भारत निर्माण के नायक मजहरुल हक ने विदेशी कपड़ों को जला भारतीय कपड़ों को बनाया अपना परिधान

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6:00 pm 6 Sep, 2016


जब हम भारतीय नवजागरण में प्रवेश करते हैं, तो ऐसे जननायकों की लंबी कतार दिखती है, जिन्होंने आधुनिक भारत के निर्माण हेतु अपनी पूरी जिंदगी समर्पित कर दी। उन्हीं जननायकों में से एक हैं मौलाना मजहरुल हक।

देश की आज़ादी की लड़ाई में शामिल महान विभूतियों में से एक नाम मौलाना मज़हरुल हक का है जिन्हें हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक भी माना जाता है। साल 1866 में पटना के बहपुरा नामक गांव में जन्मे मौलाना के बलिदान आदर्शों से नई पीढ़ी को अवगत होना जरूरी है।

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एक अमीर जमींदार के घर पैदा होने वाले मौलाना ने अपनी प्राथमिक शिक्षा मौलवी सजाद हुसैन से घर पर ही ग्रहण की। जिसके बाद 1886 में मैट्रिक पास कर, लखनऊ में उच्च शिक्षा के लिए कैनिंग कॉलेज में दाखिला ले लिया। लेकिन उसी साल कानून की पढ़ाई करने के लिए वह इंग्लैंड चले गए। वहां से कानून की शिक्षा लेने के बाद वह वापस 1891 में अपने वतन लौटे और यहाँ पटना में वकालत की प्रैक्टिस शुरू कर दी।

उस वक़्त जब बड़ी संख्या में छात्र, सरकारी कॉलेज और स्कूल छोड़ गांधीजी के भारत को स्वतंत्र कराने के आंदोलन से जुड़ रहे थे, तब मौलाना ने पटना में एक स्थान खरीदकर छात्रों की शिक्षा जारी रखने में मदद करते हुए ‘सदाक़त आश्रम’ नाम से अस्थायी आवास की स्थापना की। जो बाद में जाकर अखिल भारतीय कांग्रेस का केंद्रीय कार्यालय बना।

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अखिल भारतीय कांग्रेस का केंद्रीय कार्यालय

गांधीजी के साथ लन्दन में पढ़ाई करते हुए ही मौलाना और महात्मा गांधी के बीच राजनीतिक नजदीकियां शुरू हुई थी।

1897 में सारण में अकाल के दौरान मौलाना ने राहत कार्य चलाया था, असहयोग और खिलाफत आन्दोलन में विशेष भूमिका अदा करने वाले मौलाना ने 1917 में हुए चंपारण सत्याग्रह में भी महात्मा गाँधी के साथ मिलकर ब्रिटिश हुकूमत की जंजीरों से आजादी पाने के उद्देश्य से अपनी आवाज बुलंद की थी।

सत्याग्रह आंदोलन में उनकी सक्रिय भूमिका को देखते हुए अंग्रेजों ने उन्हें तीन महीने के लिए कारावास में नजरबन्द कर दिया था।

मौलाना ने अपनी अध्यक्षता में बिहार में होम रूल आंदोलन का आयोजन भी किया। मौलाना ने 1921 में साप्ताहिक अंग्रेजी अखबार ‘द मदरलैंड’ शुरू किया। इस अखबार ने असहयोग आंदोलन में होने वाली सभी गतिविधियों को जन-जन तक पहुंचाने का काम किया।

जब असहयोग और खिलाफत आंदोलन की शुरुआत हुई तब मौलाना ने अपने कानूनी अभ्यास और इंपीरियल विधान परिषद के सदस्य के रूप में अपने निर्वाचित पद का त्याग करते हुए, भारत की आजादी की लड़ाई में वह अग्रसर हो गए।

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मौलाना ने 1919 में पश्चिमी पोशाक को जलाते हुए उसे न पहनने और सिर्फ परंपरागत पोशाक को धारण करने का निर्णय लिया।

मौलाना हिन्दू मुस्लिम एकता के दृढ़ पालक थे। उनका कहना था-

“चाहे हम हिन्दू हो या मुसलमान, हम एक ही कश्ती में सवार है, हमें एक साथ ही आगे बढ़ना होगा।”

जब मौलाना लन्दन में थे तब उन्होंने वहां अंजुमन इस्लामिया की स्थापना की, जो विभिन्न धर्म, क्षेत्र और संप्रदायों के भारतीयों को एक साथ लेकर आया। अंजुमन इस्लामिया में ही पहली बार मौलाना की मुलाकात गांधीजी से हुई थी।

बिहार के बहपुरा में जन्मे,  राजनीति  को अलविदा कह चुके मौलाना ने अंतिम सांस अपने आवासीय स्थान ‘आशियाना’ में ली।

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एक शख्स जिसने भारत को आजादी और उसके उज्जवल भविष्य के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया, उन्हें मुश्किल से ही वो दर्जा हासिल हुआ जिसके वह असल हकदार थे।

सांप्रदायिक सद्भाव को बढ़ावा देने के उद्देश्य से मौलाना ने बच्चों की शिक्षा के लिए एक ही परिसर में मदरसा और मिडिल स्कूल की शुरुआत करने के मकसद से अपने घर को दान कर दिया।

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