नेहरू ने आजाद हिन्द फौज के सैनिकों को नहीं दी थी भारतीय सेना में जगह, 17 और तथ्य

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1:45 pm 9 Apr, 2016

देश निकाला दिए गए क्रांतिकारियों द्वारा स्थापित भारतीय सरकार की अस्थायी सैन्य यूनिट को आजाद हिन्द फौज के नाम से जाना जाता था। इसकी स्थापना दूसरे विश्व युद्ध के दौरान जापानी साम्राज्य की मदद से सिंगापुर में हुई थी।

इस फौज के प्रेरणा स्रोत व संस्थापक सुभाष चंद्र बोस थे। वे भारत को दूसरे देशों की मदद से आज़ादी दिलाना चाहते थे।

नेताजी की आजाद हिन्द फौज इंडियन नेशनल आर्मी (INA) के नाम से भी जानी जाती थी। मूलतः इसकी स्थापना मोहन सिंह द्वारा सिंगापुर में की गई थी। यह फौज विश्वयुद्ध में भारतीय कैदियों को शामिल कर बनाई गई थी। वर्ष 1943 में बोस के नेतृत्व से इस फ़ौज में फिर से जान आ गई।

उनके नेतृत्व में मलेशिया व बर्मा के बहुत से रिहा युद्धबंदी और वहां के नागरिक इससे जुड़ गए। उन्होंने अंग्रेज़ों की सत्ता को उखाड़ फेंकने का प्रण लिया। यहां हम आजाद हिन्द फौज के बारे में 17 उन बातों का उल्लेख करने जा रहे हैं, जिनके बारे में आपको नहीं पता होगा।

1. आजाद हिन्द फौज दरअसल पहली इंडियन नेशनल आर्मी का दूसरा अवतार था।

पहली बार INA वर्ष 1942 में फरवरी से दिसंबर तक ही चली थी। जापान की नीयत और INA नेतृत्व के लक्ष्यों में मतभेद होने के कारण जापान ने इसकी बागडोर रास बिहारी घोष (INA के एक मुख्य संयोजक) से लेकर सुभाष चंद्र बोस को दे दी। बोस ने आजाद हिन्द फौज को अपनी अंतरिम सरकार ‘अर्जी-हुकूमत-ए-आजाद-हिन्द’ की सैन्य इकाई बना दिया।

गॉर्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण करते रास बिहारी घोषhindujagruti

2. फ़ौज ने आजाद हिन्द रेडियो की मदद से भारतीयों को इस स्वतंत्रता संग्राम के बारे में प्रेरित किया।

उस रेडियो पर अंग्रेज़ी, हिंदी, मराठी , बंगाली,पंजाबी, पोश्तु और उर्दू में ख़बर प्रसारित की जाती थीं। ये भाषाएं उस समय प्रवासी भारतीयों के बीच बोलचाल में काफी इस्तेमाल होती थी।

जर्मनी के सैनिकों के साथ नेताजीindiaopines

3. फौज के पूर्ण रूप से स्थापित होने के बाद उसमें 85,000 सैनिक थे।

इनमें से करीब 45,000 भारतीय थे।

4. अंग्रेजी सेना के जिन भारतीय सैनिकों ने आत्मसमर्पण कर दिया था, बोस उन्हें लेकर जापान के लिए रवाना हुए। 90 दिनों के बाद वे टोक्यो पहुंचे और वहां उन्हें 1943 में INA का लीडर बना दिया गया।

wikimedia नेताजी (आगे) जापानी सबमरीन के कर्मी दल के साथ।

5. अंग्रेज़ी हुकूमत पर पहले हमले के बाद ही जापान ने अंडमान व निकोबार INA के नाम कर दिया।

वहीं पर पहली बार नेताजी बोस ने तिरंगा फहराकर आजादी का आगाज किया था।

उनके राज में वे द्वीप शहीद और आजाद के नाम से जाने जाते थे।

6. बोस 1943 में सिंगापुर गए और युद्ध के क़ैदियों को प्रोत्साहित करते हुए, “तुम मुझे ख़ून दो, मैं तुम्हें आज़ादी दूंगा” का प्रसिद्ध नारा दिया।

सिंगापुर में ही उन्होंने रास बिहारी घोष के बाद INA का नेतृत्व संभाला था।

7. 1942 से 1945 तक प्रसिद्ध देशभक्ति गीत “क़दम क़दम बढ़ाए जा” उनकी फौज के क़दमताल का गीत था।

