इंडियन आर्मी के इस कोबरा को अद्भुत साहस के लिए महावीर चक्र से नवाज़ा गया

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11:12 am 15 Mar, 2016


“बेटे! फ़तह से 48 घंटे पहले वी पी मलिक का बधाई स्वीकार करो। बेटे! अगर हम कारगिल जीते तो मलिक खुद कल सुबह तुम्हारे लिए नाश्ता बनाएगा।”

ये शब्द जनरल मलिक के हैं। यह बात उन्होंने महावीर चक्र विजेता नायक दिगेन्द्र कुमार को कही थी, वह भी कारगिल जाने से एक दिन पहले। दरअसल, जनरल मलिक को विश्वास था कि दिगेन्द्र का हौसला कारगिल के बर्फ को भी पिघला सकता है। उसकी हुंकार पाकिस्तानियों की नीन्दें उड़ा सकती हैं और जब वह निडर होकर दुश्मन की तरफ बढ़ता है, तो दुश्मनों के पास सिवाय मौत के इंतज़ार करने के अलावा और कोई रास्ता नहीं होता।

आइए आज जानते हैं, राजस्थान के झालरा मे जन्में दिगेन्द्र कुमार की बहादुरी की दास्तान।

देशभक्ति और बहादुरी विरासत में मिली थी।

दिगेन्द्र का जन्म 3 जुलाई 1969 को राजस्थान के सीकर जिले में हुआ था। दिगेन्द्र बचपन से ही वीरों की शौर्य-गाथाएं सुनने में रुचि लेते थे। बहादुरी उनको विरासत में मिली थी। उनकी माता राजकौर, जहां क्रांतिकारी परिवार से ताल्लुक रखती थीं। वहीं, पिता शिवदान रहबरे आजम दीनबंधु सर छोटूराम के कहने पर रेवाडी जाकर सेना में भर्ती हो गए।

पिता शिवदान बहादुर सैनिक थे। वर्ष 1948 में पाकिस्तान के साथ युद्ध में पीर बडेसर की पहाड़ी पर शिवदान की सांस की नली में ताम्बे की गोलियां घुस गईं, जो जीते-जी वापस नहीं निकलवाईं जा सकीं। यही नहीं, उनके जबड़े में भी 11 गोलियां लगी थीं।

पिता के अलावा, दिगेन्द्र के नाना बुजन शेरावत आजाद हिंद फौज के सिपाही थे। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान बसरा-बगदाद की लडाई में वे वीरगति को प्राप्त हुए। बचपन से ही दिगेन्द्र का सपना था कि वह भी फ़ौज में अपनी सेवा देकर नाना और पिता का नाम रोशन करे। वह 3 सितंबर 1985 राजस्थान राइफल्स 2 में भर्ती हो गए।

जम्मू-कश्मीर में आतंकवादी कमांडर को मार कर जब कंधे पर उठा लाया।

वर्ष 1993 में दिगेन्द्र की बटालियन जम्मू-कश्मीर के अशांत इलाके कुपवाडा में तैनात थी। यह ऐसा इलाक़ा था, जहां उग्रवादियों ने अपना शिकंजा कस रखा था। आतंकवादियों का कमांडर मजीद खान की वजह से स्थानीय लोगों में दहशत थी। यही वजह है कि लोग प्रशासन से सहयोग नहीं कर पा रहे थे।

मजीद खान एक दिन कंपनी कमांडर वीरेन्द्र तेवतिया को धमकाने आया और साथ में चेतावनी भी दी। वीरेन्द्र तेवतिया ने यह बात दिगेन्द्र को बताई। बस तुरंत दिगेन्द्र ने भी ठान लिया कि अब मजीद खान को सबक सिखाने का वक़्त आ गया है और वह तत्काल मजीद खान के पीछे दौड़ पड़ा। पीछा करते हुए वह एक चोटी पर चढ़ गया। जहां से सटीक निशाना लगा कर मजीद को ढेर कर दिया। यही नहीं, उसकी लाश को कंधे पर लाद कर कर्नल के आगे रख दिया। इस साहस के लिए दिगेन्द्र को सेना मेडल भी मिला।

जम्मू-कश्मीर में हजरत बल दरगाह पर जब आतंकवादियों ने कब्जा कर वहां अपना अड्डा बना लिया, तब भारतीय सेना ने एक बड़े ऑपरेशन को अन्जाम देने की योजना बनाई। इस ऑपरेशन में दिगेन्द्र ने बहादुरी का परिचय दिया और आतंकवादियों को मार गिराया। इसके लिए 1994 में उन्हें बहादुरी का प्रशंसा पत्र मिला।

श्रीलंका शान्ति अभियान में दिखा गजब का पराक्रम

वर्ष 1987 में श्रीलंका में लिट्टे उग्रवादियों का वर्चस्व बढ़ता जा रहा था। श्रीलक़ा सरकार उनकी मांगों के आगे असहाय खड़ी थी। तब मजबूर होकर श्रीलंका सरकार ने भारत से सहयता मांगी। श्रीलंका की मदद के लिए भारत सरकार ने ऑपरेशन पवन की शुरुआत की।

इस अभियान के शुरुआती दौर में दिगेन्द्र के पांच साथी शहीद हो गए और हमलावर जाकर विधायक के घर में छुप गए। दिगेन्द्र और उसकी बाकी पलटन ने विधायक के घर का घेराव किया। कहा जाता है कि विधायक ने सहयोग नहीं किया। इस मुठभेड़ में विधायक और उग्रवादियों की मौत हो गई।

