केरल में संघ की शक्ति से भयभीत हैं मार्क्सवादी, उड़ गई है कॉमरेडों की नींद

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4:33 pm 16 May, 2016


केरल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व इसके अनुषांगिक संगठनों के राजनीतिक शक्ति के केन्द्र के तौर पर उभरने से वामदल भयभीत हैं और हिंसा का सहारा ले रहे हैं। दरअसल, पिछले साल के अंत में यहां हुए निकाय चुनावों में भाजपा ने बेहतर प्रदर्शन किया था। मार्क्सवादी इस बात से डरे हुए हैं कि केरल में भाजपा का खाता खुलने से उन्हें एक नई चुनौती का सामना करना पड़ेगा।

यूं तो वामपंथी दलों द्वारा शासित इस राज्य में राजनीतिक हिंसा का लंबा इतिहास रहा है, लेकिन हालिया चुनाव नतीजों के बाद इसमें तेजी आई है। हाल के दिनों में यहां 200 से अधिक भाजपा समर्थकों और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है।

इनमें से अधिकतर घटनाएं मालाबार के कन्नूर और थालास्सेरी में हुई हैं।

इसी साल फरवरी महीने में एक संघ कार्यकर्ता की नृशंस हत्या कर दी गई थी। इस घटना में जो लोग पकड़े गए थे, वे मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी से संबद्ध बताए जाते हैं। यह इकलौती घटना नहीं है।

कन्नूर का कड़वा सच

केरल के कन्नूर सरीखे जिलों में वामपंथी दल बाहुबल के दम पर राजनीति करते रहे हैं। राज्य में यह स्थान वामपंथी राजनीति की जन्मस्थली रहा है। यही वजह है कि 1970 के दशक में यहां शुरू हुई राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियों को मार्क्सवादियों ने हल्के में नहीं लिया।

साम-दाम-दंड-भेद की राजनीति करने वाले मार्क्सवादियों ने संघ के बढ़ते प्रभाव पर न केवल अंकुश लगाने का काम किया, बल्कि इस संगठन को हासिए पर धकेलने की पुरजोर कोशिश की।

मार्क्सवादियों ने कई स्थानों पर संघ के कार्यालयों पर सामूहिक हमला बोलकर, आगजनी कर दहशत फैलाने की कोशिश की। संघ समर्थकों को मौत के घाट उतार दिया।

तमाम हमलों, धमकियों और दहशत के बावजूद जिले में संघ का अब भी व्यापक प्रभाव है।

बीबीसी की इस रिपोर्ट में मलयालम लेखक और राजनीतिक विश्लेषक पॉल जकारिया कहते हैंः

“सीपीएम लोगों की ज़िंदगी में घुस गया है, यहां तक की गांववालों को अपने घर की शादी में कांग्रेस-समर्थक दोस्त तक को बुलाने की आज़ादी नहीं है, अब ऐसे में लोगों और असलहे के बल के साथ आरएसएस अपना प्रचार करेगा तो हिंसा तो होगी ही।”

यह भी एक बड़ा सच है कि भाजपा ने केरल में कोई चुनावी जीत हासिल नहीं की है, लेकिन उसकी तरफ मुड़ने वाले लोग मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के ही हैं, जो पार्टी की हिंसक विचारधारा से आजिज आ चुके हैं।

पार्टी छोड़कर जाने वालों के लिए मार्क्सवादी काल बनकर उभरे हैं।

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वर्ष 2012 में माकपा नेता रहे टीपी चंद्रशेखरन बर्बरतापूर्वक हत्या कर दी गई थी। इस बार भी हत्या मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने ही की थी। इसकी वजह यह थी कि चंद्रशेखरन ने पार्टी की नीतियों की आलोचना कर एक दूसरी पार्टी “रिवेल्यूशनरी मार्क्ससिस्ट पार्टी” बना ली थी।

केरल में राजनीतिक हिंसा का अलग है तरीका

पश्चिम बंगाल की तुलना में केरल में राजनीतिक हिंसा का तरीका सर्वथा अलग है। केरल में ये जानलेवा हमले बेहद सुनियोजित तरीके से किए जाते हैं। कभी-कभी एक व्यक्ति की हत्या के लिए हफ्तों और महीनों तक की तैयारियां की जाती हैं।

इसी साल फरवरी महीने में 15 तारीख को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता पीवी सुजीत जब घर पर थे, उस वक्त हथियारों से लैश 10 लोगों ने उनपर हमला कर दिया। 27 साल के सुजीत को बचाने के लिए उनके मां-बाप और भाई ने कोशिश की और इस हाथापायी में वे घायल भी हुए। सुजीत पर तलवारों से कई वार किेए गए थे।

हत्या के इस मामले में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के सात कार्यकर्ताओं को हिरासत में लिया गया है।

इसी तरह के एक अन्य मामले में पिछले 8 मार्च को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ता एवी बीजू पर मार्क्सवादी समर्थकों ने जानलेवा हमला बोल दिया। यह हमला उस वक्त हुआ जब बीजू बच्चों को स्कूल छोड़ने जा रहे थे।

तलवारों से हुए हमले में घायल बीजू को कोझीकोड के अस्पताल में भर्ती कराया गया। जिस वक्त यह खूनी खेल खेला जा रहा था, उस वक्त स्कूली बच्चे ऑटो में सहमे-दुबके बुरी तरह रो रहे थे।

इससे मिलते-जुलते एक अन्य घटनाक्रम में वर्ष 2014 में भाजपा कार्यकर्ता कथीरूर मनोज की हत्या कर दी गई। इस मामले में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के जिला सचिव पी जयराजन को हिरासत में लिया गया था। सत्याग्रह ने भाजपा के कन्नूर जिला अध्यक्ष पी. सत्यप्रकाश के हवाले से बताया है कि जयराजन के हिरासत में जाने के बाद माकपा ने हिंसक गतिविधियों में बढ़ोत्तरी कर दी।

पिछले 11 फरवरी को कोर्ट ने कथीरूर मनोज हत्या मामले में जयराजन की अग्रिम जमानत की अर्जी खारिज कर दी। इसके बाद से जयराजन न्यायिक हिरासत में हैं। भाजपा का आरोप है कि सुजीत की हत्या इसी की राजनीतिक प्रतिक्रिया है।

तालिबानीकरण में आई तेजी

वर्ष 1956 में जब केरल राज्य बना था, तब वहां हिन्दुओं की जनसंख्या 61 फीसदी थी। हाल के दिनों में यहां हिन्दुओं की जनसंख्या में अभूतपूर्व कमी देखने को मिल रही है, जबकि दूसरी तरफ मुस्लिम और ईसाईयों की जनसंख्या में आश्चर्यजनक बढ़ोत्तरी हुई है।

हाल ही केरल का तेजी से इस्लामीकरण हुआ है। कांग्रेस और वामपंथी राजनीतिक दल अपने निजी स्वार्थ के लिए मुस्लिम और ईसाई वोट बैंक को खाद-पानी देने का काम करते रहे हैं। हिन्दू विरोध धीरे-धीरे मार्क्सवादियों का मुख्य एजेन्डा बन गया।

मार्क्सवादियों से मिले शह की वजह से मुस्लिम और ईसाई समुदाय हिन्दुओं पर भारी पड़ रहे हैं। केरल के इस्लामीकरण में पेट्रो डॉलर की बड़ी भूमिका है। वैध और अवैध तरीके से बड़े पैमाने पर बरसने वाले धन हिन्दू विरोधी गतिविधियों में लगाए जाते हैं।

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