भोले शंकर के 12 ज्योतिर्लिंगों का है कल्याणकारी महत्व, इनसे जुड़ी हैं ये अलौकिक कथाएं

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9:55 pm 9 Mar, 2016

शिव पुराण के कोटिरुद्र संहिता में भगवान शिव की महिमा का विस्तारपूर्वक वर्णन है। इसमें कई ऐसी पौराणिक कथाएं मिलेंगी, जिसमें भोलेनाथ भक्तों के कल्याण हेतु उनके लिए तत्पर रहते हैं। मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव जगह-जगह तीर्थों में भ्रमण कर प्राणियों का उद्धार करते हैं। यही नहीं, जहां-जहां उनके ज्योर्तिलिंग हैं, वहां वे निवास भी करते हैं।

शिव पुराण की कथाओं के मुताबिक, अपने भक्तों के भक्तिभाव से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने न केवल उन्हें दर्शन दिए, बल्कि उनकी मनोकामनाओं को भी पूर्ण किया है।

हिन्दू धर्म की पौराणिक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव जहां-जहां लिंग के रूप में स्वयं प्रकट हुए, वर्तमान काल में उन बारह स्थानों को ज्योतिर्लिंगों के रूप में पूजा जाता है।

तो आइए दर्शन करते हैं उन पवित्र ज्योतिर्लिंगों के जहां भगवान शिव स्वयं वास करते है और पुराणों में वर्णित इन ज्योतिर्लिंगों से जुडी कथाओं को भी जानते हैं।

1. सोमनाथ

शिव पुराण के अनुसार चंद्रमा राजा दक्ष से श्रापित होकर क्षय रोग से ग्रसित हो गए, जिस कारण देवताओं और धरती निवासियों में हाहाकार मच गया। निवारण के लिए जब चंद्रमा सहित देवी-देवता ब्रह्मा जी से मिले, तो उन्होने इसका निवारण बताया कि वह शिव आराधना करें। चंद्र के कठोर तपस्या के बाद दयालु भोलेनाथ प्रकट हुए और उन्होंने श्राप से मुक्ति दिलाई। भगवान शिव की कृपाल प्रवृत्ति देखकर चंद्रमा नियमानुसार शिव स्तुति करने लगे, जिसके बाद भगवान शिव उनकी दृढ़ भक्ति को देखकर साकार लिंग रूप में प्रकट हो गए तथा प्रभास क्षेत्र के महत्त्व को बढाने हेतु देवताओं के सम्मान तथा चन्द्रमा के यश का विस्तार करने के लिए स्वयं ‘सोमेश्वर’ कहलाने लगे। चन्द्रमा के नाम पर सोमनाथ बने भगवान शिव संसार में ‘सोमनाथ’ के नाम से प्रसिद्ध हुए।

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2. मल्लिकार्जुन

मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग का प्रसंग शिव पुराण में बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत किया गया है। प्रसंग है कि भगवान गणेश और कार्तिक विवाह को लेकर आपस में लड़ गए, जिस कारण शिव ने युक्ति सुझाई कि जो ब्रह्माण्ड के चक्कर लगाएगा, उसका विवाह सर्वप्रथम होगा। तब गणेश भगवान ने शिव और पार्वती के ही चक्कर इस आशय में लगा लिए थे कि मेरे लिए तो आप ही ब्रह्माण्ड हैं। इसके बाद भगवान गणेश का विवाह संपन्न हो गया। इसकी जानकारी जब कार्तिक को हुई तो वह नाराज़ होकर क्रोंच पर्वत की ओर चले गए। जब भगवान शिव और माता पार्वती उनको मनाने वहां गए तो भगवान शिव और पार्वती क्रोंच पर्वत पर स्वयं एक ज्योतिलिंग के रूप में अवतरित हो गए। इस ज्योतिलिंग को मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है।

Malikaarjun

3. महाकालेश्वर

रत्नमाल पर्वत पर ‘दूषण’ नाम का एक असुर हुआ, जिसने यह प्रण किया कि वह शिव भक्तों का विनाश करेगा। शिव पुराण के अनुसार अपने भक्तों की रक्षा के लिए भगवान महाकालेश्वर स्वयं प्रकट हुए। तब भक्तों ने भगवान से स्तुति कर कहा ‘दुष्टों को दण्ड देने वाले महाकाल! शम्भू! आप हम सबको इस संसार-सागर से मुक्त कर दें। हे भगवान शिव! आप आम जनता के कल्याण तथा उनकी रक्षा करने के लिए यहीं हमेशा के लिए विराजिए। प्रभु! आप अपने दर्शनार्थी मनुष्यों का सदा उद्धार करते रहें।’

