नेताजी की विचारधारा कैसे किसी संगठन को अपराध के लिए प्रेरित कर सकती है?

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5:56 pm 4 Jun, 2016


मथुरा के जवाहरबाग की 100 एकड़ से अधिक जमीन पर अवैध क़ब्ज़े को हटाने पहुंची पुलिस पर अंधाधुंध फायरिंग और बमबारी हुई। इस घटना में एसपी (सिटी) मुकुल द्विवेदी और थाना प्रभारी संतोष कुमार सहित कम से कम 21 लोग मारे गए। कब्जाधारियों के नेता, राम वृक्ष यादव और समूह के सुरक्षा अधिकारी चंदन गौर इस घटना के बाद लापता हैं।

दरअसल, ये लोग खुद को आंदोलनकारी कहलाना पसंद करते हैं। बताया जाता है कि ये लोग नेताजी सुभाष चंद्र बोस के विचारों से प्रेरित हैं। इन्होंने एक संगठन भी बना रखा है। ऐसा ये खुद कहते हैं।

नेताजी के विचारों और इनकी मांगों पर बात अभी कुछ देर में करेंगे, पहले आपको बता दें कि इन्होने करीब दो साल से अधिक समय तक ‘धरने’ के नाम पर करीब 100 एकड़ की ज़मीन क़ब्ज़े में कर ली थी।

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मथुरा के जवाहर बाग में हिंसा भड़काने का आरोपी रामवृृक्ष यादव (सफेद कुर्ते में)। dainikbhaskar

इस पूरे प्रकरण को समझने के लिए पहले यह ज़रूरी है कि हम ‘धरना’ का मतलब समझ लें। इसका मतलब समझने के लिए गूगल पर तमाम सर्च के बाद विकिपीडिया पर ‘धरना’ का मुझे ‘यथार्थ’ समझ आया। इसका प्रमुख अंश कुछ इस तरह हैः

“A dharna is a non-violent sit-in protest, which may include fast undertaken at the door of an offender, especially a debtor, in India as a means of obtaining compliance with a demand for justice, state response of criminal cases, or payment of a debt.”

अब हिन्दी अनुवाद का मतलब भी समझ लेते हैं। इसका मतलब यह है कि ‘धरना’ वह चीज़ है, जिसमें लोग शांतिपूर्वक बैठ कर अहिंसक तरीके से विरोध करते हैं। वह भी तब, जब विरोधी धरने के पास हों, या सामने हों। भारत में ‘धरना’ न्याय की मांग के संबंधित होना चाहिए। न्याय चाहे अपराध से संबंधित हो या किसी और मांग से हो। अगर ऐसी कोई मांग आपके पास हो, तो आप भी बड़े आराम से धरना दे सकते हैं।

खैर अब मुद्दे पर आते हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, कथित तौर पर धरना दे रहे इन लोग के पास विस्फोटक सामग्री के साथ एके-47 तक मिली है। यह निश्चित रूप से ‘धरना’ की परिभाषा में तो फिट नही बैठता। अगर इन लोगों के न्याय की मांग की बात को मान भी लिया जाए तो भी यह तरीका नहीं है कि आप करीब 100 एकड़ जमीन की सरकारी संपत्ति हड़प लें।

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ये खुद को नेताजी सुभाष चंद्र बोस के सच्चे अनुयायी बताते हैं। इनकी मांगों में आज़ादी सहित कुछ बातें हैं। पर ये आखिर आज़ादी मांग क्यों रहे हैं। और किससे आजादी मांग रहे हैं। खैर, लगता है कि इनके तौर-तरीके पर बहस नही होनी चाहिए। क्योंकि मुझे लगता है कि अगर प्रश्न इनकी मांग और आज़ादी का है, तो निश्चित रूप से बात इनके विचारों की होनी चाहिए।

मैं इस कथन से असहमत भी हूं कि ये ‘नेताजी के सच्चे अनुयायी हैं’ क्योंकि नेताजी ने जिन परिस्थितियों में विश्व के समक्ष जो विचार रखे थे, वह उनकी व्यक्तिगत मांग या किसी गुट से संबंधित या किसी ज़मीन के टुकड़े के लिए नहींं थी। दरअसल, वह इंसान की ज़रूरत थी। उनका नारा पूरे अावाम के लिए था ।

नेताजी ने जिस वक़्त ‘आज़ाद हिंद फ़ौज़’ की कमान संभाली थी, उस समय देश गुलाम था और यह आशा करना व्यर्थ था कि अंग्रेज भारत छोड़कर स्वयं चले जाएंगे। उनके विचार स्पष्ट थे कि स्वतंत्रता हर इंसान का अधिकार है।

आप मथुरा में 100 एकड़ ज़मीन पर क़ब्ज़ा करते हैं। हाईकोर्ट के अतिक्रमण हटाने के फ़ैसले का पालन नही करते और जब प्रशासन क़ब्ज़े की ज़मीन को खाली कराने पहुंचती है, तो आप हिंसक तरीके से विरोध करते हैं।

दो साल से अधिक समय तक यहां कब्जा जमाने वाले उपद्रवियों ने हथियारों का बड़ा ज़ख़ीरा भी जमा कर रखा था। इन हथियारों का इस्तेमाल उपद्रवियों ने पुलिस पर किया, जिसमें दो पुलिस अधिकारी सहित 21 लोग मारे गए। इस घटना में 200 से अधिक लोग घायल हुए हैं।

सबसे बड़ी बात कि ये अपनी व्यक्तिगत सोच को नेताजी की विचारधारा से जोड़ते हैं। हालांकि, ऐसा कतई नहीं होना चाहिए। नेताजी की उपलब्धियां और योगदान देश को जोड़ने के प्रयास में थीं। उनका त्याग और बलिदान राष्ट्रहित में था। उनके इस बलिदान के बाद एक स्वतंत्र राष्ट्र और संविधान मिला है। मेरा मानना है कि हम सभी को उनके विचार का सम्मान करना चाहिए। इस तरह असंवैधानिक तरीके से उनके विचारों का अपमान नही।

किसी भी महापुरुष के नाम का इस्तेमाल किसी गुट या संगठन के हित के लिए करना आसान है। हम उस दौर के हालात या परिस्थिति को समझे बिना उनके काम करने के तरीके को अपनाते हैं। लेकिन प्रयास यह होना चाहिए कि हम विचारों का अनुपालन करे, जिससे आपके प्रयास को राष्ट्रहित की नज़र से देखा जा सके न कि इसी राष्ट्र में एक अलग राष्ट्र की मांग के नजरिए से।

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