अमर बलिदानी चन्द्रशेखर आजाद के बारे में ये 21 बातें आप शायद नहीं जानते होंगे

2:56 pm 27 Feb, 2016


अमर बलिदानी चन्द्रशेखर आजाद आज़ादी के लिए किसी हद तक जाने और बेखौफ दिखने की प्रेरणा देते हैं। आजाद भारतीय क्रान्तिकारी आन्दोलन की एक अनुपम और अद्वितीय विभूति हैं। एक सामान्य से परिवार में जन्म लेकर भी उन्होंने अपने व्यक्तिगत हितों पर राष्ट्रहित को तवज्जो दी और देश के लिए शहीद हो गए। चंद्रशेखर आजाद के बारे में हम जो कुछ भी बताने जा रहे हैं, उसके बारे में आपको शायद नहीं पता होगा।

1. चन्द्रशेखर आजाद का जन्म 23 जुलाई 1906 को उत्तर प्रदेश में उन्नाव जिले के बदरका गांव में हुआ था।

2. उन्होंने भील बालकों के साथ खेलते हुए निशानेबाजी की कला बचपन में ही सीख ली थी।

3. आजाद उन क्रान्तिकारियों में से एक थे, जिन्हें 1919 में हुए जलियांवाला बाग की घटना ने उद्वेलित किया था। वह अपनी पढ़ाई के दौरान ही गांधीजी के असहयोग आन्दोलन से जुड़ गए।

4. पहली बार गिरफ्तार हुए तो उन्हें 15 बेतों की सजा हुई। उनकी उम्र तब सिर्फ 14 साल थी।

5. जब जज ने उनसे उनके पिता का नाम पूछा तो जवाब में चंद्रशेखर ने अपना नाम आजाद, पिता का नाम स्वतंत्रता और पता जेल बताया।

6. 1922 में चौरी चौरा की घटना के बाद गांधीजी ने असहयोग आन्दोलन वापस ले लिया, तो देश के तमाम नवयुवक क्रान्तिकारियों की तरह ही चन्द्रशेखर आजाद का भी कांग्रेस पार्टी से मोह भंग हो गया।

7. वह जल्दी ही राम प्रसाद बिस्मिल, शचीन्द्रनाथ सान्याल, योगेशचन्द्र चटर्जी के सम्पर्क में आए और हिन्दुस्तानी प्रजातान्त्रिक संघ (HRA) का गठन किया गया।

8. 9 अगस्त 1925 को हुए काकोरी कांड में चन्द्रशेखर आजाद की प्रमुख भूमिका थी। काकोरी ट्रेन लूट की घटना में राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खान और ठाकुर रोशन सिंह को फांसी दे दी गई।

9. इस घटना के बाद 8 सितम्बर 1928 को चन्द्रशेखर आजाद ने दिल्ली के फिरोजशाह कोटला मैदान में कान्तिकारियों की एक गुप्त बैठक का आयोजन किया। इस बैठक में तय किया गया कि सभी क्रान्तिकारी दल एक नई पार्टी में विलय कर लेंगे। इसी दिन नींव पड़ी हिन्दुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन की।

10. चन्द्रशेखर आजाद इस नई पार्टी के कमान्डर-इन-चीफ थे। उन्होंने शपथ खाई थी कि आखिरी फैसला होने तक लड़ाई जारी रहेगी और वह फैसला है जीत या मौत।

11. आजाद ने अपने दम पर झांसी और कानपूर में अपना ठिकाना बना लिया था, जहां से वे स्वतंत्रता आन्दोलन को गति दे रहे थे।

12. दिल्ली एसेम्बली बम कांड में फांसी की सजा पाए तीन अभियुक्तों- भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव ने अपील करने से साफ मना कर ही दिया था। आजाद उनके समर्थन में सामने आए।

13. आजाद ने उनकी सजा कम कराने के लिए काफी प्रयास किए। इसी क्रम में वह हरदोई जेल जाकर गणेश शंकर विद्यार्थी से मिले।

14. विद्यार्थी से परामर्श कर वे इलाहाबाद गए और जवाहरलाल नेहरू से उनके निवास आनन्द भवन में भेंट की।

15. आजाद ने पंडित नेहरू से यह आग्रह किया कि वे गांधीजी पर लॉर्ड इरविन से इन तीनों की फाँसी को उम्र-कैद में बदलवाने के लिए जोर डालें।

16. विकीपीडिया के मुताबिक, पंडित नेहरू ने उनकी यह बात नहीं मानी और इस पर आजाद और उनके बीच तकरार हो गई। पंडित नेहरू ने क्रोधित होकर उन्हें तत्काल जाने के लिए कह दिया।

17. आजाद उनके ड्राइंग रूम से निकल बाहर आए और अपनी साइकिल पर बैठकर अल्फ्रेड पार्क की तरफ चले गए।

18. अल्फ्रेड पार्क में वह अपने मित्र सुखदेव राज से मंत्रणा कर ही रहे थे कि तभी अंग्रेज अधिकारी नॉट बाबर जीप से वहां आ पहुंचा। उसके साथ पूरी पुलिस फोर्स थी।

19. दोनों तरफ से भयंकर गोलीबारी हुई।

20. कहा जाता है कि आजाद के पास जब अंतिम गोली बची तो उन्होंने खुद को मार ली।

21. दरअसल, चन्द्रशेखर आजाद ने शपथ ली थी कि वह कभी भी अंग्रेजों के हाथ जिन्दा नहीं लगेंगे।

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