समय के साथ इस तरह बदल गया है भारतीय राष्ट्रीय ध्वज, आइए जानते हैं

11:50 am 19 May, 2016


भारतीय राष्ट्रीय ध्वज की रचना आजादी के प्रतीक के तौर पर हुई थी। प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू के अनुसार भारतीय ध्वज न केवल उनकी, बल्कि सम्पूर्ण भारतीयों की आज़ादी को दर्शाता है।

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज भारतीयों की आशाओं व अभिलाषाओं का प्रतिबिम्ब है। राष्ट्रीय गौरव को दर्शाता यह तिरंगा हमारा राष्ट्रीय खजाना है।

आधिकारिक कोड के अनुसार राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा है, जिसके सबसे ऊपर गहरा केसरिया रंग, बीच में सफ़ेद और सबसे नीचे हरा रंग है। तीनों रंग बराबर हिस्सों में बटे हुए हैं। सफेद रंग की पट्टी के बीचो-बीच, गहरे नीले रंग का चक्का बन हुआ है, जो धर्म चक्र को दर्शाता है। ध्वज की लम्बाई 2:3 के अनुपात में नापी जाती है।

ध्वज का महत्व

सर्वप्रथम केसरिया रंग देश की निर्भयता और ताक़त का चिन्ह है। बीच में आए सफ़ेद रंग का नाता शांति और सच्चाई से है। आखिर में आता हरा रंग देश के विकास का प्रतीक है। धर्म चक्र का डिजाइन सारनाथ लायन कैपिटल के अशोक चक्र से लिया गया है।

इसका डायमीटर सफेद पट्टी की चौड़ाई के बराबर है और इस चक्र में 24 तीलियां हैं। राष्ट्रीय ध्वज का डिजाइन संविधान सभा में पहली बार 22 जुलाई 1947 को मंज़ूर हुआ था।

भारतीय राष्ट्रीय ध्वज के घटनाक्रम

आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि राष्ट्रीय ध्वज में समय के साथ कई बदलाव देखने को मिले हैं। आजादी की लड़ाई के दौरान हमारा राष्ट्रीय ध्वज पहचान में आया। इसमें कोई दो राय नहीं कि राष्ट्रीय ध्वज हमारा सबसे अधिक सम्मानित चिह्न है। इसके निर्माण और इसे फहराने के लिए कड़े क़ानून बनाए गए हैं।

आधिकारिक निर्देशों के अनुसार ध्वज को खादी (कॉटन, ऊन और रेशम युक्त हाथों से काता गया, विशेष प्रकार का सूती कपड़ा) से बनाया जाना चाहिए।

वर्ष 1906 में ऐसा था राष्ट्रीय ध्वज

भारत का सर्वप्रथम राष्ट्रीय ध्वज 7 अगस्त 1906 को पारसी बगान स्क्वायर, कलकत्ता में फहराया गया था। तीन रंग की बराबर की पट्टियां हरी (सबसे ऊपर), पीला (बीच में) और लाल (आखिरी में) ध्वज पर थीं।

हरी पट्टी पर आधा खिला हुआ कमल का फूल था और लाल पट्टी पर दो चिन्ह बने थे। एक सूरज का और एक सितारे का। पीले पट्टी पर देवनागरी लिपि में ‘वन्दे मातरम’ लिखा हुआ था।

वर्ष 1907 में आया पहला बदलाव

दूसरा ध्वजारोहण मेडम कामा द्वारा परिसलोंग में कुछ निर्वासित क्रांतिकारियों की उपस्थिति में हुआ था। इस ध्वज में पिछले ध्वज से काफ़ी समानताएं थी, बस सर्वप्रथम पट्टे में सप्तऋषि को दर्शाने वाले आधे खिले कमलों की जगह 7 सितारे बने हुए थे।

इस ध्वज की प्रदर्शनी भी सोलिसत कॉन्फ्रेंस में हुई थी।


वर्ष 1917 में अनोखा मोड़

तीसरा ध्वजारोहण तब हुआ था जब राजनैतिक कलह ने एक अनोखा मोड़ ले लिया था। डॉ. एनी बेसेन्ट और लोकमान्य तिलक ने ये ध्वजारोहण होम रूल मूवमेंट के दौरान किया था। यह ध्वज एक के बाद एक पांच लाल और चार हरी पट्टियों को लगा कर बनाया गया था।

इस ध्वज में भी सप्तऋषि की जगह 7 सितारे बने हुए थे। ध्वज के ऊपरी बाएं किनारे में यूनियन जैक का चिन्ह बन हुआ था। दूसरे किनारे पर अर्धचन्द और एक सितारा बन हुआ था।

वर्ष 1921 में बड़ा बदलाव

पेंगली वेंकय्या ने गांधीजी के समक्ष, आल इंडिया कांग्रेस कमिटी के सत्र के दौरान एक ध्वज प्रदर्शित किया, जो बजवाड़ा में 1921 में संगठित किया गया था। यह ध्वज दो रंगों से बन हुआ था – एक हरा और दूसरा लाल। ये दो मुख्य धार्मिक समुदायों को दर्शाते थे। हिन्दू और मुसलमान।

गांधीजी ने बीच में सफ़ेद रंग के पट्टे को लाने का सुझाव दिया, जो बाकी धर्मो को भी प्रदर्शित करता। साथ ही उन्होंने बीच में चरखा लगाने का प्रस्ताव दिया, जो देश की प्रगति का चिह्न होता।

वर्ष 1931 का ऐतिहासिक फैसला

यह साल राष्ट्रीय ध्वज के इतिहास में ऐतिहासिक माना जाता है। वर्ष 1931 में यह प्रस्ताव पारित किया गया कि पिंगली डिजाइन पर आधारित भारत का राष्ट्रीय ध्वज तिरंगा होगा।

इस ध्वज में केसरिया, सफेद और हरे रंग के साथ गांधीजी का चरखा भी बीच में था।

वर्ष 1947 में लगाया धर्म चक्र

22 जुलाई को संविधान सभा ने तिरंगे को आज़ाद भारत का राष्ट्रीय ध्वज बना लिया। आजादी पाने के बाद ध्वज के तीनों रंग व उनके अर्थ तो वही रहे, लेकिन गांधीजी के चरखे को अशोक के धर्म चक्र से बदल दिया गया।

कुछ इस प्रकार तिरंगा ध्वज स्वतंत्र भारत का राष्ट्रीय ध्वज बन गया।

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