बोस के अनुसार राम सिंह ठाकुर का यह गाना सैनिकों में आत्मविश्वास का संचार करता था। यह गीत आज भी हमारे फौज के कदमताल का गीत है।

8. INA का जिम्मा संभालने के बाद अपने ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने सैनिकों को प्रोत्साहित करते हुए “दिल्ली चलो” का नारा दिया।

उन्होंने कहाः


“मित्रों दिल्ली चलो हमारा नारा होना चाहिए। मैं नहीं जानता कि हम में से कितने ज़िन्दा रहेंगे, पर जीत हमारी ही होगी। तो हथियार उठाओ और क्रांतिकारियों द्वारा बनाए हुए रास्ते पर चलकर दिल्ली पहुंचो। दिल्ली चलो।”

9. जापान की 1945 में विश्वयुद्ध में हार के कारण INA कभी दिल्ली नहीं पहुंच पाई।

पर इसके गठन ने अंग्रेजों को जोरदार चुनौती जरूर दी थी।

10. इतिहासकार मानते हैं कि INA तमाम विफलताओं के बावजूद, भारत की आज़ादी की लड़ाई के लिए एक प्रेरणा का स्रोत था।

भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में हुए कई बगावत इसी फ़ौज की प्रेरणा के कारण हुए थे। बम्बई की बगावत, उनमें से एक है।

11. उस दौरान पुरुष प्रधान समाज में भी INA में एक ऐसी लड़ाकू टुकड़ी थी, जिसमे सभी महिलाएं थी।

इसे “रानी झांझी रेजीमेंट” के नाम से जाना जाता था और लक्ष्मी सहगल उसकी कमान संभाल रही थीं।

नेताजी और सहगल महिला रेजीमेंट के साथprobashionline नेताजी और सहगल महिला रेजीमेंट के साथ

12. INA अंग्रेज़ों को परास्त करने वाली पहली स्थानीय भारतीय फ़ौज थी।

उन्होंने वर्ष 1944 में अंग्रेज़ों को बर्मा, कोहिमा और इम्फाल से बाहर निकाल दिया था।

13. पंडित नेहरू शुरू में INA के खिलाफ थे।

पर जब INA के अफ़सरों पर मामला चला, तब उन्होंने अपनी सोच बदलते हुए वक़ील बनकर उनका केस लड़ा। जिन अफ़सरों का कोर्ट मार्शल हुआ था, वे जनता के विरोध के कारण बच गए।

14. नेताजी के ग़ायब होने के बाद INA बिखर गई।

INA के अफसरों को सरेंडर करना पड़ा और उन्हें गोरे, काले व भूरे वर्गों में बांट दिया गया। इसका रंग से कोई लेना देना नहीं था। ‘गोरों’ से आशा थी कि वे अंग्रेज़ों के साथी बन जाएंगे, ‘भूरों’ पर कड़ी नजर रखी जा रही थी और एवं ‘काले’ भारत मां के सच्चे भक्त थे।

15. दुख की बात तो यह है कि नेहरू सरकार ने INA के एक भी सैनिक को आज़ाद भारत की फ़ौज में जगह नहीं दी।

जिन सैनिकों ने देश के लिए अपनी सभी सुख सुविधाएं त्याग दी और देश आज़ादी के लिए INA में शामिल हुए, देश ने उन्हें ही त्याग दिया।

16. विश्व युद्ध के बाद INA की कहानी इतना विवादित बना दी गई कि अंग्रेज़ों ने बीबीसी द्वारा INA पर बनाई गई एक डॉक्युमेंट्री फिल्म को प्रसारित करने पर भी रोक लगा दी।

17. महात्मा गांधी ने यह स्वीकार किया कि INA ने एक लक्ष्य हासिल करने के लिए सभी धर्मों को एक साथ जोड़कर बहुत बड़ा काम किया था।

22 मई 1946 को INA अफसरों को संबोधित करते हुए गांधी ने कहाः

“आपने हिन्दु, मुसलमान, पारसी, इसाई, सिखों और एंग्लो इंडियंस के बीच पूर्ण एकता बनाई है। यह कोई छोटा काम नहीं था।”

लंबे समय तक INA की यह कहानी हमें नहीं पढ़ाई गई, क्योंकि शायद हमारे नेता देश की आज़ादी का सारा श्रेय INA की जगह कांग्रेस को देना चाहते थे।

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