जीवन परमात्मा का अनमोल तोहफा है, इसे कबूल करिए और जीना सीखिए

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11:06 pm 15 Dec, 2015

ज़िंदगी एक खूबसूरत लम्हा है। इसे खुल कर जीना सीखो। मत सोचो की तुम्हारे पास क्या नहीं है। पर परमात्मा ने जितना भी तुम्हे दिया है, उतना पर्याप्त है कि तुम सुखी-पूर्वक आनंदित होकर जीवन व्यतीत कर सको।

सुख-दुःख जीवन के लक्ष्य नहीं हो सकते। सुख-दुःख मात्र साधन है, जीवन के, जिसमें मनुष्य उलझा रहता है। कभी वह हताश होता है, तो कभी निराश। कभी वह प्रसन्नता में लिप्त रहता है। तो कभी अहंकार उसे अहंकारी बना देता है। ये साधन ही किसी मनुष्य के व्यक्तित्व को बनाता है। कभी लोभी बनाता है। तो कभी दानी। सफलता का अहंकार उसे अहंकारी बनाता है, तो कभी सफलता उसके व्यक्तित्व को सज्जनता से सजाती है।

ये साधन मूलतः मोह, कर्म, काम, धर्म के अंग हैं। एक सुखद जीवन की लालसा किसे नही होती? लेकिन इसके लिए ज़रूरी है की हम मोह और काम का त्याग कर कर्म और धर्म के मार्ग को अपना लें। जीवन अनिश्चिताओं से भरी पड़ी है। हमे इसका अर्थ समझना चाहिए।

इस संसार को आपसे कुछ नहीं चाहिए।

यह कतई ज़रूरी नहीं की सफलता ही सुखी जीवन का रहस्य है। सुखी आदमी भी उतना ही निराश और अवसादग्रस्त हो सकता है जितना कि दुःखी आदमी। ऐसे में सवाल ये उठता है की तब मनुष्य का जीवन के प्रति लक्ष्य क्या होना चाहिए ?

यह बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं की आप जिस वजह से खुश हो रहे हो उससे और भी लोगों को खुशी मिलेगी। और न ही यह ज़रूरी है की जिन वजहों से लोग दुःखी हैं, उसी वजह से आप भी मातम मना रहे होंगे। ये ध्यान रखने वाली बात है की इस संसार को आपसे कुछ नहीं चाहिए। वह आपके बिना भी थी और हमेशा ऐसे ही रहेगी। ज़रूरी यह है की आप इनमें से क्या चुन सकते हैं।

 

 

“यह दुनियां अवसरों से भरी पड़ी है। यहां खुशियों के मेले भी हैं, तो दुख के पहाड़ भी। चुनाव आपको करना है।”

 

प्रेम रूपी तोहफा अनमोल है।


परमात्मा ने जीवन के साथ प्रेम-भाव का तोहफा प्रत्येक मनुष्य को दिया है। यह प्रेम चाहे उसके धर्म के प्रति हो, चाहे कर्म के प्रति। मनुष्य प्रेम रूप के रस-पान के लिए सदैव आतुर रहता है। इसलिए प्रत्येक मनुष्य को प्रेम के सुंदर रूप को स्वीकार करना चाहिए। उसको परमात्मा द्वारा निर्मित प्रत्येक जीवों के प्रति प्रेम भाव रखना चाहिए। यह परमात्मा का तोहफा है।

 

कहते हैं की परमात्मा को पाने के लिए एकमात्र सूत्र है कि पहले मनुष्य खुद से प्रेम करे, क्योंकि कठिन तपस्या के बाद ही कोई मनुष्य के रूप में जन्मता है। परमात्मा ने उसे विवेक और बल दिया ताकि वह मेहनत कर सुखी जीवन व्यतीत कर सके। हमें अपने शरीर से प्रेम होना चाहिए, क्योकि जीवन एक ही है और यह प्रयास करना चाहिए की अपनी ऊर्जा और मेहनत से दूसरे जीवों के काम आ सकें।

 

“मनुष्य को कभी निराश नही होना चाहिए। मुश्किलें क्षण भर की होती हैं और खुशियों के पल हमेशा हमारे आस-पास ही मौजूद रहती हैं”।

 

जीवन आनंदित होकर जीना सीखो

एक बार की बात है, एक नवयुवक अपने जीवन से बहुत परेशान था। एक दिन उसने निर्णय लिया की वह अपनी जीवन-लीला को समाप्त कर लेगा। वह जा कर रेल के पटरी पर अपने अंत समय का इंतजार करने लगा।

कुछ देर बाद उसे एक आवाज़ सुनाई दी। आवाज़ लगाने वाला व्यक्ति, विकलांग था। उसके दोनों पांव कटे थे और किसी तरह उस रेल की पटरी को पार करने की कोशिश कर रहा था। विकलांग व्यक्ति उससे कह रहा था की “क्या भैया मरने वाले हो क्या? ट्रेन आने वाली है”। इतना सुनने के बाद उस नवयुवक ने आत्महत्या का इरादा बदल लिया। उसने परमात्मा से क्षमा मांगी और मन में विचार किया की जब एक विकलांग व्यक्ति जीवन की कामना कर सकता है।तो यह पाप मैं क्यों करने जा रहा हूं? मैनें तो अभी ऐसा कुछ भी नहीं खोया है।

तब उस नवयुवक ने प्रण किया की वह दुनिया के तमाम साधनों में व्यर्थ परेशान नहीं होगा और प्रसन्न रहेगा। सबको जीवन को सही रूप में जीने के लिए प्रेरित करेगा। नवयुवक व्यक्ति आगे चल कर बहुत सफल हुआ, क्योंकि उसने जीवन का अनमोल मंत्र जान लिया था ।

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