दिल्ली पर भारी मच्छर

कुछ दिनों पहले श्रीलंका से खबर आई थी कि उस देश ने मलेरिया पर विजय प्राप्त कर ली है जिसका मतलब यह था कि उसने मच्छरों की उस प्रजाति पर विजय प्राप्त कर ली है जिनसे मलेरिया फैलता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इसे बड़ी उपलब्धि बतलाते हुए श्रीलंका को बधाई दी। अपने देश में देखिये क्या हाल है?

देहरादून में महीनों से अखबारों के पन्ने डेंगू की दहशत से भरे हुए हैं, अगर कोई बाहरी आदमी आ जाए तो अखबार पढ़ते ही लौटती गाड़ी पकड़ लेगा। माहौल ही ऐसा है और ऊपर से अब सुर्खियाँ लगने लगी हैं कि डेंगू चढ़ा पहाड़ लेकिन जानकार लोग राय दे रहे हैं कि पहाड़ में डेंगू का असर कम होगा क्योंकि इसके मच्छर ठंड बर्दाश्त नहीं कर पाते। ये मच्छर ठंड बर्दाश्त नहीं कर पाते, यह बात पिछले कई सालों से सुनी जा रही है। बरसात खतम होते ही इसके मच्छर तेजी से पनपते हैं और ठंढ में मर जाते हैं यह बात दिल्ली के विशेषज्ञ पिछले कई साल से बोल रहे हैं क्योंकि दिल्ली में इसका असर लम्बे समय से हो रहा है। लखनऊ में भी डेंगू का प्रकोप जबरदस्त है जिसके चलते हाईकोर्ट खुद संज्ञान लेकर संबंधित विभागों को निर्देश दे रहा है लेकिन अब तक उत्तर प्रदेश की राजधानी में इस साल सरहद पर शहीद होने वालों की संख्या से कहीं अधिक लोग व्यवस्था के चलते शहीद हो चुके हैं। लखनऊ में नवभारत टाइम्स के संपादक सुधीर मिश्र ने तंजिया लहजे में लिखा भी की लगता है अब मच्छरों के सफाए के लिए भी सेना ही बुलानी पड़ेगी। यह शर्म की बात है कि एक तरफ तो मुल्क अन्तरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में व्यावसायिक उपलब्धियां हासिल करता जा रहा है और दूसरी तरफ मच्छरों के सामने असहाय बना हुआ है, यह हालत पैदा हुई है व्यवस्था में लग चुके घुन के चलते।

दिल्ली का हाल सबसे बुरा है, वही दिल्ली जहाँ व्यवस्था में परिवर्तन का नारा लगाते हुए एक क्रांतिकारी सरकार बनी ,वही दिल्ली जहाँ हजार साल में पहली बार देश को नयी दिशा देने का दावा करने वाली केंद्र सरकार भी है। केजरीवाल तो साफ कह कर बच निकलते हैं कि मोदी सरकार उन्हें एक कलम खरीदने का भी फंड नहीं दे रही है ,उन्हें कोई काम भी नहीं करने दे रही है। ऐसी स्थिति में तो उनकी पूरी टीम खाली ही बैठी होगी, क्यों नहीं सब मच्छर मारने में ही जुट जाते हैं जिससे कम से कम जनता को तो राहत मिले और फिर अगले इलेक्शन में ‘आप’ का और वोट बढ़े। वैसे केजरीवाल बड़ी-बड़ी हस्तियों से टकराने के आदी हैं। नरेंद्र मोदी, शीला दीक्षित, मुकेश अम्बानी जैसे लोगों से टकराने वाले का मच्छर मारने लगना डिग्निटी के खिलाफ है लेकिन चंदा लेकर अपने कुछ लोगों को तो भिड़ा ही सकते हैं मुहीम पर। जब हर इलाके में मोहल्ला सभाएं हैं ही तो क्यों नहीं कुछ दिन यही काम कर लें या फिर इन्तजार कर रहे हैं की मौसम बदले और मच्छर अपने आप मरें?

