट का आदेश मानने से इन्कार

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1:12 pm 25 Mar, 2016


ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट के उस आदेश को मानने से इन्कार कर दिया है, जिसमें तीन बार तलाक कह कर रिश्ता खत्म करने की प्रथा के कानूनी वैधता जांच करने की बात कही गई थी।

बोर्ड का तर्क है कि देश के सुप्रीम कोर्ट के अधिकार क्षेत्र में यह नहीं है कि वह कुरान पर आधारित समुदाय के पर्सनल लॉ की समीक्षा करे। बोर्ड ने कहा है कि पर्सनल लॉ कोई संसद से पास किया हुआ क़ानून नहीं है।

टाइम्स ऑफ इन्डिया की इस रिपोर्ट के मुताबिक, बोर्ड ने अपने वकील एजाज मकबूल के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि मुस्लिम लॉ की स्थापना मुकद्दस कुरान और इस्लाम के पैगंबर के हदीस से की गई है।

साथ ही इसे संविधान के अनुच्छेद 13 के मुताबिक अभिव्यक्ति के दायरे में लागू नहीं किया जा सकता। वकील ने कहा कि मुस्लिमों के पर्सनल लॉ विधायिका की ओर से पास नहीं किए गए हैं।

बोर्ड की और से दाखिल हलफ़नामे में कहा गया, मुस्लिम पर्सनल लॉ एक सांस्कृतिक विषय है जिसे इस्लाम धर्म से अलग नहीं किया जा सकता।

इसलिए इसे अनुच्छेद 25 और 26 के तहत अंत:करण की आज़ादी के मुद्दे को संविधान के अनुच्छेद 29 के साथ पढ़ा जाना चाहिए।

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने समान नागरिक कानून (यूनिफॉर्म सिविल कोड) की उपयोगिता को भी चुनौती देते हुए कहा है कि इससे राष्ट्रीय एकता और अखंडता की कोई गारंटी नहीं है।

बोर्ड ने अपने तर्क में कहा है कि 1956 में हिन्दू कोड बिल लाया गया था, लेकिन इससे हिन्दुओं में विभिन्न जातियों के बीच भेदभाव की दीवार खत्म नहीं हुई।

क्या संविधान से ऊपर है मुस्लिम पर्सनल लॉ, मनीष तिवारी ने पूछा

कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से सवाल पूछा है कि क्या पर्सनल लॉ संविधान से ऊपर है? मनीष तिवारी ने ट्वीट किया है, जिसमें उन्होंने पूछा है कि क्या मुस्लिम महिलाओं में एकतरफा तलाक में सुरक्षा सुनिश्चित नहीं किया जाना चाहिए?


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