टाइम्स ऑफ इंडिया ने आतंकवादियों को बताया बागी; आख़िर किस राह पर है पत्रकारिता?

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3:28 pm 1 Jul, 2016


खीचो ना कमानो को न तलवार निकालो

गर तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो

याद रहे की तलवार की सीमाएं है और दायरा भी, पर अखबार का दायरा असीम है। शायद यही कारण है कि पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा गया है। मेरी समझ से पत्रकारिता राष्ट्रीय चेतना की सहगामी है या अगर मैं इसकी सरल शब्दों में व्याख्या करूं, तो पत्रकारिता का लक्ष्य था या रहेगा कि देश के भीतर स्वाभिमान और आत्मगौरव के भाव भरना, जनता की सोई हुई ताकत को जगाना।

पर जब सुबह जागता हूं और अख़बार के प्रथम पृष्ठ में सुप्त पत्रकारिता का नमूना देखता हूं, तो मुझे बेहद खेद होता है। टाइम्स ऑफ इंडिया के रविवार संस्करण संडे टाइम्स की शीर्ष पंक्ति इतनी निम्न है कि आतंकवादियों को बागी संबोधित करती उनको सम्मान देती प्रतीत होती है। वहीं मुठभेड़ में अपने प्राण गवाने वाले सैनिकों को शहीद बतलाने में उनकी स्याही फीकी पड़ जाती है।

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आतंकवादी और बागी शब्द में अंतर या परिभाषा की बात यहां पर नही करूंगा, क्योंकि यह मुद्दा ज़रा बड़ा है और इस पर बहस भी लंबे समय से चलती ही आ रही है। और बहस की ज़रूरत भी है। पर मुझे जो इनमें बड़ी खाई दिखती है, वह निश्चित रूप से इन दोनों ही पक्षों के द्वारा बनाए गए माहौल से है। बागी को जहां तक मैं अवाम की आवाज़ समझता हूं, वही आतंकवाद वह शोर है जो अमन के बीच इंसानियत को भुला कर हथियार लिए खड़ा है।

इसे मैं पत्रकारिता का ‘एरर ऑफ कमिशन’ या संपादकीय त्रुटि नही कहूंगा। क्योंकि अगर मैं एक अख़बार हूं या पत्रकारिता से जुड़ा हूं, तो निश्चित रूप से मेरे कुछ समाजिक और पत्रकारीय दायित्व होंगे। जिसे निर्वाह के अलावा और कोई विकल्प हो ही नहीं सकता।

साथ में अगर आप पाठक हैं, तो आपका भी कुछ दायित्व बनता है। अब आप पाठकों को इसके खिलाफ बोलना चाहिए। अगर आपको यह सामान्य लगता है, तो समस्या आपके साथ भी है और इसके शिकार आप भी होंगे। अगर आप भी किसी विचार या नीति का विरोध करते हैं तो आपके खिलाफ भी इस अखबार में छप सकता है कि आप आतंकवादी हैं। क्योंकि इस खेल के नियम तो पहले से ही तय हैं। जो दायित्व का नियम है, उसे वर्षों से हम नज़रअंदाज़ करते ही आ रहे हैं।


खैर अगले दिन टाइम्स ऑफ इंडिया में एक स्पष्टीकरण लेख छपता है, जिसे पढ़ कर आप और भी हैरान हो सकते हैं।

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टाइम्स ऑफ इंडिया का कहना है कि उन्होने ‘रीबल’ यानी ‘बागी’ शब्द का उपयोग अपने शीर्षक में सिर्फ़ इसलिए किया, क्योकि यह शब्द जगह के हिसाब से टेररिस्ट से ‘छोटा’ है साथ में यह सफाई भी दी कि यह कुछ शहरों के संस्करण में था। जो की बाद में बदल के ‘लश्‍कर मेन’ मतलब लश्कर के आदमियों कर दिया गया था।

बात फिर घूम फिर के पत्रकारिता के दायित्व पर आ जाती है। मान लेते हैं कि आपके शीर्षक का मतलब आतंकवादियों को बागी बुलाना नहीं था। वह एक तकनीकी ग़लती थी कि आप शीर्षक को ‘आकर्षक’ बनाने का प्रयास कर रहे होंगे। पर ऐसा भी क्या प्रयोग करना की लेख का यथार्थ ही बदल जाए। मेरे ख़याल से ऐसे स्पष्टीकरण से बेहतर होता की आप एक माफीनामा लिखते।

दूसरी बात यह की जब आपने सुधार किया भी तो भी आप ज़िम्मेदार नहीं लगते। आपने शीर्षक बदला और फिर वही ग़लती दोहराई। मैं आपसे यह पूछना चाहता हूँ कि यह घटना आपको एक आतंकी कारवाई क्यों नहीं लगती। बेशक पूरी दुनिया के सामने यह चुनौती है कि आतंकवाद को परिभाषित किया जाए। पर ऐसा तो नही है कि इनकी बेफ़िजूल की मांगों और इनकी अमानवीय गतिविधियों से हम अंजान हों।

मुझे नही लगता आतंकवाद को कोई नाम देने की ज़रूरत है। आतंकवाद इंसानियत के लिए हमेशा से दाग था और रहेगा, चाहे कुछ लोगों का समूह हो, कोई संस्था हो या संगठन हो, या फिर वह कोई व्यक्तिगत रूप में ही क्यों न हो। क्या ऐसे लोगों को सिर्फ़ आतंकवाद की श्रेणी में नही रखा जा सकता? अगर हां, तो इन्हे आतंकवादी संबोधन करने में क्या गुरेज़ है? फिर आप तो उन्हें विशेषण के रूप में ‘आदमी’ लिख कर क्या अपराध नही कर रहें हैं ? प्रश्न इसलिए भी जायज़ है, क्योकि हैवानियत और इंसानियत में कुछ तो अंतर समाज में हमें दिखाना ही होगा ।

चलिए बात करते हैं लश्कर और उसके ही जैसे तमाम आतंकवादी संगठनों की जो खुद धर्म की आड़ लेते हैं और दूसरे को धर्म के नाम पर डराते हैं, क्योंकि अंतिम नैतिक बल इन्हें धर्म से ही मिलता है। वे उस सामूहिकता का नाजायज़ लाभ उठाते हैं, जो धर्म के नाम पर अपने आप बन जाती है या जिसके बन जाने का मिथक होता है। इससे वह समाज में मान्यता हासिल करने का कमज़ोर प्रयास करता है।

तो क्या आप एक अख़बार होकर उन्हें इंसान की श्रेणी में रखकर उन्हे बल नही दे रहे हैं? या फिर हम मान लें कि आपके पत्रकारिता की नींव अब कमज़ोर हो चुकी है?

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