जिस बुधिया को रातों रात आपने बनाया था सितारा; देखिए सिस्टम ने क्या हाल कर दिया उसका

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4:44 pm 12 Aug, 2016


भारत में मैराथन या दौड़ से संबंधित खेलों के बारे में सुनते ही जिस शख़्स का नाम सबसे पहले ज़ेहन में आता है वो हैं ‘मिल्खा सिंह’। लेकिन सबसे दुःख की बात यह है कि आज उनको ट्रैक पर उतरे 60 साल से भी अधिक समय हो गया है। सवाल फिर भी वही कहीं न कहीं सिस्टम पर चोट करता है कि ‘मिल्खा के बाद मिल्खा जैसा इस देश में कोई और क्यों नही दौड़ पाया? क्या इस देश में मिल्खा जैसा कोई दूसरा पैदा नही हुआ? या फिर मिल्खा जैसा किसी को बनने नही दिया गया?

तो चलिए आज हम आपको मिलवाते हैं उस छोटे बच्चे से जो महज पांच साल की उम्र में देश का दूसरा मिल्खा सिंह बन सकता था। लेकिन कहीं न कहीं हालत ने, हमने, आपने उसे वह बनने नहीं दिया।

2 मई 2006 यह वही तारीख है, जब पूरी दुनिया की निगाह हिन्दुस्तान की तरफ थी। ऐसा नही था की भारत कोई परमाणु विस्फोट करने जा रहा था, लेकिन जो हो रहा था वो किसी परमाणु धमाके से कम नही था। ओड़ीसा के जगरनाथ पूरी में 5 साल की उम्र मे एक बच्चा अपने जूते के फीते बाँध कर मैराथन की दुनिया में धमाल करने को तैयार था और उस बच्चे का नाम था बुधिया।

एक गंदी झुग्गी बस्ती में रहने वाले इस बच्चे को दुनिया भर के कैमरों ने घेर रखा था। उस दिन जगन्नाथपुरी से बुधिया के साथ कुछ सीआरपीएफ के जवान भी दौड़े थे, लेकिन कुछ किलोमीटर के बाद ही वे बुधिया के हौसले के आगे लड़खड़ा कर रुक गए। बुधिया फिर भी दौड़ता रहा। लोगों की आंखें थक गईं, लेकिन बुधिया के नन्हें कदम कमज़ोर नही पड़े।

बुधिया ने 55 किलोमीटर की दूरी ऐसे तय कर ली थी, मानो वो सिर्फ़ 55 मीटर हों। बुधिया रातो रात सुपरस्टार बन चुका था। ऐसा लगा कि देश को दूसरा मिल्खा सिंह मिल चुका है। एक आस जगी थी कि अब दुनिया में जहां भी मैराथन होगा, वहां बुधिया का नाम होगा।

हालांकि, रातों रात आसमान में चमकने वाला यह सितारा बस कुछ रातों बाद ही अंधेरे में कहीं खो गया।

बुधिया जैसे ही स्टार बना सरकार, मीडिया और रिश्तेदारों ने उसे घेर लिया और हर कोई बुधिया पर अपना-अपना दावा करने लगा। पर बुधिया इस छोटी उमर में ये दुनियादारी के झमेले समझने के काबिल नही था। उसको तो सिर्फ़ एक जुनून था और वह था दौड़ने का। ऐसा ही एक वाक़या है कहते हैं कि कोच बिरंची दास एक बार गुस्से में आकर बुधिया को मैदान में दौड़ने की सज़ा दे कर कहीं चले गए। 8 घंटे बाद जब वह लौटे, तो उन्होने पाया कि बुधिया अभी भी मैदान में दौड़ रहा है।

पेशे से जूडो कोच बिरंची उसी दिन समझ गए थे कि बुधिया कोई सामान्य बच्चा नहीं है। बुधिया असाधारण था, लेकिन उसकी किस्मत वैसी नही थी।

बुधिया के स्टार बनते ही सबसे पहले उसपर दावा उसकी वही मां ने ठोका, जिसपर आरोप लगे थे की उसने बुधिया को मात्र 800 रुपए में बेच दिया था। यही नहीं, बुधिया की मां ने कोच बिरंची पर आरोप लगा दिए कि बिरंची उसके बच्चे पर ज़ुल्म ढा रहा है। और तो और  मां से भी दो कदम आगे सरकार निकली। वही सरकार जो अभी तक बुधिया के घर झांकने तक नहीं आई थी। वही सरकार बुधिया की सबसे बड़ी हमदर्द बनकर बिरंची के सामने खड़ी थी।

