ये है स्वतंत्रता के बाद भारतीय राज्यों के विलय की कहानी

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12:10 pm 9 Feb, 2016

वर्ष 1947 में स्वतंत्र होने के बाद भारत 565 स्वतंत्र रियासतों में बंटा हुआ था। माउन्टबेटन ने जो प्रस्ताव भारत की आजादी को लेकर जवाहरलाल नेहरू के सामने रखा था, उसमें यह प्रावधान था कि भारत के 565 रजवाड़े भारत या पाकिस्तान में किसी एक में अपनी रियासत के विलय को चुनेंगे। इसमें एक प्रावधान यह भी था कि दोनों के साथ न जाकर ये रिसायत अपने को स्वतंत्र रख सकेंगे।

आज जो हम विशाल भारत की सूरत देखते हैं, वह सरदार वल्लभ भाई पटेल की रणनीतियों की वजह से संभव हो सका था। अगर ऐसा नहीं होता तो इस देश के कितने टुकड़े होते और भारत से अलग होकर कितने नए देश बनते यह कह पाना मुश्किल होता।

सरदार वल्लभ भाई पटेल ने चतुराई से भारत के हिस्से में आए रजवाड़ों को एक-एक करके विलय पत्र पर हस्ताक्षर करवा लिए। इसके बावजूद कुछ रजवाड़े भारत संघ मे मिलने से आनाकानी कर रहे थे।

आइए जानते है भारत के उन राज्यों के विलय की कहानी जो शुरुआत में भारत से अलग होने की मंशा रखते थे।

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हैदराबाद

विभाजन के बाद हैदराबाद के निजाम उस्मान अली खान ने यह फैसला किया कि हैदराबाद रियासत न तो भारत और न ही पाकिस्तान में शामिल होगा। यह रियासत एक समृद्ध रियासतों मे से एक था।

हैदराबाद के पास अपनी सेना, रेलवे, एयरलाइन नेटवर्क, डाक व्यवस्था और रेडियो नेटवर्क था। जब 15 अगस्त 1947 को भारत ने खुद को एक स्वतंत्र राष्ट्र घोषित कर दिया, तो हैदराबाद ने भी खुद को स्वतंत्र अधिकार वाला देश घोषित कर दिया।

भारत के मध्य में एक स्वतंत्र हैदराबाद देश होने का विचार, हैरान करने वाला था। तब उप प्रधानमंत्री सरदार पटेल ने लार्ड माउन्टबेटन के साथ परामर्श किया। माउंटबेटन की यह राय थी कि यह मसला बिना किसी सैन्य बल के सुलझा लिया जाए।

भारत ने इसके बाद हैदराबाद को एक प्रस्ताव भेजा, जिसमें यह कहा गया था कि वह अपने निर्णय पर पुनः विचार करें और साथ ही यह अाश्वासन भी दिया कि इसके बदले कोई भी सैन्य कार्रवाई नहीं की जाएगी।

जून 1948 में भारत छोड़ने से पहले माउन्टबेटन ने हैदराबाद को एक और प्रस्ताव दिया कि वह भारत से समझौता कर ले, जिसके अंतर्गत हैदराबाद भारत की प्रभुता के अधीन एक स्वायत्त राष्ट्र का दर्जा प्राप्त कर सकता है। समझौते के मसौदे में शर्त रखी गई थी कि हैदराबाद अपने सशस्त्र बलों पर प्रतिबंध लगाएगा और स्वैच्छिक बलों को स्थगित करेगा। साथ ही हैदराबाद अपने क्षेत्र पर शासन कर सकता है, लेकिन विदेश नीति भारत सरकार तय करेगी। इस समझौते पर भारत ने हस्ताक्षर कर दिए, लेकिन निजाम ने इनकार कर दिया।

अभी समझौते पर बात चल ही रही थी कि हैदराबाद मे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक दंगे हो गए। पूरे राज्य में तनाव था। हैदराबाद को पाकिस्तान और गोवा के पुर्तगाली प्रशासन से हथियार प्राप्त हो रहे थे। जैसे ही भारत सरकार को जानकारी हुई कि हैदराबाद पाकिस्तान के साथ गठबंधन करने की योजना बना रहा है, भारत ने तब हैदराबाद को क़ब्ज़े मे लेने का फैसला किया।

इस अभियान का नाम दिया गया ऑपरेशन पोलो। 13 सितंबर 1948 को भारत और हैदराबाद के बीच लड़ाई शुरू हुई जो 18 सितंबर तक चली। निजाम की सेना ने भारतीय सेना के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और इस तरह हैदराबाद भारत का हिस्सा बन गया।

