20 साल से अंधी मां को कंधे पर बिठाकर तीर्थ करा रहा है ‘श्रवण कुमार’

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3:10 pm 21 Apr, 2016


यह एक ऐसे पुत्र की कहानी है, जिसकी अभिलाषा हर मां करती है। यह एक ऐसे पुत्र की भक्ति है, जिसके लिए उसकी मां ही ईश्वर है। उन्होंने संन्यासी धर्म तो ज़रूर अपनाया हुआ है, लेकिन जब बात आई अपनी माता की इच्छा पूरी करने की, तो उन्होंने इसे ही अपना धर्म समझा। और यही वजह है कि उन्हें कलियुग का श्रवण कुमार कहा जाता है।

वर्तमान समय में यह थोड़ा नामुमकिन ज़रूर लगता है, लेकिन जबलपुर के रहने वाले 48 वर्षीय कैलाशगिरी कलियुग के श्रवण कुमार से ज़रा भी कम नही हैं। वह पिछले 20 सालों से अपनी 92 वर्षीय नेत्रहीन मां को एक कावड़ी पर बिठाकर देश के अलग-अलग तीर्थ स्थानों की यात्रा कर रहे हैं।

कैलाशगिरी की इच्छा थी कि वह चारों धाम की यात्रा पैदल ही करें, लेकिन उनकी मां के लिए यह मुमकिन नहीं था, तो कैलाश उन्हें कंधे पर बिठाकर निकल गए।

फरवरी 1996 से प्रारंभ यह तीर्थ यात्रा, आख़िरी चरण में पहुँच चुकी है। कैलाश कुछ दिन पहले ही आगरा पहुंचे। अब इस यात्रा को 20 साल से अधिक हो चुके हैंं। कैलाश 28 वर्ष के थे, जब उन्होंने यह व्रत लिया था कि मां की चार धाम करने की इच्छा को वह पूरा करेंगे, जिसके लिए कैलाश ने पिछले दो दशक में 35 हजार किलोमीटर से भी अधिक दूरी तय की है।

हालांकि, कई लोग इस 21वीं सदी के ‘श्रवण’ को इस तरह से अपनी मां की इच्छा पूरी करने की चाह को देखकर हैरान हैं, लेकिन उनकी कहानी और धैर्य, मातृ प्रेम को एक दूसरे स्तर पर ले जाती है। कैलाश कहते हैंः

“जब मैं 14 वर्ष का था, तब मैं एक पेड़ से गिर गया था। निश्चित रूप से मेरी मृत्यु हो गई होती, अगर मेरी मां ने मेरा ख्याल नहीं रखा होता। वह मेरे लिए दिन भर प्रार्थना करती रहती थी और चार धाम की यात्रा करने कि मन्नत मांगी थी। मुझे लगा मां की मन्नत पूरी करना मेरा धर्म है।”

कैलाशगिरी कहते हैं कि मां को अपने कंधों पर उठा कर चार धाम दिखाना, उनको यह एहसास दिलाना है कि वह मेरे लिए कितनी महत्वपूर्ण हैं। मां के प्रति सेवा दिखाने का यह मेरा तरीका है।

“जब मैं 10 साल का था तब मेरे पिता का निधन हो गया था। मेरे अलावा उनका कोई नहीं है। मेरे भाई और बहन की भी मौत हो चुकी थी।  फिर उनकी इस इच्छा को और कौन पूरी करता?”


कैलाश कहते हैं कि अब तक वह 36,582 किलोमीटर की यात्रा पूरी कर चुके हैं। हालांकि, पारंपरिक ‘चार धाम’ यात्रा पूरी हो चुकी है, लेकिन अब अपनी मां की बांके बिहारी मंदिर के दर्शन करने इच्छा भी पूरी करना चाहते हैं। कैलाश अपनी माता के इस इच्छा के बारे में बताते हुए कहते हैंः

“मेरी मां के लिए बांके बिहारी मंदिर भी चार धाम की ही तरह है और मैं उनकी इस इच्छा को भी पूरी करने के लिए बांके बिहारी मंदिर के दर्शन करना चाहता हूं।”

कैलाश के इस सफर की शुरुआत रोजाना सुबह 6.30 बजे होती है और सूर्यास्त होने पर खत्म होती है।

कैलाश कहते हैं कि इस देश में बहुत से अच्छे लोग हैं, जो निःस्वार्थ भाव से सेवा करते हैं। लोगों द्वारा दी गई मदद और खाने से वह अपना गुजारा कर लेते हैं। कैलाश की मां को अपने बेटे पर गर्व है। कैलाश पैदल ही अपनी मां को नर्मदा परिक्रमा, काशी, अयोध्या, चित्रकूट, रामेश्वरम, तिरुपति, जगन्नाथ पुरी, गंगा सागर, बासुकी नाथ, जनकपुर धाम, केदारनाथ, हरिद्वार, ऋषिकेश, द्वारका, नागेश्वर और महाबलेश्वर की यात्रा करा चुके हैं।

रामायण की कथा वाले श्रवण कुमार को लोग एक आदर्श पुत्र के रूप में देखते हैंं, जिसने अपने माता-पिता की सेवा की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा रखी थी। वहीं, कलियुग के इस श्रवण कुमार ने यह साबित कर दिया कि ऐसे पुत्र सिर्फ़ कथा कहानियों में ही जीवित नहीं हैंं।

कैलाश आज हर पुत्र के लिए प्रेरणा हैंं। आपकी क्या राय है?

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