गंभीर रूप से घायल होकर भी इस जवान ने लश्कर के आतंकियों से 16 घंटों तक लिया लोहा

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6:07 pm 28 Mar, 2016


सुनील कुमार राज़दान अक्षम होने के बावजूद भारतीय सेना में मेजर जनरल बनाए गए थे। भारतीय सेना में इस रैंक तक पहुंचने वाले वह पहले दिव्यांग अधिकारी हैं। यही नही, जम्मू-कश्मीर में लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों को ढेर करने में उनकी साहसिक भूमिका के लिए वर्ष 1996 में उन्हें ‘कीर्ति चक्र’ से सम्मानित किया गया था।

राज़दान पहली नज़र में एक सामान्य व्यक्ति दिखते हैं। वह व्हील चेयर पर बैठकर अपने काम सहजता से करते हैं। राज़दान जब धीरे-धीरे यादों के गर्त में जाते हैं, तो वास्तव में उनके सेना के जवान होने का आभास होता है। वह आज करोड़ों भारतीयों के लिए प्रेरणा हैं। राज़दान कहते हैंः

“सेना का जीवन बहुत ही चुनौतीपूर्ण है। एक ही पल में यहां कई तरह की स्थितियों का सामना करना पड़ता है। एक ही पल में निर्णय लेने की ज़रूरत पड़ती है। इसका प्रभाव आपके और दूसरों के जीवन पर पड़ता है।”

राज़दान कहते हैं कि हमारा काम तब शुरू होता है, जब दूसरों का काम खत्म होता है। यही कारण है कि हमें न केवल शारीरिक रूप से फिट होना पड़ता है, बल्कि मानसिक रूप से भी बहुत चुस्त होना पड़ता है। और सबसे अच्छी बात यह है कि यहां आपको अपने देश की सेवा करने का अवसर मिलता है।

राज़दान का जन्म 8 अक्टूबर को हुआ था, लेकिन शायद उनको यह नहीं पता था कि उनके जन्मदिन के ही दिन कुछ ऐसा होगा, जो उनके जीवन को पूरी तरह बदल देगा।

राजदान 7वीं पैराशूट बटालियन के जवान थे। 1990 के दशक के दौरान उनकी तैनाती जम्मू-कश्मीर में हुई थी। यह वह दौर था जब सीमापार से घुसपैठ की घटनाएं चरम पर थीं। घटना 1994 के उनके जन्मदिन यानी 8 अक्टूबर की है। बटालियन को जानकारी मिली कि लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों ने कश्मीर के पास के ही एक गांव से  14 लड़कियों का अपहरण कर लिया, जिनकी उम्र 14 से 30 के बीच में थी।

20 जवानों की एक टीम बनाई गई। फिर शुरू हुआ एक गोपनीय मिशन, जिसका लक्ष्य था बिना किसी नुकसान के उन आतंकवादियों को नेस्तनाबूत करना। पर क्या यह इतना आसान था?

करीब 12 घंटे के खोज अभियान के बाद पता चला कि लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादियों ने उन लड़कियों को डमल कुंज़ीपुर नमक जगह पर, एक चार मंजिला मकान में क़ैद कर रखा है। उस मकान के पास पहुंचने के बाद उन्हें पता चला कि आतंकवादी सबसे ऊपरी मज़िल पर डेरा डाले हुए हैं। मौके का लाभ उठाते हुए सैनिकों ने धीरे-धीरे एक-एक लड़की को खिड़की के रास्ते बाहर निकालना शुरू कर दिया। पर मुश्किल की तो अभी शुरुआत भर थी।

कैदियों को मुक्त कराने की प्रक्रिया में लड़कियों की आवाज़ ने आतंकवादियों को सतर्क कर दिया। राज़दान ने बत्तियां बुझा दी और सही मौके का तलाश करने लगे। जैसे ही एक आतंकवादी उनके करीब आया, वह उस पर झपट पड़े और हथियार छीन कर उसे मौत के घाट उतार दिया। ऐसे ही उन्होंने दूसरे को भी खत्म कर दिया।