सिक्किम

भारत की आजादी के पहले सिक्किम को ब्रिटिश सरकार से विशेषाधिकार प्राप्त थे। अंग्रेज़ो के जाने के बाद ये विशेषाधिकार समाप्त हो गए। उसके बाद शासक ताशी नामग्याल स्थानीय पार्टियों और लोकतंत्र समर्थक दलों के कड़े प्रतिरोध के बावजूद सिक्किम को एक विशेष संरक्षित राज्य का दर्जा दिलाने में सफल हो गए।

स्थानीय राजनीतिक दल जो लोकतंत्र समर्थक थे, चाहते थे कि सिक्किम भारत में मिल जाए। भारत सिक्किम की बाहरी रक्षा, कूटनीति और संचार नियंत्रित कर रहा था। 1955 मे राज्य परिषद स्थापित किया गया, जिसपर पूर्ण नियंत्रण ताशी नामग्याल का था। राजा को ‘चोग्याल’ नाम से पुकारा जाता था।

1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान, सिक्किम एक स्वतंत्र देश था। नाथूला नामक जगह पर भारतीय सीमा रक्षकों और चीनी सैनिकों के बीच झड़पें हुई। 1963 में ताशी नामग्याल की मौत हो गई। इसके बाद उनके बेटे पालदेन थोंडुप नामग्याल को सिंहासन मिला।


भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी चोग्याल को भारत के लिए ख़तरा मानती थी। 1973 तक सिक्किम की राजनीतिक व्यवस्था आंतरिक कारण की वजह से टूट चुकी थी। 1974 तक सिक्किम सहयोगी राज्य से एक संरक्षित राज्य मे तब्दील हो चुका था। काजी लेनदूप दोरजी इस राज्य के पहले मुख्यमंत्री बने।

चोग्याल सम्राट के अत्याचारी रूप को सिक्किम देख चुका था। भारतीय सेना ने चोग्याल के महल को अपने क़ब्ज़े में ले लिया और सीमाओं को बंद कर दिया। चोग्याल किसी भी हाल में भारत के साथ विलय नही करना चाहता था। जब वह विफल हो गया तो भारत छोड़ कर अमेरिका भाग गया।

14 अप्रैल 1975 को एक जनमत संग्रह का आयोजन किया गया। इस घटना के बाद सिक्किम भारत संघ का हिस्सा बन गया।

जूनागढ़

विभाजन के बाद भारत सरकार जूनागढ़ के नवाब मुहम्मद महाबत खनजी तृतीय पर यह दबाव बना रही थी कि वह विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर भारत संघ का हिस्सा बन जाएं। लेकिन सारे प्रयास विफल हो रहे थे ।यहां तक नवाब के इनकार के नौबत में भारत ने धमकियों का भी सहारा लिया।

जूनागढ़ की 3 तरफ़ की सीमा रेखाएं भारत से जुड़ी हैं और चौथी समुद्र से। इसके बावजूद जूनागढ़ के नवाब की मंशा थी की जूनागढ़ पाकिस्तान में समुद्र के रास्ते मिल जाए।

यहां तक कि जिन्ना ने मंजूरी भी दे दी थी और 15 सितंबर, 1947 को विलय पत्र पर जूनागढ़ के संबंध में हस्ताक्षर भी कर दिए। भारतीय सरकार ने अपने सचिव वी.पी. मेनन से यह संदेश भिजवाया की नवाब अपना फ़ैसला बदल लें और पाकिस्तान के साथ जो समझौता किया है उसे वापस ले लें। लेकिन नवाब नही माने और इस समझौते की पूरी ज़िम्मेदारी पाकिस्तान के पाले में डाल कर साफ इनकार कर दिया।

समझौता न हो पाने की स्थिति में भारत ने जूनागढ़ के लिए अपने सभी सीमाओं को बंद कर दिया। माल , परिवहन और डाक वस्तुओं की आवाजाही बंद कर दी। स्थिति बिगड़ती देख नवाब और उनके परिवार ने जूनागढ़ छोड़ दिया और 25 अक्टूबर 1947 को कराची भाग गया।