भगवान शंकर ने उन ब्राह्मणों को सद्गति प्रदान की और अपने भक्तों की सुरक्षा के लिए उस गड्ढे में स्थित हो गए। उस गड्ढे के चारों ओर की लगभग तीन-तीन किलोमीटर भूमि लिंग रूपी भगवान शिव की स्थली बन गई। ऐसे भगवान शिव इस पृथ्वी पर महाकालेश्वर के नाम से प्रसिद्ध हुए।

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4. ओंकारेश्वर

शिव पुराण के अनुसार विन्ध्याचल पर्वत को जब ज्ञात हुआ कि मेरु पर्वत उनसे ऊँचा है तो वह  दुःखी रहने लगा। उसने निश्चय किया कि अब वह भगवान विश्वनाथ की आराधना और तपस्या करेगा। एक स्थान पर पहुंचकर उसने प्रसन्नता और प्रेमपूर्वक शिव की पार्थिव मूर्ति (मिट्टी की शिवलिंग) बनाई और छ: महीने तक लगातार उसके पूजन में तन्मय रहा। उसकी कठोर तपस्या को देखकर माता पार्वती और भगवान शिव उस पर प्रसन्न हो गए। उन्होंने विन्ध्याचल को अपना दिव्य स्वरूप प्रकट कर दिखाया। विन्ध्यपर्वत की याचना को पूरा करते हुए भगवान शिव ने उससे कहाः ‘पर्वतराज! मैं तुम्हें वह उत्तम वर (बुद्धि) प्रदान करता हूं। तुम जिस प्रकार का काम करना चाहो, वैसा कर सकते हो। मेरा आशीर्वाद तुम्हारे साथ है। इसके बाद से ही विन्ध्याचल पर्वत द्वारा बनाई पार्थिव मूर्ति (मिट्टी की शिवलिंग) में स्वयं शिव विराजमान हो गए। उसके बाद से ही इस शिवलिंग का नाम ओंकारलिंग पड़ा।

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5. केदारनाथ

शिव पुराण की कथा के अनुसार भगवान विष्णु के नर और नारायण नामक दो अवतार हुए हैं। नर और नारायण इन दोनों ने पवित्र हिमालय के बद्रिकाश्रम में बड़ी तपस्या की थी। उन्होंने पार्थिव (मिट्टी) का शिवलिंग बनाकर श्रद्धा और भक्तिपूर्वक उसमें विराजने के लिए भगवान शिव से प्रार्थना की। बहुत दिनों के बाद उनकी आराधना से सन्तुष्ट परमेश्वर शंकर भगवान ने कहा कि मैं तुम दोनों पर बहुत प्रसन्न हूं, इसलिए तुम लोग मुझसे वरदान मांगो। भगवान शंकर की बात सुनकर प्रसन्न नर और नारायण ने जनकल्याण की भावना से कहाः ‘देवेश्वर! यदि आप प्रसन्न हैं और हमें वरदान देना चाहते हैं, तो आप अपने स्वरूप से पूजा स्वीकार करने हेतु सर्वदा के लिए यहीं स्थित हो जाइए।’ जगत का कल्याण करने वाले भगवान शंकर उन दोनों तपस्वी-बन्धुओं के अनुरोध को स्वीकारते हुए हिमालय के केदार तीर्थ में ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थित हो गए।

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6. भीमाशंकर

पौराणिक कथा के अनुसार राक्षस भीम ब्रह्मा जी का वरदान प्राप्त कर के अभिमानी बन गया था। अभिमान में वह यज्ञों का विध्वंस करने लगा और तमाम धार्मिक कृत्यों में बाधा डालने लगा। परेशान होकर देवी-देवता भगवान के पास गए। तब भगवान ने उन्हें युक्ति बताई कि सुदक्षिण उनके श्रेष्ठ भक्त हैं। उनको मेरा यह संदेशा पहुंचाओ कि ‘कामरूप के अधिपति महाराज सुदक्षिण! तुम शिव के परम भक्त हो। इसलिए तुम उनका प्रेमपूर्वक भजन करो’। ऐसा संदेश मिलने के बाद राजा सुदक्षिण विधिपूर्वक पार्थिवपूजन करके भगवान शिव के ध्यान में लीन हो गए। जब यह बात राक्षस भीम को पता चली, तो क्रोधित होकर राजा का वध करने हेतु हाथ में नंगी तलवार लेकर चल पड़ा। भक्त को संकट में देख भगवान अपने रौद्र रूप में प्रकट हुए और अपनी हुंकार मात्र से भीम सहित समस्त राक्षसों को भस्म कर डाला। उसके बाद भगवान भोलेनाथ भीमाशंकर के नाम से प्रसिद्ध हुए।


