सियाचिन में हमारे जवानों के बारे में ये 15 बातें जान के आप भाव विभोर हो उठेंगे

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12:51 pm 1 Oct, 2015

सियाचिन दुनिया का सबसे ऊंचा युद्ध क्षेत्र है और सामरिक रूप से भारत के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह ऐसा युद्ध क्षेत्र है, जहां दुश्मनों की गोलीबारी से ज्यादा मौसम की मार से अधिक सैनिकों को खराब मौसम से जूझना होता है। हम यहां सियाचिन में भारतीय सेना के जवानों की जिन्दगी के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसके बारे में आपने शायद कल्पना में भी नहीं सोचा होगा।

5, 400 मीटर की (लदाख और कारगिल से दोगुनी) ऊंचाई पर स्थित समर के इस मैदान पर भारतीय सैनिकों को सिर्फ पाकिस्तानी सेना पर ही नजर नहीं रखनी होती, बल्कि अपनी शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्षमता की बदौलत ड्यूटी करनी होती है। यहां ड्यूटी बजाने वाले सैनिक आम नहीं होते, बल्कि सुपर सैनिक होते हैं।

1. सैनिकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यहां भीषण ठंड और बर्फबारी से बचने की होती है।

जी हां, सियाचिन में अगर आप खुले हाथ किसी लोहे (उदाहरण के तौर पर राइफल की ट्रिगर) को छूते हैं, तो यकीन मानिए सिर्फ 15 सेकेन्ड में ही आपके शरीर का यह हिस्सा सुन्न पड़ सकता है।

इस तरह की गलती भारी पड़ सकती है और यह इतना खतरनाक है कि आपको शरीर का यह हिस्सा गंवाना पड़ सकता है।

2. इन क्षेत्रों में पर्वतारोही तब चढ़ाई करने की कोशिश करते हैं, जब मौसम ठीक होता है, जबकि सैनिकों को यहां साल के 365 दिन ड्यूटी निभानी होती है।

आपकी जानकारी के लिए बता दें कि पांच हजार मीटर की ऊंचाई पर तापमान माइनस 60 डिग्री तक हो सकता है। ऑक्सीजन की बेहद कमी होती है। मैदानी इलाकों में मिलने वाली ऑक्सीजन की तुलना में यहां सिर्फ 10 फीसदी ऑक्सीजन उपलब्ध होता है।

मनुष्य का शरीर इस तरह के मौसम को झेलने के लिए नहीं बना है। लेकिन ये हमारे अदम्य साहसी जवान ही हैं, जो अपने आंखों की रोशनी जाने या शरीर के अंगों को खोने की परवाह किए बिना, सीमा की रक्षा करते हैं।

कुछ घंटे या कुछ नहीं, बल्कि प्रत्येक दिन। और इसकी वजह है कि यह धरती भारतीय गणराज्य की है और इसके रक्षा करने का दायित्व इन जांबाज लोगों के कंधों पर है।

3. 5400 मीटर की ऊंचाई पर मानव शरीर खुद को मौसम के अनुसार नहीं ढाल सकता। लंबे समय तक इतनी ऊंचाई पर रहने की वजह से आपका वजन कम हो सकता है।

आप खाना, पीना छोड़ सकते हैं। आपको नीन्द न आने की बीमारी हो सकती है। यही नहीं, आपकी याददाश्त भी जा सकती है। अब आप समझ गए होंगे कि सियाचिन में रहकर ड्यूटी करना कितना मुश्किल और तकलीफदेह है।

जी हां, यह बेहद मुश्किल है। लेकिन सिर्फ इसका हवाला देकर हम यहां से उतर कर नीचे नहीं आ सकते। ऐसे समय में जबकि पाकिस्तानी सेना के घुसपैठिए यहां घात लगाए बैठे हैं।

4. हालात इस कदर खराब होते हैं कि आप यहां ठीक से बोल नहीं सकते। यहां टूथपेस्ट भी जमकर बर्फ बन जाता है।