जूनागढ़ के मुख्यमंत्री ने पाकिस्तान को एक पत्र लिखा। जवाबी टेलीग्राम में जूनागढ़ के नवाब ने भुट्टो को यह अधिकार दिया की मुस्लिम आबादी के सर्वोत्तम हित में वह निर्णय लेने के लिए सक्षम हैं। तब भुट्टो ने भारत के साथ परामर्श करने का फैसला लिया।

भारत से विचार विमर्श के बाद यह तय हुआ की भारत जूनागढ़ के नागरिकों के जीवन की रक्षा के लिए सत्ता अपने हाथ में ले ले। अंततः फरवरी 1948 में एक जनमत संग्रह का आयोजन किया गया, जिसमें मुख्य रूप से हिंदू जो आबादी का 99 प्रतिशत हिस्सा थे, भारत में शामिल होने के लिए मतदान किया।

दादरा और नगर हवेली

1947 में भारत की आजादी के बाद भारत समर्थक कार्यकर्ताओं जो पुर्तगाली भारतीय प्रांतों में रह रहे थे, ने गोवा, दमन और दीव, दादरा और नगर हवेली से पुर्तगाली नियंत्रण हटाने का प्रस्ताव रखा और भारत से विलय का विचार बनाया।

22 जुलाई 1954 को ‘गोवा के संयुक्त मोर्चा’ दल ने दादरा के पुलिस स्टेशन पर हमला किया और भारतीय ध्वज फहराया और दादरा को एक मुक्त क्षेत्र घोषित कर दिया।

28 जुलाई को कुछ आरएसएस स्वयंसेवकों ने नरोली पुलिस स्टेशन पर धावा बोला और अधिकारियों को आत्मसमर्पण करने के लिए बोला। इस प्रकार नरोली को भी पुर्तगाली शासन से मुक्त करा लिया गया।

नरोली के क़ब्ज़े के बाद पुर्तगाली पुलिस सिलवासा में केंद्रित हो गए थे, लेकिन जब सिलवासा में भी उन्हे आत्मसमर्पण करने के लिए कहा गया तो करीब 150 पुलिस कर्मी खानवेल भाग गए। लगातार प्रतिरोध झेल रहे पुर्तगालियों को कोई चारा नहीं मिल रहा था। राष्ट्रवादियों ने 2 अगस्त को सिलवासा में भी प्रवेश कर लिया और दादरा और नगर हवेली के क्षेत्र को स्वतंत्र घोषित कर दिया।

1954-1961 के बीच इस क्षेत्र पर एक स्वतंत्र संगठन की सत्ता थी, जिसे वरिष्ठ पंचायत के नाम से बुलाया जाता था। अंततः 1961 में भारतीय सेना ने गोवा, दमन और दीव की जिम्मेदारी संभाल ली। एक दिन के लिए प्रधानमंत्री रहे बदलानी ने जवाहर लाल नेहरू से भारत में विलय करने की बात कही और समझौता पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए।

इस तरह औपचारिक रूप से भारत के गणराज्य में दादरा और नगर हवेली का विलय हुआ।

गोवा

‘1961 के गोवा का भारत में विलय’ दरअसल भारत के सशस्त्र बलों की कार्रवाई थी। जिसकी वजह से 1961 में भारत पर पुर्तगाली शासन पूर्ण रूप से समाप्त हो गया। इस गुप्त सशस्त्र कार्रवाई का नाम दिया गया ऑपरेशन विजय।

इस ऑपरेशन में वायु, ज़मीनी और सामुद्री हमलों द्वारा 451 सालों से चली आ रही पुर्तगाली औपनिवेशिक शासन को समाप्त कर दिया गया था।

प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने कई बार कोशिश की कि गोवा भारत संघ का हिस्सा बन जाए। लेकिन बात बनी नही। जब नवंबर 1961 में जब पुर्तगाली सेना ने जब एक भारतीय नाव पर बम वर्षा कर दी, तब भारत ने अपना आपा खो दिया। तब यह निर्णय लिया गया कि पुर्तगाली शासन को समाप्त करना है।

करीब 30 हजार सैन्य बलों वाला एक मिशन बना और गोवा पर आक्रमण किया गया। 3 हजार पुर्तगाली सैनिक भारत की विशाल सेना के आगे विवश थे। पुर्तगाली गवर्नर ने अन्य देशों से मदद की गुहार लगाई।

लेकिन संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन या अन्य किसी देश ने पुर्तगाल का साथ नही दिया। तब पुर्तगाली गवर्नर ने सफेद झंडा फहरा कर आत्मसमर्पण कर दिया और इस तरह गोवा भारत से जुड़ गया।

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