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7. विश्वनाथ

स्कन्द पुराण के आख्यान से स्पष्ट होता है कि श्री विश्वेश्वर ज्योतिर्लिंग किसी मनुष्य की पूजा, तपस्या आदि से प्रकट नहीं हुआ, बल्कि यहां निराकार, परब्रह्म परमेश्वर, महेश्वर ही शिव बनकर विश्वनाथ के रूप में साक्षात प्रकट हुए। उन्होंने दूसरी बार महाविष्णु की तपस्या के फलस्वरूप प्रकृति और पुरुष (शक्ति और शिव) के रूप में उपस्थित होकर आदेश दिया। महाविष्णु के आग्रह पर ही भगवान शिव ने काशी क्षेत्र को अविमुक्त कर दिया। उनकी लीलाओं पर ध्यान देने से काशी के साथ उनकी अतिशय प्रियशीलता स्पष्ट मालूम होती है। इस प्रकार द्वादश ज्योतिर्लिंग में श्री विश्वेश्वर भगवान, विश्वनाथ का शिवलिंग सर्वाधिक प्रभावशाली तथा अद्भुत शक्तिसम्पन्न लगता है। मान्यताओं के मुताबिक मां अन्नपूर्णा (पार्वती) के साथ भगवान शिव अपने त्रिशूल पर काशी को धारण करते हैं।

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8. त्रयम्बकेश्वर

महादेव की लीला महादेव ही जानें क्योंकि वे अपने भक्तों को कष्टों से मुक्ति दिलाने हेतु सदैव किसी न किसी रूप मे पृथ्वी पर विराजमान रहते है। त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग की स्थापना के विषय में शिव पुराण में यह कथा वर्णित है कि महर्षि गौतम पर गो हत्या का पाप लग जाने पर उन्होंने कठोर तप कर, भगवान शिव से गंगा को धरती पर अवतरित करने का वरदान मांगा। फलस्वरूप दक्षिण की गंगा अर्थात गोदावरी नदी का उद्गम हुआ। जिसमें स्नान कर महर्षि गौतम ने अपने उपर छल से लगाए गए पाप से मुक्ति पाई। गोदावरी के उद्गम के साथ ही गौतम ऋषि के विनय आराधना पर शिवजी ने इस मंदिर में विराजमान होना स्वीकार कर लिया। यह आज त्रयम्बकेश्वर ज्योतिर्लिंग के नाम से जाना जाता है।

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9. वैद्यनाथ

शिव पुराण के अनुसार वैद्यनाथ का प्रसंग रावण से जुड़ा हुआ है। पौराणिक कथाओं के मुताबिक, कठोर तपस्या के बाद भी जब भगवान भोलेनाथ ने रावण को दर्शन नही दिए, तब रावण एक-एक करके अपने शीश शिव के चरणों में समर्पित करने लगा। जब रावण अपने आख़िरी दसवें शीश की आहुति देने लगा तो भगवान शिव प्रसन्न होकर प्रकट हुए और उसे वरदान मांगने को कहा। रावण ने कहा कि आप इस शिवलिंग में विराजमान हो जाए, ताकि मैं इसे लंका ले जाकर आपकी स्तुति कर सकूं। भगवान ने एक शर्त रखी। उन्होंने कहा कि तुम्हारी मनोकामना पूरी होगी, लेकिन इसे ले जाते समय अगर इस ज्योतिर्लिंग का स्पर्श धरती से हो जाएगा, तो यह वही स्थापित हो जाएगा। शिवलिंग ले जाते वक़्त रावण को लघुशंका का भान हुआ और उसने शिवलिंग गलती से वहीं धरती पर रख दिया। तब से लेकर आजतक, वह शिवलिंग वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित है।