हालात ऐसे बने कि कोच बिरंची को बेबस होकर बुधिया को सरकार के हवाले सौपना पड़ा। सरकार ने बुधिया को अपने स्पोर्ट्स हॉस्टल में डाल दिया। साथ में सरकार ने बुधिया को मैराथन दौड़ने पर यह हवाला देकर पाबंदी लगा दी कि उसकी उम्र इस खेल के इस दौड़ के लायक नहीं है। इसके बाद देश ने दूसरे मिल्खा सिंह को खो दिया।

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बुधिया अचानक बने इन हालात को समझने की कोशिश कर ही रहा था कि उसकी ज़िंदगी में एक और तूफान आ गया। अप्रैल 2008 में अपने बेटे की तरह मानने वाले कोच बिरंची की हत्या कर दी गई। इस घटना के बाद धीरे-धीरे वह आस भी जाती रही कि बुधिया एक बार फिर दौड़ सकेगा।

आज भी बुधिया का घर भुवनेश्वर की सबसे बड़े झुग्गी बस्ती में है। जी हां, वही बुधिया जिसके पैरों को 10 साल पहले दौलत और शोहरत दोनों ही चूम रहे थे, आज भी तंगहाली में जीने को विवश हैं। वही बुधिया जिसको एक वक़्त सबने अपनी आंखों पर चढ़ा रखा था। वही बुधिया आज एक छोटे से कमरे में अपनी बहनो और मां के साथ रह रहा है।

बुधिया के नाम पर मां को ज़रूर एक प्राइवेट यूनिवर्सिटी में फोर्थ क्लास की नौकरी मिल गई है, लेकिन तनख़्वाह बस उतनी ही है कि दो जून की रोटी मिल जाए। और जब बुधिया से हॉस्टल में मिल रही सुविधाओं के बारे में पूछा जाता है, तो आप उसका जवाब सुन कर सरकारी सिस्टम का हाल जान सकते हैं।

“मेरा मानना है कि मैं मैराथन में दौड़ने के लिए पैदा हुआ हूं। अब भी मैं बिना थके घंटों पहले से अधिक दौड़ सकता हूं। यहाँ न तो मुझे आवश्यकता अनुसार कोचिंग मिल रही है और न ही खाना। अभी मुझे सिर्फ़ 3-4 पीस ही चिकन के मिलते हैं, बल्कि जब मैं चार साल का था तो बिरंची सर इससे अधिक खिलाया करते थे। मुझे लगता है जैसे मैं एक जेल में हूं।”

सरकार हो या बुधिया के मौजूदा कोच हर कोई कहता है बुधिया 14 साल की उम्र से पहले दौड़ नही सकता, क्योकि अभी वो बच्चा है। ताज्जुब होता है इस जवाब को सुनकर। मैं सबसे सीधा सवाल पूछना चाहता हूँ की आज तक जो कुछ भी खेल की दुनिया में हुआ है क्या वो उम्र के पैमाने पर हुआ है?

जब महज़ 6 साल की करीना पाबला न्यूजीलैंड में 10 किलोमीटर दौड़ कर दुनिया को हैरत में डाल सकती हैं तो बुधिया को उम्र के दायरे में बाँध कर क्यों रखा गया? जब 6 साल 11 महीने का पीयूष दर्शन भारत का सबसे छोटा स्काई डाइवर बन सकता है, तो बुधिया के पैरों में उम्र की बेड़ियां क्यों बांधी गई? जब आठ साल की कैटरीना 35,000 धावकों के साथ 13 मील की रेस पूरी कर के इतिहास रचती है, तब  बुधिया को यह कह कर क्यों रोका गया कि वो बच्चा है?

मुझे दुःख होता है कि आज सरकारी पचड़ों में फंसे बुधिया की हालत किसी सरकारी फाइल की ही तरह हो गई है। ऐसी फाइल जो पहले छोटे बाबू फिर बड़े बाबू उसके बाद बड़े साहब की मेज़ पर अपना वक़्त आने के इंतज़ार में धूल खाती रहती है। बुधिया भी उम्र के फेर में फंस कर अपना वक़्त आने के इंतज़ार में अब मैदानो की धूल फांक रहा है। बचपन बचाने की राजनीति करने के चक्कर में हमारे देश ने उस छोटी उम्र के धावक के पैर ही थाम दिए, जिसे सही ट्रेनिंग और परिवार देकर ओलंपिक के लिए तैयार किया जा सकता था।

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