हालांकि, पहली मुठभेड़ सफल रही। लेकिन तमिल विधायक की मौत के मामले में दिगेन्द्र का कोर्ट मार्शल कर दिया गया।

इधर, ये सब चल ही रहा था कि उग्रवादियों ने सेना के 36 सैनिकों को बंदी बना लिया। इन 36 सैनिकों को कैद में 72 घंटे हो चुके थे, लेकिन बचाव का कोई उपाय नहीं सूझ रहा था। आख़िरकार कई बैठकों के बाद यह तय हुआ कि इस साहसिक कार्य के लिए दिगेन्द्र उपयुक्त है। और फिर दिगेन्द्र को इस अभियान की जिम्मेदारी सौंपी गई।


इस अभियान को दिगेन्द्र ने बड़े ही साहसिक तरीके से अन्जाम दिया। इसमें 39 उग्रवादी मारे गए थे।

दिगेन्द्र की बहादुरी और जज़्बे को देखते हुए उसके खिलाफ फाइलों को निरस्त कर दिया गया। उसे बहादुरी का मेडल मिला और रोज दाढ़ी बनाने से छूट दी गई।

दिगेन्द्र कुमार ने दिलाई कारगिल युद्ध में पहली विजय

कारगिल युद्ध मे तोलोलिंग पर कब्जा करना इसलिए भी सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योकि तोलोलिंग पर क़ब्ज़े ने कारगिल युद्ध की दिशा ही बदल दी थी। 2 राजपूताना राइफल्स को इस कार्य का ज़िम्मा सौपा गया था। जनरल मलिक ने इस सेना की टुकड़ी से तोलोलिंग पहाड़ी को आजाद कराने की योजना पूछी। तब दिगेन्द्र ने जवाब कुछ इस तरह दिया था।

“मैं दिगेन्द्र कुमार उर्फ़ कोबरा बेस्ट कमांडो ऑफ़ इंडियन आर्मी, २ राजपूताना रायफल्स का सिपाही। मेरे पास योजना है, जिसके माध्यम से हमारी जीत सुनिश्चित है।”

दिगेन्द्र के इस विश्वास से उत्साहित जनरल मलिक ने इस अभियान से जुड़ी दिगेन्द्र की मांगें, जिसमें 100 मीटर का रूसी रस्सा, जिसका औसतन भार 6 किलो होता है और वह 10 टन तक भार उठाने में सक्षम होता है, के साथ कीलें और हाई पावर के इंजेक्शन मुहैया करा दिए।

दिगेन्द्र और उनके साथियों ने ज़मीन से 5 हजार फुट ऊपर पहाड़ियों में कीलें ठोंक दी और मंजिल तक पहुंचने के लिए रस्सा बांध दिया। योजना के अनुसार, तोलोलिंग पहाड़ी को मुक्त कराने के लिए कमांडो टीम में मेजर विवेक गुप्ता, सूबेदार भंवरलाल भाकर, सूबेदार सुरेन्द्र सिंह राठोर, लांस नाइक जसवीर सिंह, नायक सुरेन्द्र, नायक चमनसिंह, लांसनायक बच्चूसिंह, सी.ऍम.अच्. जशवीरसिंह, हवलदार सुल्तानसिंह नरवारिया एवं नायक दिगेन्द्र कुमार थे।

यह काम आसान नहीं था, क्योकि पाकिस्तानी सेना ने ऊपर चोटी पर अपने 11 बंकर बना रखे थे। और उससे ऊपर था घना अंधेरा।

शरीर में खून जमा देने वाली बर्फ में दिगेन्द्र धीरे-धीरे बढ़ रहे थे। तभी उन्हें एहसास हुआ कि वे दुश्मन के बैरक के बिल्कुल करीब हैं। दिगेन्द्र ने एक हथगोला बंकर में सरका दिया, जो जोर के धमाके से फटा और अन्दर से आवाज आईः “अल्हा हो अकबर, काफिर का हमला।” दिगेन्द्र का तीर सही निशाने पर लगा था। पहला बंकर राख हो चुका था।

इसके बाद आपसी फाइरिंग तेज़ हो गई। दिगेन्द्र बुरी तरह जख्मी हो गए थे। उनके सीने में तीन गोलियां लगी थी। एक पैर बुरी तरह जख्मी हो गया था। एक पैर से जूता गायब और पैंट खून से सनी थी। दिगेन्द्र की एलएमजी भी हाथ से छूट गई। शरीर कुछ भी करने से मना कर रहा था। साथी सूबेदार भंवरलाल भाकर, लांस नाइक जसवीर सिंह, नायक सुरेन्द्र, नायक चमनसिंह, सुल्तानसिंह और मेजर विवेक गुप्ता शहीद हो चुके थे। पर दिगेन्द्र ने हिम्मत नहीं हारी। झट से प्राथमिक उपचार कर बहते खून को रोका।

दिगेन्द्र ने अकेले ही 11 बंकरों में 18 हथगोले फेंके और उन्होंने सारे पाकिस्तानी बंकरों को नष्ट कर दिया। तभी दिगेन्द्र को पाकिस्तानी मेजर अनवर खान नज़र आया। वह झपट्टा मार कर अनवर पर कूद पड़े और उसकी हत्या कर दी।

दिगेन्द्र पहाड़ी की चोटी पर लड़खडाते हुए चढ़े और 13 जून 1999 को सुबह चार बजे तिरंगा गाड़ दिया।

तत्कालीन सरकार ने दिगेन्द्र कुमार को इस अदम्य साहस पर महावीरचक्र से नवाजा। उनके इस हौसले को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम।

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