कारगिल युद्ध में गंवा चुके अपने बेटे के सम्मान के लिए एक ‘जंग’ लड़ते बेबस माता-पिता

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4:42 pm 29 Apr, 2016


दिल से निकलेगी ना मर कर भी वतन की  उल्फत

मेरी मिटटी से भी खुशबू-ए-वतन आएगी

16 साल पहले एक नौजवान ने देश के लिए अपने जीवन का बलिदान दिया था। 16 साल पहले एक जवान ने अपने ज़िन्दगी महज इसलिए लुटा दी थी कि हमारा जीवन खुशियों के रंग से भर सके। उसने अपने आज को कुर्बान किया था कि हम कल को खुशहाल जिन्दगी जी सकें।

16 साल पहले उस नौजवान ने 22 दिनों तक यातना सही थी। और 16 साल से भारत माता के इस सपूत को अपने ही देश से न्याय का इंतज़ार है।

कैप्टन सौरभ कालियाहम कारगिल तो जीत गए पर आंसुओं का युद्ध हार गए।

कैप्टन सौरभ कालिया उन्होंने सिर्फ तुम्हारी आंखें नहीं फोड़ी, बल्कि हमारे भी आंखें बाहर निकाल दी। हम अंधे हो गए हैं, इसलिए तुम्हारे पिता की पीड़ा नहीं देख पा रहे। उन्होंने सिर्फ तुम्हारे कानों को नहीं भेदा, कैप्टन सौरभ कालिया, बल्कि हमारे भी कानों में गर्म तेल डाल कर इन्हें बहरा बना दिया है। यही वजह है कि तुम्हारी मां की एक दशक से अधिक समय से बिलखती सिसकियां नहीं सुन पा रहे हैं।

कैप्टन सौरभ कालिया, उन्होंने सिर्फ तुम्हारे सीने को नहीं जलाया, बल्कि हमारी छाती को भी छलनी कर दिया। हम एक राष्ट्र के रूप में इतने छोटे दिल के हो गए हैं कि कारगिल युद्ध के महानायक को भुला दिया गया है। शहीद कैप्टन सौरभ कालिया, हम कारगिल तो जीत गए, लेकिन आंसुओं का युद्ध पिछले 16 सालों से हारते आ रहे हैं।

कौन थे सौरभ कालिया?

मात्र 22 साल के सौरभ कालिया 4- जाट रेजीमेंट के अधिकारी थे। उन्होंने ही सबसे पहले पाकिस्तानी फ़ौज की कारगिल में नापाक इरादों की सेना को जानकारी मुहैया कराई थी।

कारगिल में तैनाती के बाद 5 मई 1999 को वह अपने पांच साथियों अर्जुन राम, भंवर लाल, भीखाराम, मूलाराम, नरेश के साथ लद्दाख की बजरंग पोस्ट पर पेट्रोलिंग कर रहे थे, तभी पाकिस्तानी सेना ने सौरभ कालिया और उनके साथियों को बंदी बना लिया। 22 दिन तक इन्हें बंदी बनाकर रखा गया और अमानवीय यातनाएं दी गई। उनके शरीर को गर्म सरिए और सिगरेट से दागा गया। आंखें फोड़ दी गई और निजी अंग काट दिए गए।

9 जून 1999 को इनका शव भारतीय अधिकारियों को सौंप दिए गया। सौरभ की मौत के 15 दिन बाद उनके परिवार को उनका शव सौंपा गया। सौरभ के परिवार ने भारत सरकार से इस मामले को लेकर पाकिस्तान सरकार और इंटरनेशनल कोर्ट ऑफ जस्टिस में मामला उठाने की बात कही थी।

गौरतलब है कि किसी युद्धबंदी की नृशंस हत्या करना जेनेवा संधि व भारत पाक के बीच द्विपक्षीय शिमला समझौते का भी उल्लंघन है। भारत ने 13 मई 1999 को पाकिस्तान सैनिकों द्वारा अपने इस बहादुर जवानों को बंदी बनाए जाने व उनकी नृशंस हत्या किए जाने के एक दिन बाद 14 मई 1999 को उन्हें मिसिंग घोषित किया था।