वैसे इस मामले में केजरीवाल की लाचारी अपनी जगह सही भी है क्योंकि मच्छर मारने का काम नगर पालिकाओं का होता है, मुख्यमंत्री का नहीं। कुछ महीने पहले बनारस में था यानी प्रधानमन्त्री के लोकसभा क्षेत्र में जहाँ एक लम्बे अरसे से नगर निगम पर भाजपा का ही कब्ज़ा है। गर्मियों में तब वहां अखबारों में खबर दिखी कि निगम के पास मच्छर मारने के लिए फोगिंग मशीन ही चालू हालत में नहीं हैं क्योंकि फंड नहीं है। फोगिंग मशीनें देश की हर पालिका और निगम के पास होंगी और उनके रखरखाव के का भी बजट होगा, साथ ही उसमें डालने वाली दवाएं भी आती होंगी लेकिन रिपोर्ट लगा देने के बाद यह फंड साहब के बंगले में लग जाता होगा। जब बनारस जैसी वीआईपी सीट का ,जहाँ की अपेक्षाएं आकाश चढ़ कर अब गलियों में पसरे कचरे पर लोटने लगी हैं, निगम अजीबो गरीब तर्क दे सकता है तो क्या दिल्ली –क्या देहरादून। तर्क यह था कि राज्य की समाजवादी सरकार भाजपाई निगम को पैसे ही नहीं दे रही। चलिए सिस्टम का एक तरीका है लेकिन जब दिक्कत है तो एकाध रैली पर जितना खर्चा होता है उसका आधा जुटा कर समाजसेवा ही कर देते निगम के लोग और साफ सफाई हो जाती जिसकी तस्वीरों को कोई फोटोबाजी भी नहीं कहता।

पता नहीं कब वह लोकतंत्र आएगा, जब जनता की सुविधाओं और उसकी जान की कीमत के आड़े राजनैतिक गुणा-गणित लगाना लोग बंद करेंगे, फिलहाल ऐसे आसार तो नजर नहीं आ रहे हैं। देहरादून में भी जब कुछ मुहल्लों से लोगों के मरने की खबरें और अस्पतालों में बढ़ती भीड़ की खबरें जब रोज दिखने लगीं तब शहर के कुछ इलाकों में कभी कभी फोगिंग मशीनों से निकला धुआं भी दिखा। गारंटी रहनी चाहिए कि ऐसी खबरों के बाद मशीनों में असल दवाएं भी पड़ी होंगी, जिनका असर मच्छरों पर पड़ता हो।

दिल्ली वाले इस बात के लिए राहत की साँस ले सकते हैं कि आजकल वायु प्रदूषण के मसले को मच्छरों ने काट खाया है वर्ना ओबामा की तो यहाँ आकर कुछ घंटे की लाइफ कम हो जाने की बात उनकी मीडिया ने की थी, दिल्ली में रह रहे लोगों की चिंता देश को होने लगी थी क्योंकि वहां लेवल खतरनाक स्तर पर पहुँच गया था। लगता था कि अब दिल्ली बचेगी नहीं, तमाम ओड-इवन के बावजूद। डेंगू के मच्छर साफ पानी में फैलते हैं, मतलब वहां कुछ साफ़ सफाई भी है। केजरीवाल एक पार्टी हैं जिनकी अपोजिट पार्टी नजीब जंग हैं जो हमेशा तलवार निकाले रहते हैं। देश को कांग्रेस ने बहुत कुछ दिया है, लेकिन दिल्ली को उसके दिए हुए जंग साहब भाजपा को भी प्रिय हैं। क्या समझा जाए कि जंग साहब अभी तक कांग्रेस से ही वफादारी निकाल रहे हैं जो दिल्ली की तमाम पालिकाएं मच्छर मारने लायक भी नहीं बची हैं। दिल्ली के सभी नगर निगम भाजपा के कब्जे में हैं, क्या इनको भी केंद्र सरकार ने समय पर मदद नहीं दी या केजरीवाल को कह दिया की फंड मत दो? सबको पता है की किस सीजन में ये मच्छर पनपते हैं फिर भी दिल्ली देश को शर्मसार कर रही है। मच्छरों ने बड़े-बड़े बयानवीरों को हिजड़ा बना कर रख दिया है, जो खुद तो शाही तामझाम में महफूज हैं लेकिन आम जनता मच्छरों के आगे असहाय हैं।