यहां टिकना इतना जटिल है कि आपको यहां रहने की तुलना में मैदानी इलाके में होने वाली भीषण गोलीबारी अच्छी लगने लगेगी। लेकिन हमारे सैनिकों ने इस चुनौती को स्वीकार किया है।

5. सियाचिन में बर्फीला तूफान करीब तीन सप्ताह तक रह सकता है।

बेहद कम समय में यहां हवा की रफ्तार 100 किलोमीटर प्रतिघंटा पकड़ सकती है। यही नहीं, तापमान कभी भी माइनस 60 डिग्री तक जा सकता है।

6. बर्फीले तूफान से मिलीट्री चौकी को बचाना एक चुनौती भरा काम होता है। कुछ ही देर की बर्फबारी में यहां करीब 40 फुट मोटी बर्फ जम सकती है।

जिस समय तूफान चल रहा होता है, सैनिक बेलचा लेकर बर्फ हटाने में जुटे होते हैं। जी हां, अगर वह ऐसा नहीं करेंगे तो जल्दी ही चौकी इतिहास में तब्दील हो सकता है।


7. सातवें वेतन आयोग में सैनिकों को उनके अदम्य साहस के लिए पारितोषिक की घोषणा की जा सकती है।

इस संबंध में वर्ष 2014 से चर्चा हो रही है।

8. इन बिपरीत परिस्थितियों में भी सैनिक मनोरंजन का साधन भी खोज लेते हैं।

क्रिकेट की ऊर्जा से उन्हें शरीर को गर्म रखने में भी मदद मिलती है।

9. यहां रहने वाले सैनिकों के नसीब में ताजा खाना नहीं होता।

यहां ठंड इतनी अधिक है कि सेब या संतरा पल भर में ही क्रिकेट की गेन्द जितना कठोर बन सकता है। यहां सैनिकों को डब्बा बंद खाना मिलता है।

10. इतनी ऊंचाई पर हालात इस कदर खराब होते हैं कि सेना के हेलिकॉप्टर नीचे नहीं उतर सकते, बल्कि राशन और दूसरे तरह की सप्लाई को आसमान से ही नीचे गिरा दिया जाता है।

सेना के पायलटों के पास सामान नीचे गिराने के लिए एक मिनट से भी कम समय होता है। यहां से कुछ मीटर की दूरी पर ही पाकिस्तानी सेना का कैम्प है, जिनसे भारतीय हेलिकॉप्टरों को खतरा होता है।

11. पिछले 30 सालों में सियाचिन में 846 भारतीय सैनिकों ने अपनी जानें गंवाई हैं।

जहां तक सियाचिन की बात है तो खराब मौसम की वजह से जान जोखिम में डालने वाले सैनिकों का इलाज युद्ध में घायल हुए वीरों के तौर पर होता है।

सिर्फ पिछले तीन सालों में सियाचिन में 50 भारतीय सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए हैं। सैनिकों के मौत के आंकड़ों की सूचना लोकसभा में रक्षामंत्री द्वारा दी गई थी।

सियाचिन में 15वीं राजपूत बटालियन के हवलदार गया प्रसाद का शरीर 18 साल बरामद किया जा सका था। गया प्रसाद इतने साल पहले तूफान में फंस गए थे।

12. देश के लिए सियाचिन में अपने जान की बाजी लगाने वाले भारतीय सैनिकों की याद में नुब्रा नदी के किनारे एक वार मेमोरियल का निर्माण किया गया है।

13. सियाचिन के आसपास के लोगों का कहना है कि यह स्थान इतना खतरनाक है कि सिर्फ दोस्त और दुश्मन ही साथ आ सकते हैं।

14. भारतीय सेना सियाचिन में सैनिकों की तैनाती पर पुरजोर नजर रखती है।

15. ये वे सैनिक हैं जो हमारे कल को सुरक्षित बनाने के लिए अपने आज की कुर्बानी दे रहे हैं।

भारत के इन बहादुर सपूतों को कोटि-कोटि प्रणाम। हम सदैव इनके ऋणी रहेंगे।

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