खगोलीय स्थितियों के आधार पर मिलता है प्रभु श्रीराम के अस्तित्व का सटीक प्रमाण

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11:06 am 19 May, 2016


श्रीराम के विषय में भारतीय समाज में एक व्यापक विरोधाभास दिखाई पड़ता है। एक तरफ लोगों द्वारा प्रभु श्रीराम के आदर्श जीवन चरित्र की पूजा की जाती हैं, वहीं दूसरी ओर उनके अस्तित्व पर ही सवाल उठा दिए जाते हैं।

हाल में ही कुछ वर्ष पूर्व नासा के एक दूर संवेदी उपग्रह द्वारा, भारत और श्रीलंका के मध्य लगभग 10 हजार वर्ष पूर्व की शिलाओं से बने पुल के अंश दिखाई पड़ने की पुष्टि की गई। ऐसे में त्रेतायुग के श्रीराम और द्वापर के कृष्ण के अस्तित्व, जिसे पश्चिम और तथाकथित तर्कवादी विचारधारा के विद्वानों ने नकार दिया था, पर एक व्यापक बहस भारतीय राजनीति में देखने को मिली।

राजनीतिक रूप से तो श्रीराम के अस्तित्व की परख कर पाना लगभग नामुमकिन है, लेकिन खगोलीय स्थितियों के आधार पर बड़ी आसानी से रामायण और महाभारत कालखंड को स्पष्ट किया जा सकता है।

आज हम एक आधुनिक सॉफ्टवेयर Planetarium द्वारा परखी गई आकाशीय संरचना के आधार पर वाल्मीकि रामायण में वर्णित भगवान् श्रीराम के जन्मसंबंधी तथ्यों पर विचार करेंगे।

1. प्रभु श्रीराम पर सबसे अधिक और प्रभावी साक्ष्य महर्षि वाल्मीकि की ‘रामायण’ में ही मिलते हैं। हालांकि, तुलसीदास के ‘रामचरितमानस’ और महाकवि कालीदास के ‘रघुवंशम’ और अन्य ग्रंथों में भी श्रीराम चरित का शानदार वर्णन है।

2. महर्षि वाल्मीकि ने रामायण के बालकाण्ड (1/18/8,9) में प्रभु श्रीराम के जन्म काल पर आकाश मंडल की संरचना का वर्णन किया है। जिसके अनुसार श्रीराम के जन्म के दिन चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि थी। श्रीराम के जन्म के समय पांच ग्रह उच्च अवस्था में थे। महर्षि वाल्मीकि के अनुसार उस समय सूर्य मेष राशि में, गुरु कर्कट राशि में, शनि तुला राशि में, शुक्र मीन राशि में, मंगल मकर राशि में, चन्द्रमा पुनर्वसु नक्षत्र और लग्न कर्क राशि में उदित हो रहा था।

3. अर्थात चैत्र की अमावस्या के 9 दिनों के बाद दोपहर कर्क लग्न (लगभग 12:00 PM से 1:00 PM) में श्री राम का जन्म हुआ। जब ग्रहों और राशियों की पोजीशन की जांच अत्याधुनिक कृत्रिम नभमंडलों के सॉफ्टवेयर से की गई तो, यह गोचर 10 जनवरी 5114 ईसापूर्व को प्राप्त किया गया, यानि आज से लगभग 7129 वर्ष पूर्व। इन सॉफ्टवेयर की प्रमाणिकता के आधार पर श्रीराम का जीवन काल लगभग सात हजार वर्ष पुराना माना जा सकता है।

4. भारतीय पंचांग के अनुसार इसी तिथि को, प्रभु श्रीराम का जन्मदिन भारत वर्ष में हजारों सालों से रामनवमी पर्व के रूप में मनाया जाता रहा है।

5. इतना ही नहीं अयोध्याकाण्ड के (2/4/18) के अनुसार राजा दशरथ श्रीराम को राज-पाट सौंपने का निर्णय करते है, क्योंकि उनके जन्म नक्षत्र (रेवती) पर सूर्य, मंगल और राहू (उत्तरी कटान बिंदु) का संक्रमण होने वाला था। फलित ज्योतिष के अनुसार यह विन्यास राजा की मृत्यु का सूचक होता है। सॉफ्टवेयर के मुताबिक़, यह ग्रह विन्यास 5 जनवरी 5089 ईसापूर्व को आकाश में बना हुआ था। यानि, उस समय प्रभु राम की आयु उस समय 25 वर्ष रही होगी। वाल्मीकि रामायण में प्रभु श्री राम को 25 वर्ष की अवस्था में ही वनवास भेजे जाने के स्पष्ट प्रमाण हैं। यानि, यहां भी वाल्मीकि रामायण की सत्यता 100 फीसदी सटीक प्रतीत होती है।

