खंडहर में चलता है स्कूल, जान जोखिम में डाल कर पढ़ने आते हैं बच्चे

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5:51 pm 21 Nov, 2016


पढ़ेगा इंडिया तभी तो आगे बढ़ेगा इंडिया! यह कथनी हमें सरकारी दफ़्तर, अस्पतालों, संस्थाओं के दीवारों और अन्य जगहों पर लिखी मिल ही जाएगी। केद्र और राज्य सरकार ने मिलकर दर्जनों सर्व शिक्षा अभियान, मिड डे मील, राष्ट्रीय माध्यमिक शिक्षा अभियान, साक्षर भारत,  बालिका शिक्षा अभियान जैसी योजनाएं चला रखी हैं, ताकि हर-जन शिक्षित हो सके और शिक्षा के स्तर में सुधार हो सके। ये ढेर सारी योजनाएं शिक्षा के स्तर को सुधारने के लिए क्या काफ़ी हैं ? यह तो वक़्त ही बताएगा। लेकिन इन योजनाओं के सही अनुपालन और लाभ पर हमेशा ही सवालिया निशान रहा है।

सरकारी स्कूलों से संबंधित खबरों में आप अधिकारी, प्रधान, प्रधानाचार्य, बाबुओं के घपलेबाजी  की शिकायतें पढ़ते और सुनते ही होंगे। भ्रष्टाचार शैक्षणिक ढांचे में इस तरह से समाया है कि बच्चों से टीसी, प्रमाणपत्र, अंक प्रमाणपत्र आदि के लिए भी 5 , 10 और कुछ कुछ जगहों पर 100 रुपए तक वसूल लिए जाते हैं। आरोप साबित होने पर उनपर मामूली कार्रवाई तो ज़रूर होती है, लेकिन इतने मात्र से जिन योजनाओ का लाभ शिक्षा के सबसे कमजोर ढाँचे तक पहुंच जाना चाहिए थे, उसमें सुधार नदारद है। जिसे सुधारने में अभी सालों लग जाएंगे।

मुद्दा यह है की आख़िर कब तक शासन-प्रशासन अपने इस पंगु रवैये के मिलीभगत से बच्चों का भविष्य और उनकी जान का जोखिम उठा सकते हैं?

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यह तस्वीर किसी पुराने खंडहर की नहीं है, बल्कि एक सरकारी स्कूल की है, जिसमें मूलभूत सुविधाओं की तो बात छोड़ ही दीजिए, यहां पढ़ने-पढ़ाने आने वाले छात्रों और शिक्षकों को रोज अपनी जान जोखिम में डालना पड़ता है।

बात कर रहे हैं हिमाचल के मंडी जिले के एक सरकारी प्राईमरी स्कूल की, जिसका भवन 1962 में बन कर तैयार हुआ था। जर्जर हो चुके इस खंडहरनुमा स्कूल के भवन में मात्र एक कमरे में थोड़ी सी जान बची है। शिक्षा विभाग ने जर्जर भवन को पहले ही असुरक्षित घोषित कर रखा है। इसमें अब रामभरोसे बच्चों की जान जोखिम में डाल कर, उनका भविष्य संवारने का प्रयास जारी है। मूलभूत सुविधा के नाम पर इस सरकारी स्कूल के पास सिर्फ़ यह कमरा ही है। इस प्राइमरी स्कूल में शिक्षा बहुत हद तक मौसम पर भी निर्भर रहता है। मतलब आम दिनों में तो बच्चे बाहर धूल फांक सकते है, लेकिन बरसात, लू और ठंड के दिनों में इसी कमरे में भेड़-बकरियों की तरह ठूंस दिए जाते हैं।

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सोचिए, अगर एक ही कमरे में कक्षा एक से पांचवी तक की पढ़ाई चल रही हो, तो बच्चे क्या पढ़-सीख रहे होंगे? तस्वीर दिमाग़ में कुछ ऐसी बनती है कि एक ही क्लास में राजू विज्ञान पढ़ते-पढ़ते गणित के सवाल भी हल करने लग जा रहा है। अब इस निम्न दर्ज़े की व्यवस्था से शिक्षा के स्तर में कितना सुधार होगा, इस सवाल का जवाब शासन और प्रशासन ही बेहतर दे सकते हैं।

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मंडी जिले के सरकाघाट उपमंडल के तहत आने वाले इस प्राइमरी स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों को भी अपना स्कूल रास नहीं आ रहा है। स्कूल के जूनियर टीचर दिनेश कुमार की मानें तो अब उन्हें इस बात की आदत सी हो गई है। क्योंकि स्कूल का यह माहौल बीते कई वर्षों से ऐसे ही है। बस जैसे-तैसे अडजेस्ट कर लिया जाता है। कितना और अडजेस्ट करना पड़ेगा, यह कह पाना मुश्किल है। कभी-कभार तो स्थिति इतनी बुरी हो जाती है कि स्कूल चलाने के लिए गांव के लोगों से कमरे किराए पर लेने पड़ते हैं।

विभाग और सरकार द्वारा भवन को जर्जर घोषित करने के बाद भी भवन को गिराए जाने के दिशा में हर प्रयास सिर्फ़ काग़ज़ों और फाइल में ही हक़ीकत होते दिख रही है। जब इस बारे में प्रारंभिक शिक्षा उपनिदेशक केडी शर्मा से बात की गई तो उन्होंने बताया कि स्कूल भवन को गिराने के आदेश दिए जा चुके हैं, जिसके बाद अगला एस्टीमेट बनाकर नए भवन के लिए पैसा मंजूर करवाया जाएगा।

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मात्र दो अध्यापकों के सहारे चल रहे इस सरकारी स्कूल की जर्जर भवन शासन-प्रशासन की राह देख रही है। इस भवन को गिराने व नया भवन बनाने की जदोजहद सिर्फ अब कागजों में ही दौड़ लगा रही है। अब ऐसे में सवाल उठता है कि अगर ऐसे ही पढ़ेगा इंडिया तो फिर कैसे बढ़ेगा इंडिया?

साभार: SUNO 

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