हालांकि, पाकिस्तान ने इन शहीदों का शव 22-23 दिन बाद सात जून 1999 को भारत को सौंपा था। मामला तब प्रकाश में आया जब एक पाकिस्तानी सैनिक ने ऐसी नृंशसता की बात को स्वीकार किया था। ठोस प्रमाण के बावजूद हमारे देश की सरकार आज तक शांत हैं, और यह चिन्ता का विषय है।

क्या कहती हैं जनता द्वारा चुनी गई जनता के लिए सरकारें?

अगर आप सरकार से कोई उम्मीद लगा रहे हैं तो रहने दीजिए। भाजपा जब सत्ता से बाहर थी, तब वह इस मुद्दे पर बहुत मुखर हुआ करती थी। वह 2013 में इस मुद्दे पर केंद्र सरकार पर ढीला रवैया रखने का आरोप लगा चुकी हैं। अब यही स्थिति भाजपा की है।


भाजपा और कांग्रेस दोनों विपक्ष में रहते हुए इस मुद्दे को उठाते रहे हैं, लेकिन सत्ता में रहने पर बारी-बारी से यह कह चुके हैं, पडोसी देश के खिलाफ वे इस मुद्दे पर अपील नहीं करेंगे। यहां पर राजनीति व कार्यनीति में अंतर साफ दिखता है।

हैरानी की बात तो यह है कि सौरभ कालिया का नाम सीमा पर जान गंवाने वाले शहीदों की सूची में भी शामिल नहीं है। सवाल यह है कि क्या सरकार द्वारा दी गई गैस एजेंसी इस शहीद के सम्मान में काफी है?

तो क्या कब्र ही इस देश के लिए शहीद होने वालों का सम्मान है?

बहुत दुःख होता है जब शहीद सौरभ कालिया के पिता डॉक्टर एन के कालिया कहते हैं कि:

“जब तक सांसे चलती रहेंगी, इस मुद्दे को उठाते रहेंगे। ये हमारी जितनी भी सेना है उसके मान सम्मान का प्रश्न है।”

पर सवाल यह है कि वह पिता जो इस जंग में अकेले लड़ रहा है, आखिर किससे लड़ रहा है? इस देश की न्यापालिका से? जो सरकार के सामने अपंग है। या फिर अपने देश की सरकार से? जो अपने स्वार्थवश नपुंशक हो चुकी है या हमसे जो इस सिस्टम से थक कर गूंगे और बहरे हो चुके है? या फिर खुद से कि आखिर अपने बेटे को सेना में क्यों भेज दिया?

सच तो यह है कि उन्होंने सिर्फ कैप्टन सौरभ कालिया के निजी अंगो को नहीं काटा, बल्कि पूरे देश का बधिया कर दिया। या फिर हम इतने नपुंशक हो चुके हैं कि उनसे अमन कि भीख मांगते हैं। सच तो यह है जब उन्होंने कैप्टन सौरभ कालिया पर घात लगा कर हमला किया, तब हमारे पीठ पर चाक़ू घोंपा गया था, लेकिन कैप्टन सौरभ कालिया शहीद हो गए और हम आज भी इस बेशर्मी में ख़ुशी से ज़िंदा हैं।

सच तो यह है हमने अपनी हिफाज़त के लिए सिर्फ 22 साल की उम्र में कैप्टन सौरभ कालिया को युद्ध पर भेजा था और आज भी उन्हें सम्मान दिला पाने में बेबस हैं।

और आखिरी सच तो यह है कि हमें शर्म आनी चाहिए कि हम अपने बेटे को एक जंग में भेजते तो हैं लेकिन उसे शहीद होने का सम्मान दिला पाने में बेबस हैं।

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