डेंगू तो डेंगू, इसके साथ चिकनगुनिया और मलेरिया के भी केस दिल्ली में निकल रहे हैं। इनके खिलाफ सरकार की सर्जिकल स्ट्राइक अपनी जगह, लेकिन आप राजधानी के तमाम इलाकों में घूम लीजिये, पपीते के पेड़ों से पत्ते गायब हो चुके हैं। सबको पता चल चुका है कि पपीते के पत्ते के रस से बढ़िया कोई औषधि नहीं है जो प्लेटलेट्स की संख्या बढ़ा सके, लोग इसका असर देख रहे हैं। सरकार ने भी समय रहते बताया नहीं कि प्लेटलेट्स की संख्या बुखार होने पर गिरती ही है, उससे अधिक पैनिक होने की जरूरत नहीं है।

इन सबके बीच जस्टिस काटजू से फेसबुक पर माफ़ी मंगवा चुके लोगों की टोली में से एक मित्र ने पटना से बिहार से बताया कि यार हमारे यहाँ कहीं भी रुका हुआ साफ़ पानी है ही नहीं तो डेंगू अभी तक इधर पनपा नहीं, वैसे भी यह बीमारी राजधानी से फैलने वाली बीमारियों में से है जहाँ सरकारी अस्पतालों और छोटे स्तर के दफ्तरों में (बड़े में एसी होते हैं) गर्मियों में कूलर बंद करने के बाद उनकी सफाई होती नहीं और एक जगह भी ब्रीडिंग हो गयी तो ये मच्छर फैलेंगे ही। मित्र ने आम जनता को भी इसका दोषी नहीं माना क्योंकि मुताबिक़ कूलर के हैसियत वाली जनता उसे इस्तेमाल के बाद पोंछ पांछ कर रख देती है ताकि अगली साल मेंटेनेंस पर खर्चा न करना पड़े। उनकी बात पते की लगी इस नाते यह कहा जा सकता है कि सरकारी प्रतिष्ठानों से से निकली यह बीमारी, सरकारों की ही लापरवाही से जनता पर भारी पड़ रही है। तमाम किन्तु परन्तु सरहद पार की सर्जिकल स्ट्राइक पर हो रही है लेकिन हमारा सिस्टम मच्छरों से पनाह मांग रहा है।

इस दयनीय स्थिति पर भी कभी प्रधानमन्त्री को समय मिले तो मन की बात करनी ही चाहिए, क्योंकि आजकल वो देश में ही हैं और कम से कम राजधानी में डेंगू का जो कहर है उसकी खबरें उनके सामने से ही गुजरती ही होंगी। हाँ, समय बचाने के लिए वो केवल अपने लोगों से अखबार की हेड लाइन ही पढ़वा कर सुनते होंगे तो वो पढ़ने वाला निश्चित ही डेंगू की खबरों को गोल कर जाता होगा क्योंकि देश के साथ प्रधानमन्त्री को भी शर्मिंदा होना पड़ेगा कि अभी हम चाहे जो कर लें लेकिन मच्छर हम पर हावी हैं और हम इन्तजार कर रहे हैं मौसम बदलने का जिससे जोड़ों का दर्द कम हो। इस्लामाबाद का दिल्ली जो भी करे लेकिन मच्छर अभी इस राउंड में तो दिल्ली को हरा चुके हैं। अपन लोगों को तो आदत पड़ गयी लेकिन वो विदेशी क्या सोचते होंगे जो यहाँ की खबरें देखते होंगे?

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