जब तीसरे आतंकवादी को वह मरा समझ कर उसके हथियार उठाने गए, तो उसने राज़दान के पेट में गोलियां दाग दी। इनमें से कई गोलियां उनके पेट को चीरते हुए रीड की हड्डी को भेद चुकी थी।

फिर भी राज़दान ने हिम्मत नहीं हारी। 16 घंटे से भी अधिक चले इस मुठभेड़ में राज़दान पीछे नहीं हटे। कमीज़ खून से सन चुकी थी, पर उनकी आवाज़ में अब भी वही रौब था। 9 आतंकवादियों को मौत के नींद सुलाया जा चुका था। स्थिति पर काबू पाने के बाद उन्हें अस्पताल पहुंचाया गया। राज़दान कहते हैंः

“मेरा जीवन बहुत बदल गया था। मैं एक सामान्य व्यक्ति की तरह काम नही कर सकता था। जिस पल मुझे गोलियां लगी थी, तो मैं समझ गया था कि अगर मैं जीवित रहा तो पूरी ज़िन्दगी लकवाग्रस्त हालत में बीतानी होगी। मेरी संघर्ष करने कि इच्छाशक्ति मुझे प्रेरणा देती है। सहानुभूति की भीख मांगना बेकार है। मेरा मानना है पहले लायक बनो तब कोई ख्वाब देखो।”


राज़दान आज भले हे व्हील चेयर पर हों, लेकिन वह अपने 90 से 95 फीसदी काम स्वयं करते हैं। उनकी दिनचर्या सुबह 6 बजे से शुरू होती है। उन्होंने अपनी कार में कुछ ज़रूरी बदलाव करके इसे अपने लिए बना दिया है। व्यायाम उनकी दिनचर्या का अहम हिस्सा है। वे रोज़ाना राजपूताना राइफल्स रेंज जाते हैं और शूटिंग पिस्तौल से नियमित रूप से अभ्यास करते हैं। और तो और वे किसी भी पोज़िशन में बैठ कर निशाना लगाने में सक्षम हैं।

दिव्यांग होने के बावजूद भी राज़दान की उपयोगिता कम नहीं हुई। उनकी काबिलियत और कौशल को परखते हुए सेना ने उन्हे असिस्टेंट चीफ ऑफ द इंटेग्रेटेड डिफेन्स स्टाफ (आइडीएस) पद दिया। आइडीएस का कार्य आतंकवाद से निपटने में अहम रणनीति बनाना है।

अपने पिता के नक्शे कदम पर चलते हुए राज़दान के बड़े बेटे ईशान (22) वायु सेना में हैं। हालांकि, उनके छोटे बेटे पार्थ (19) सेना में नहीं हैं, लेकिन वह भी लोगों की जान बचाने के लिए तत्पर हैं। वह एक मेडिकल छात्र हैं। राज़दान अपने बेटों पर गर्व करते हैं। वह कहते हैंः

“मुझे अपने बेटे के सेना में शामिल होने से कोई समस्या नहीं है। दूसरे क्या करते हैं, मुझे उनकी परवाह नहीं है। यह मेरा देश है और यह मेरी जिम्मेदारी है कि देश को सुरक्षित रखा जाए। अगर यह काम हम नही करेंगे, तो कौन करेगा? कोई विदेशी तो ऐसा करने नही आएगा।

भविष्य की योजनाओं के बारे में पूछे जाने पर राज़दान कहते हैं कि उनकी इच्छा है कि वह हेलीकॉप्टर से एक रस्सी के सहारे लटक कर राज्य का भ्रमण करें। और ऐसा वह किसी दिखावे के लिए नहीं करना चाहते, बल्कि उनकी मंशा है कि इससे युद्ध के समय सेना को मदद मिल सकती है। उन्होंने इस प्रयास के संबंध में लोगों से मदद भी मांगी। लेकिन प्रेम और उनके स्वास्थ की चिन्ता की वजह से लोगों ने उनका साथ नहीं दिया है। फिर भी राज़दान कहते हैं कि “मैं बस यह करना चाहता हूं।”

इस सैनिक की अमर भावना को मेरा कोटि-कोटि प्रणाम।

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