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10. नागेश्वर

भगवान शिव समय-समय पर अपने भक्तों के कष्टों के हरण हेतु हमेशा उनके साथ रहते हैं। ऐसा ही उनकी कृपाल लीला नागेश्वर ज्योतिर्लिंग से जुड़ी हुई है। मान्यता है कि भगवान शिव ने अपने अनन्य भक्त सुप्रीय की भक्ति को टूटने नहीं दिया और उसे दारूक़ नामक राक्षस के अत्याचारों से बचाया। जहां दारूक़ राक्षस, भक्त सुप्रीय को बंदी बना अपने पूरी ले गया और वहां उसपर अत्याचार किए, लेकिन भक्त सुप्रीय अपनी भक्ति में लीन रहा। इससे प्रसन्न होकर भगवान शिव खुद अवतरित हुए और दारूक़ राक्षस का संहार किया। बाद में सुप्रीय ने स्तुति की कि मानव कल्याण के लिए भगवान शिव उस शिवलिंग में वास करें, तभी से भगवान शिव नागेश्वर ज्योतिर्लिंग में विराजमान है।

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11. रामेश्वर

रामेश्वर ज्योतिर्लिंग हिंदुओं के चार धामों में से एक है। इसकी स्थापना स्वयं भगवान राम ने लंका से राक्षसराज रावण के वध के बाद अयोध्या आते हुए तमिलनाडु मे रामनाथपुरम में की। रावण राक्षस प्रजाति का होते हुए भी ब्राह्मण, प्रखर विद्वान व पंडित था। उसके मारे जाने पर भगवान राम को ब्रह्म हत्या का दोष लग गया था। इस दोष से मुक्ति पाने हेतु भगवान राम ने देवों के देव भगवान शिव की आराधना की और वहां भगवान शिव को लिंग के रूप में स्थापित किया। इससे खुश होकर भगवान शिव स्वयं उस लिंग में विराजमान हुए।

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12. घृष्णेश्वर

घुश्मेश्वर को लोग घुसृणेश्वर और घृष्णेश्वर भी कहते हैं। शिवमहापुराण में घुश्मेश्वर ज्योतिर्लिंग की कथा का वर्णन है। कहते हैं कि देवगिरि नामक पर्वत के समीप सुधर्मा नामक ब्राह्मण निवास करते थे। सदा शिव धर्म के पालन में तत्पर रहने वाली उनकी पत्नी का नाम सुदेहा था। परंतु उनकी कोई संतान नही थी जिस वजह से सुदेहा हमेशा चिंतित रहती थी। समय बीतता गया परंतु पुत्र रत्न न मिलने की वजह से अब सुधर्मा का भी हृदय व्याकुल रहने लगा। उसके बाद अत्यन्त दुःखी उस ब्राह्मणी ने अपनी छोटी बहन घुश्मा के साथ अपने पति का दूसरा विवाह करा दिया। जिसके बाद घुश्मा स्वयं दासी बन कर शिव पूजा में लीन रहने लगी। घुश्मा शिव जी का एक सौ एक पार्थिव लिंग (मिट्टी के शिवलिंग) बनाकर पूजा करती थी। पूजा करने के बाद उन शिवलिंगों को समीप के तालाब में विसर्जित कर देती थी। जल्दी ही उनके घर में पुत्र रत्न की किलकारियां गूंजी परंतु जल्दी ही सुदेहा ईर्ष्या से जल उठी और उसने उस बालक की हत्या कर दी।

बाद में अपने इस पाप का सुदेहा को भी प्रायश्चित हुआ। वहीं घुश्मा ने विचार किया, ‘जिसने मुझे यह पुत्र दिया है, वे ही उसकी रक्षा भी करेंगे। वे तो भक्तप्रिय हैं, कालों के भी काल हैं तथा सत्पुरुषों के मात्र आश्रय हैं। वे ही सर्वेश्वर प्रभु हमारे भी संरक्षक हैं।’ उसकी पूजा से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए। शिव भगवान ने वरदान मांगने को कहा, तब घुश्मा ने अपनी बहन को माफ़ करने का आग्रह करते हुए यह वरदान मांगा कि ‘महादेव! यदि आप मुझे वर देना ही चाहते हैं, तो लोगों की रक्षा और कल्याण के लिए आप यहीं सदा निवास करें और आपकी ख्याति मेरे ही नाम से संसार में होवे’, घुश्मा की प्रार्थना और वर-याचना से प्रसन्न महेश्वर शिव ने उससे कहा कि ‘मैं सब लोगों को सुख देने के लिए हमेशा यहां निवास करूंगा। मेरा ज्योतिर्लिंग ‘घुश्मेश’ के नाम से संसार में प्रसिद्ध होगा। यह सरोवर भी शिवलिंग का आलय अर्थात घर बन जाएगा और इसीलिए यह संसार में शिवालय के नाम से प्रसिद्ध होगा।’ इस तरह ज्योतिर्लिंग ‘घुश्मेश’ संसार में आस्था का प्रतीक है।

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