190 साल से वीरान है ये गांव, अकेला इंसान यहां भटकने से भी कतराता है

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1:33 pm 3 Dec, 2015

इस देश में एक गांव ऐसा भी है, जहां दिन हो रात, बस सन्नाटा पसरा रहता है। जी हां, करीब 200 सालों से इस गांव में कोई बसने के लिए नहीं आया। इस गांव का नाम है, कुलधरा। और यह है, राजस्थान के जैलसमेर जिले में।

शहर से करीब 18 किलोमीटर दूर इस गांव में शमशान जैसी निस्तब्धता रहती है। यहां दिन रात तो दूर की बात है, दिन के उजाले में भी जाने से लोग खौफ खाते हैं।

इसके पीछे एक दंतकथा है। माना जाता है कि कुलधरा सहित जैसलमेर से लगे करीब 120 किलोमीटर इलाक़े में फैले 83 अन्य गांवों में पालीवाल ब्राह्मणों के परिवार रहा करते थे।

लेकिन उस समय के जैसलमेर रियासत के दीवान सालिम सिंह के अनगिनत ज़ुल्मों, अत्याचारी शासन से तंग आकर यहां के 5,000 से अधिक परिवार गांव छोड़कर चले गए।

1825 में गांव छोड़ते वक़्त पालीवाल ब्राह्मणों ने श्राप दिया था कि जो भी इस गांव में बसेगा बर्बाद एवं नष्ट हो जाएगा।

सालिम सिंह के बारे में कहा जाता है कि वह एक अत्याचारी शासक था जिसने पालीवाल ब्राह्मणों पर कई ज़ुल्म ढहाए। सालिम सिंह ने पालीवालों के लगान और करों में इतनी वृद्धि कर दी कि उनका खेती और व्यापार करना दूभर हो गया।

राजस्थान में ब्रिटिश राज के प्रतिनिधि जेम्स टॉड ने अपनी किताब ‘ऐनल्स एंड एंटिक्विटीज़ ऑफ़ राजस्थान’ में सालिम सिंह के अत्याचारों से परेशान होकर पालीवालों के कुलधरा छोड़ने का ज़िक्र करते हुए लिखा है-

“यह पैसे वाला समाज लगभग स्व निर्वासन में है और बैंकर्स अपनी मेहनत के मुनाफे के साथ घर लौटने को डरते हैं।”

पालीवाल ब्राह्मण उस समय की सिंध रियासत (अब पाकिस्तान में) और दूसरे कई देशों से भूतपूर्व सिल्क रूट द्वारा अफीम, नील, अनाज, हाथी दांत के बने आभूषण और सूखे मेवों का व्यापार करते थे। इसके साथ ही वह कुशल खेतिहर और पशुपालक भी थे।

जैसलमेर पर दो पुस्तकें लिखने वाले स्थानीय इतिहासकार नन्द किशोर शर्मा बताते है-


“पालीवाल, सिंह के अत्याचारों से दुखी थे, लेकिन अपने गाँवों को छोड़ने का फैसला उन्होंने तब किया जब सालिम सिंह ने उनकी एक लड़की पर बुरी नज़र डाली। सिंह की पहले से सात पत्नियां थीं।”

नन्द किशोर शर्मा ने अपनी किताब ‘जैसलमेर, दि गोल्डेन सिटी’ में लिखा है कि सालिम सिंह ने पालीवाल ब्राह्मणों को लड़की सौपने के लिए एक दिन का वक्त दिया। सिंह के इस व्यवहार से पालीवाल बहुत क्रोधित हुए। इस घटना से आहत होकर उन्होंने इलाके से निकलना ही उचित समझा।

राजस्थान पुरातत्व विभाग के कागज़ात भी शर्मा के उल्लेख की पुष्टि कर इसी बात को दर्शाते है-

“कालचक्र का एक और प्रतिकूल दौर आया और ब्राह्मण समाज को तत्कालीन जैसलमेर रियासत से मजबूर होकर अपने स्वाभिमान की रक्षा के लिए सन 1825 में सभी आबाद गांवों को एक ही दिन में छोड़ना पड़ा।”

ऐसा माना जाता है कि जैसलमेर छोड़ने के बाद पालीवाल मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में बस गए थे। उन्होंने जिन गांवों को छोड़ा उनमें से कई गांव नए नामों के साथ फिर से आबाद हो गए। लेकिन कुलधरा और खाबा के कुछ क्षेत्र (इन क्षेत्रों में पाकिस्तान से विस्थापित हिन्दू रहते हैं) आज तक सुनसान और ग़ैर-आबाद है।

20 साल पहले तीन विदेशी पर्यटक कुलधरा में गोपनीय खजानों की तलाश करते हुए पकड़े गए थे तभी से राजस्थान सरकार ने कुलधरा और खाबा को अपने अधिकार में ले लिया।

भारतीय पुरातत्व विभाग ने दोनों ही जगहों को संरक्षित घोषित किया है। राजस्थान पुरातत्व विभाग के साथ मिलकर, एक गैर-सरकारी संस्था जैसलमेर विकास समिति, कुलधरा और खाबा की देखरेख करती है।

पारानोर्मल सोसाइटी ऑफ़ इंडिया के गौरव तिवारी जो कई बार कुलधरा और खाबा जा चुके हैं, का कहना है कि उन्होंने वहां अपने इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स पर आत्माओं की मौजूदगी दर्ज की। लेकिन जैसलमेर विकास समिति के जुड़े लोग इस बात का ज़ोरदार खंडन करते हैं।

कुलधरा में 600 से अधिक घरों के अवशेष मौजूद है। यहाँ करीबन एक दर्जन कुएं, एक मंदिर, चार तालाब, बावली और आधा दर्जन छतरियां है। राजस्थान सरकार ने कुलधरा की इमारतों के पुनर्निर्माण के लिए 4 करोड़ रुपये दिए हैं।

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