6. प्रभु राम के वनवास काल के 13वें वर्ष में खरदूषण के साथ हुए युद्ध के समय सूर्य ग्रहण था, साथ ही यह भी उल्लेख है कि उस दिन अमावस्या थी। उस दिन मंगल के एक तरफ बुध और शुक्र तथा दूसरी तरफ सूर्य और शनि थे। सॉफ्टवेयर के अनुसार यह ग्रह विन्यास 7 अक्टूबर 5077 ईसापूर्व को बन रहा था, और यह ग्रहण पंचवटी में दृष्ट भी था। अर्थात वनवास के 13वें वर्ष में खरदूषण से युद्ध की घटना पूरी तरह सत्य है।

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7. इसके ठीक एक वर्ष पश्चात हुए राम-रावण युद्ध के समय की ग्रहों और नक्षत्रों की स्थिति के आधार पर, रावण-वध 4 दिसंबर 5076 ईसापूर्व के दिन ही हुआ था। इस दिन आश्विन माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि थी। इसी दिन हम सभी दशहरा भी मनाते हैं।

8. रामायण में महर्षि वाल्मीकि ने यह भी दर्शाया है कि श्रीराम के वनवास के 14 वर्ष चैत्र शुक्ल नवमी को ही समाप्त हुए। जिस दिन प्रभु श्री रामचंद्र का जन्म दिन था। सॉफ्टवेयर में मुताबिक़ यह दिन 2 जनवरी 5075 ईसा पूर्व का था और उनकी अवस्था उस समय 39 वर्ष की थी।

9. महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में प्रभु श्रीराम की अयोध्या से चित्रकूट और लंका तक की यात्रा का विवरण भी दिया है। जहां एक-एक स्थान पर राम की उपस्थिति के निशान अब भी उपलब्ध हैं। श्रीलंका सरकार ने अशोक वाटिका को अपनी धरोहर के रूप में सहेज कर रखा हुआ है। रावण ने इसी वाटिका में सीताजी (5076 ईसा पूर्व) को कैद करके रखा था।

महर्षि वाल्मीकि द्वारा कुछ श्लोकों में नभ मंडल के विन्यास को सरलता से स्पष्ट करना, उनके महान खगोल ज्ञान को दर्शाता है। जिस सहजता से उन्होंने इसका स्पष्टीकरण दिया है, उससे प्रतीत होता है कि उनके समकालीन समाज में खगोल और विज्ञान का प्रचलन आम था। ग्रहों, नक्षत्रों और अंतरिक्षीय परिघटनाओं के निर्दोष वैज्ञानिक विश्लेषण से इतना तो साफ है कि प्रभु श्रीराम भारतवर्ष में लगभग 7000 वर्ष पूर्व विद्दमान थे।

ऐसे तार्किक तथ्यों के बावजूद भी क्या प्रभु श्री राम के अस्तित्व पर सवाल खड़े करना उचित होगा?

इन प्रमाणों से स्पष्ट है की राम के अस्तित्व को कल्पित साबित करने के पीछे, पश्चिमी बुद्धिजीवियों की भारतीय संस्कृति की विशिष्टता के प्रति विद्वेष की भावना है। पक्षपाती इतिहासकारों पर भारतीय इतिहास को भारी नुकसान पहुंचाने के आरोप लगते रहे है। पर इससे भी ज्यादा दुःख की बात है की हमारे भारत के विद्वानों ने भी बगैर किसी शोधकार्य के राम को ‘काल्पनिक’ करार दे दिया।

यदि पुराणों और अन्य पुरा ग्रंथों पर भी ईमानदारी से शोध कार्य किया जाए तो हमारे इतिहास को दग्ध किए जाने के पीछे के षड़यंत्र को समझने में आसानी होगी। आखिर क्यों!

जब भारत में 7000 वर्ष पूर्व भारत में राम (आर्य) विद्दमान थे, तो फिर आर्यों को यूरोप का प्रवासी क्यों बताया जाता है ? शायद इसलिए ताकि भारत में वर्गसंघर्ष को बढ़ावा देकर ‘एकता’ को विखंडित किया जा सके। श्री राम का अस्तित्व आर्यों के विशुद्ध भारतीय होने का भी विशुद्ध प्रमाण है।

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