महाभारत काल की वह जगह जहाँ दुर्योधन ने पांडवों को ज़िंदा जलाने का किया था प्रयास

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10:59 am 10 Jun, 2016

प्रकृति के गोद में जा कर उसके विभिन्न रंग देखने से बेहतर कुछ नहीं हो सकता। प्रकृति की शांति, आध्यात्मिक और उसकी रोचकता को अनुभव करना ही शायद जीवन है। और अगर आप किसी ऐसे स्थान पर पहुंचते हैं, जहाँ आप उस स्थान के महत्व के साथ उससे जुड़ी पौराणिक या ऐतिहासिक प्रसंगों से शीतलता प्राप्त कर पाते हैं, तो निश्चित तौर पर आपका अनुभव अविस्मरणीय बन जाता है।

कुछ ऐसी ही प्रकृति और आत्मीयता के साथ अध्यात्म से जुड़ी है देवभूमि कहलाने वाले उत्तराखंड के लाखामंडल की पौराणिक गुफा, जहाँ महाभारत काल में पांडवों को एक नया जीवन मिला।

अभी हाल ही में मुझे अपने ‘मुख्य संपादक’ के साथ किसी काम के सिलसिले में मसूरी जाने का अवसर प्राप्त हुआ। काम की व्यस्तता और महानगरों की मई-जून की गर्मी के बीच वादियों में कुछ पल वक़्त गुजारना, रोज़मर्रा के जीवन से थोड़ी नीरस हो चुकी विचार कोशिकाओं में पुनर्जीवन प्रवाहित होने जैसा प्रतीत हो रहा था।

मैने ऐसे ही अपने प्रकृति प्रेम और नये स्थानों पर विचरण करने की अभिरुचि को अपने मुख्य संपादक से साझा की। मेरी मनोदशा को समझते हुए उन्होने मसूरी से करीब 75 किलोमीटर दूर लाखामंडल के अनोखे अलौकिक छटा और वहाँ के रहस्यमयी गुफ़ाओं, जिसका महत्व महाभारत से जुड़ा है, का रस-पान कराया। मेरे अति-उत्साहित और रोमांचित होते देख मुझे प्रकृति कि वह धरोहर दिखाने का निश्चय कर मुझे आश्वस्त किया।

प्रकृति की वादियों में बसा लाखामंडल गाँव यमुना नदी के तट पर स्थित है। दिल को लुभाने वाली यह जगह गुफाओं और भगवान शिव के मंदिर के प्राचीन अवशेषों से घिरा हुआ है। माना जाता है कि इस मंदिर में प्रार्थना करने से व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिल जाती है। यहां पर खुदाई करते वक्त विभिन्न आकार के और विभिन्न ऐतिहासिक काल के शिवलिंग मिले हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार इन पवित्र धरा को महाभारत से जोड़ा जाता है।

इस मंदिर का मुख्य आकर्षण ग्रेफाइट से बना शिवलिंग है। ऐसी मान्यता है कि इस लिंग की स्थापना अज्ञात-वास के समय धर्मराज युधिष्ठिर ने की थी। इस शिवलिंग की विशेषता यह है कि जब इसका जलाभिषेक किया जाता है तो यह चमकता है और इसमें जलाभिषेक कर रहे भक्त का प्रतिबिंब दिखता है, जिसकी वजह से यह पर्यटकों के बीच एक आस्था और रोमांच का विषय बना रहता है।

शिवलिंग के करीब ही दानव और मानव को दर्शाती दो मूर्तियों भी मुख्य मंदिर के बगल में स्थित हैं। इन मूर्तियों को इस मंदिर का द्वारपाल भी कहा जाता है। कुछ लोगों का मानना ​​है कि ये मूर्तियां भीम और अर्जुन की हैं। ऐसा भी कहा जाता है कि मृत्यु को प्राप्त किया हुआ व्यक्ति अगर इन द्वारपालो के समीप रख दिया जाए तो वह कुछ पल के लिए जीवित हो उठता है।


स्थानीय लोगों के मुताबिक, इस मंदिर और आसपास का क्षेत्र, महाभारत के एक प्रकरण से ताल्लुक रखता है। प्रसंग के अनुसार दुर्योधन ने लाक्षागृह को लाख या लाह से निर्माण पांडवों को जिंदा जलाने के एक षड्यंत्र के तहत किया था। लोगों का मानना है कि लाक्षागृह, लाखामंडल के आस पास ही निर्मित हुआ था।

महाभारत के अनुसार जब लाक्षागृह को आग में समर्पित कर दिया गया था, तब पांडवों ने एक सुरंग की मदद से अपने प्राणों की रक्षा की थी। ऐसी मान्यता है कि वह सुरंग एक गुफा के मुहाने पर जा कर खुलता है, जो लाखामंडल में अभी भी मौजूद है। ऐसी रहस्मयी गुफा ज़रूर आपको रोमांचित कर सकती है।

मेरी राय है कि अगर आप में प्राकृतिक प्रेम के साथ ऐतिहासिक और पौराणिक स्थानो से रूबरू होने की रूचि है तो लाखामंडल निश्चित रूप से आपका मन-मोह लेगी। मैं अपने ‘मुख्य संपादक’ का तहे दिल से शुक्र-गुज़ार हूँ, जिनकी वजह से मेरे लिए प्रकृति की ऐसी अनमोल धरा को बेहद करीब से देखना संभव हो सका। अगर आप भी इन गर्मियों की छुट्टियों में कहीं घूमने का मन बना रहें हैं तो एक बार लाखामंडल ज़रूर जाए।

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