ठग मार्का ज़करबर्ग: ‘फ्री बेसि‍क्‍स’ में मिलेगा ‘घंटा’

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6:14 pm 31 Dec, 2015

फ्री का खेल भारत का सबसे लोकप्रिय खेल है। भले ही ढेला भर हमें कुछ न मिले, फिर भी इसे मजे से खेलते हैं। इसलिए कभी नेता, तो कभी किसी और के झांसे में आते रहते है। यह बात फेसबुक के मार्क ज़करबर्ग को भी समझ में आ गई है। उन्हें भी किसी ने समझा दिया है कि इस देश में फ्री का ठेला लगाना आसान है।

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मार्क पहुच गये इंडिया सिलिकॉन वैली में आइडिया लिया और लगा लिया एक ठेला जिसका नाम ‘फ्री बेसि‍क्‍स’ रख दिया। झुंड लगने लगी फ़ेसबुक के पॉपअप खिड़की से इसकी सुगंध फैलने लगी। अब अब ठेला पूरी तरह शोरूम में तब्दील हो गया है।

अब ट्राइ तो ट्राइ ठहरा। इसने फ्री बेसि‍क्‍स के पॉपअप पर रोक लगा दी। कह दिया कि भैय्या फेसबुक वाले, अपनी ये पॉपअप वाली खिड़की बंद करो। अब इससे दुर्गन्ध आने लगी है। ऐसा इस देश में नहीं चल पाएगा।

इंटरनेट से सड़कों पर पहुंची लड़ाई।

अभी तक लगभग 32 लाख लोगों काे बकलोल बना चुके मार्क ज़करबर्ग भी कहां मानने वाले थे। उन्होंने ट्राइ के खिलाफ लड़ाई सड़कों पर ला दी और लाखों करोड़ों खर्च कर बड़े-बड़े होर्डिंग्स टंगवा दिए, जिनमें डिजिटल ईक्वलिटी की कवायद की गई है।

पर एक बात मेरी समझ से परे है कि बराबर का मतलब बराबर ही होता है। चाहें कान सीधे पकड़ो, या घुमा के। बराबर तो बराबर ही होना चाहिए। अब इसका मतलब यह तो नहीं की बराबर वाला रास्ता छग्गा हलवाई की गली से या फ़ेसबुक से ही होकर निकले ।

खैर फ़ेसबुक की इस नयी लंतरान में हम भारतीयों से सपोर्ट मांगा गया की भैय्या भारत वालों ट्राइ को जगाने के लिए उनको संदेश भेजकर बताओ की यह कितना ज़रूरी है। फ़ेसबुक वेबसाइट पर जो लिखा है, उसका अंश नीचे है।

 

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यह तो बहुत साफ है की बहुत कुछ फ्री में देने की बात कही जा रही है। लेकिन फ्री क्या मिलेगा यह तो मार्क जानें या अंबानी साहब। अंबानी साहब इसलिए क्योंकि फ़ेसबुक और रिलाइयन्स भारत में फ़ेसबुक.ओआरजी नाम के साथ साझा रूप में आ रहे हैं। इसका सीधा सा मतलब है की इस फ्री के चाट में पर प्लेट का आधा हिस्सा रिलाइयन्स के पास भी जाएगा।

मीडिया की चुप्पी पर प्रश्नचिह्र।

अब सवाल यह है कि बाल की खाल निकालने वाली हमारी मीडिया ने चुप्पी क्यों साधी हुई है। इसका संबंध संभवतः व्यवसाय से है, इसलिए मेनस्‍ट्रीम मीडि‍या इसका खुल कर विरोध नही कर पा रहा। बीबीसी, इंडि‍या टुडे, नेटवर्क 18, एक्‍यूवेदर, बिंग सहि‍त सौ से अधि‍क मीडि‍या हाउस खाली झोला लिए फ़ेसबुक के साथ जुड़ चुके हैं। पर उन्हें अब तक कुछ हासिल नहीं हुआ है। क्योंकि, फेसबुक कन्टेन्ट प्रमोट करने के लिए पैसे पहले भी लेता था और भविष्य में भी लेता रहेगा। लेकिन इन तमाम मीडि‍या हाउस के जुड़ने से एक मतलब तो साफ है की फ्री बेसि‍क्‍स नाम का जो लंगर चलेगा, उनमें इन मीडि‍या हाउसेज को अपना अचार बेचने की पूरी सुविधा मिलेगी।

कन्टेन्ट के साथ हर मीडि‍या हाउस अपनी वेबसाइट का लिंक डालेगा, क्‍योंकि फेसबुक यूजर को अपनी वेबसाइट लाना ही इसका मूल उद्येश्य है। लेकि‍न यूजर फ्री के चक्‍कर में उसपर क्‍लि‍क ही नहीं करने वाला (अभी भी नहीं करता है)। यूजर अगर उस लि‍ंक्‍स पर क्‍लि‍क करेगा, तो उसे उस साइट पर जाने के लि‍ए डाटा डाउनलोडिंग के पैसे देने होंगे। उसपर जो वि‍ज्ञापन चलेंगे, उसके अधिकार फेसबुक और रि‍लायंस के पास ही रहेंगे। यह बहुत पहले ही स्पष्ट हो चुका है।

इंटरनेट फ्री होना चाहिए।

इंटरनेट पर पहले ही बहुत कुछ ऐसा है, जो फ्री होना चाहिए। जैसे सरकार से जुड़े सभी वि‍भागों की साइट पर ऐसा कुछ नही है। कुछ नही तो वो साइट तो फ्री होनी ही चाहिए जैसे चकबंदी की या जनसंख्‍या की या वाहन चोरी कराने की ऑनलाइन रि‍पोर्ट कराने की पर ऐसा कुछ नही है। और तो और रोज़मर्रा इस्तेमाल होने वाली साइट्स भी जैसे गूगल, यूट्यूब ,अमेजॉन, फ्लि‍पकार्ट, याहू, लिंक्‍डइन, ट्वि‍टर, एचडीएफसी, आइसीआइसीआइ, पेटीएम, ईबे, आइआरसीटीसी, रेडिफ, स्‍नैपडील, एनएसई, बीएसई जैसी सैकड़ों चीजें तो फ्री कर ही देते ।

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फ्री के नाम पर बना रहे हैं उल्लू।

फेसबुक के तकरीबन 125 मि‍लि‍यन यूजर्स हैं, जबकि गूगल के 354 मि‍लि‍यन। गूगल तो फ्री की मांग नहीं कर रहा। जाहि‍र है कि यह हार्डकोर बि‍जनेस है। पैसा बहाया जा रहा है, उल्लू बनाया जा रहा है। अंबानी भैया ने जो ब्लू प्रिंट ट्राइ को दिया उसमें बराबर जैसा कुछ नही था। मतलब फ्लिपकार्ट के लिए अलग डाटा चार्ज गूगल के लिए अलग। खैर शुक्र की बात है ट्राइ इसपर राज़ी नही है।

सुना है मार्क भैया को इस फ्री वाले सपने की कमाई की वजह से नींद नही आ रही है। अंबानी भैय्या से लिपट-लिपट कर रोए। खैर अंबानी भैय्या भी ठहरे पुराने खिलाड़ी। उन्होंने दिलासा दिया है की यह भारत है। थोड़ा खिला-पिला कर कुछ न कुछ रास्ता निकाल ही लेंगे।

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