दास्तान 1965 के जंग की जब भारतीय सेना पाकिस्तानियों को खदेड़ते हुए लाहौर तक पहुंच गई थी

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4:09 pm 16 Jun, 2016


टॉपयॅप्स टीम का यह अथक प्रयास रहता है कि स्वस्थ खबरों के साथ भारत के उन पराक्रमी वीरों की अनसुनी गाथाएं आपसे साझा करें, जिन्हे इतिहास के पन्नों में कहीं भुला दिया गया है। आज इसी श्रृंखला में भारतीय सेना की 1965 के पाकिस्तान से युद्ध की वह महानतम शौर्य प्रस्तुत करने जा रहा हूं, जब भारत के वीर सपूतों ने पाकिस्तान के सीने लाहौर पर तिरंगा लहराकर बहादुरी की एक नई इबारत लिख दी थी।

अगर देखा जाए तो 1965 का भारत-पाक युद्ध दो पड़ोसी देशों के बीच एक ऐसी जंग थी, जहां पूरे विश्व के समकक्ष खुद के ताक़त का प्रदर्शन करना था। बेशक यह एक ऐसी जंग थी, जहां दोनों ही मुल्क अपने सशस्त्र बलों और हथियारों में इज़ाफ़ा कर एक दूसरे पर दबाव डालने का प्रयास कर रहे थे।

लेकिन भारत के लिए यह जंग उसके आत्मसम्मान से बढ़कर थी। कश्मीर, जो आज भी भारत के नक्शे पर ताज़ की तरह गौरवान्वित है, उसे पाकिस्तान के नापाक सपनों के लिए हरगिज़ कुर्बान नहीं किया जा सकता था। 

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भारत के लेफ्टिनेंट कर्नल हरि सिंह, भारतीय सेना द्वारा पाकिस्तानी पुलिस स्टेशन (बुर्की) लाहौर के बाहर। wikimedia

1965 भारत-पाक युद्ध की परिस्थितियां और वर्चस्व के लिए लड़ती सेनाएं

5 अगस्त 1965 को कश्मीर का सपना देखने वाली पाकिस्तानी सेना ने करीब 30 हजार सैनिकों के साथ कश्मीर के विभिन्न क्षेत्रों पर नियंत्रण रेखा पार करके धावा बोल दिया। इसका मुंह तोड़ जवाब देते हुए भारतीय सेना अगस्त के अंत तक तीन महत्वपूर्ण पहाड़ की चोटियों पर अपना क़ब्ज़ा ज़माने में सफल हो गई। हालांकि, पाकिस्तान ने भी कश्मीर के तीतवाल, उरी और पुंछ पर अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश की। पर भारतीय सेना पाकिस्तानियों को खदेड़ते हुए हाजी पीर दर्रा तक पहुंच गई, जो पाकिस्तानी सीमा से 8 किलोमीटर अंदर स्थित है।

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भारतीय सैनिक लाहौर जिले में कब्जा किए गये पाकिस्तानी पुलिस स्टेशन के बाहर wikimedia

1 सितंबर, 1965 को पाकिस्तान ने ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम के तहत एक नई चाल चली। इसका उद्देश्य था जम्मू के अखनूर पर क़ब्ज़ा करके कश्मीर से भारत का संचार ध्वस्त कर देना।

ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम के तहत पाकिस्तानी सेना ने कश्मीर और पंजाब के कुछ हिस्सों में भारी बमबारी की। इसका जवाब देते हुए भारतीय थल सेना और एयर फोर्स ने मिलकर ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम को नेस्तनाबूत कर दिया। भारतीय जांबाज पाकिस्तानी सेना को खदेड़ते हुए उसके सीमा में प्रवेश कर गए।

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पीछे लौटते पाकिस्तानी सेना के टैंक tribune


जब शान से लाहौर में लहराया तिरंगा

ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम के बुरी तरह से असफल होने के कारण पाकिस्तान की कमर टूट गई थी। इस असफलता में पाकिस्तान को भारी मात्रा में टैंको और सैनिकों का नुकसान झेलना पड़ा। वहीं, भारतीय सेना ने दुश्मनों को खदेड़ने के अभियान में लाहौर की तरफ मोर्चा खोल दिया।

5-6 सितंबर 1965 की रात को भारतीय सेना लाहौर के लिए तीन रास्तों से अमृतसर-लाहौर, खलरा-बुर्की-लाहौर और खेम करण-कसूर की तरफ से बढी। 10 सितंबर को बुर्की गांव जो लाहौर के दक्षिण-पश्चिम में स्थित है, भारत के कब्जे में आ गया। सीज़फायर की घोषणा तक भारतीय सेना अपना डेरा लाहौर के दरवाज़े बुर्की पर डाले रही और पाकिस्तान की सरज़मी पर तिरंगा लहरा कर अतुलनीय साहस का दम भरती रही।

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भारतीय सैनिकों द्वारा क़ब्ज़ा किए गये पाकिस्तानी हथियार blogspot

आपको बता दें कि इस युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान की करीब 1,900 किलोमीटर की ज़मीन पर अपना क़ब्ज़ा जमा लिया था। पाकिस्तान की हालत यह थी कि लाहौर शहर भारतीय सेना से घिरा हुआ था। यह शहर भारतीय टैंकों के निशाने पर था। इस युद्ध में करीब 3000 सैनिकों को मातृभूमि की रक्षा के लिए अपने प्राण गवाने पड़े थे और उनमें से 211 को वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।

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लाहौर सेक्टर में भारतीय ध्वज फहराने के बाद विजयी मुद्रा में भारतीय सेना indiatimes

बुर्की पर कब्जा करने में महत्वपूर्ण भूमिका वाले भारतीय सेना की 5वीं बटालियन को “बैटल ऑनर ऑफ बुर्की” और ‘थिएटर ऑनर ऑफ पंजाब’  से सम्मानित किया गया।

लाहौर के गेट माने जाने वाले बार्की पर शान से लहराता तिरंगा blogger

लाहौर के गेट माने जाने वाले बुर्की पर शान से लहराता तिरंगा
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यह दुर्लभ तस्वीर मेरी समझ से पाकिस्तानियों के दुस्साहस का सही जवाब है। शान से पाकिस्तान में लहराता तिरंगा उन सभी शहादत के लिए एक सच्ची श्रधांजलि है, जो अपनी मातृभूमि की रक्षा करते हुए शहीद हुए।

यह तस्वीर निश्चित तौर पर पाकिस्तानियों की नापाक जुर्रत को एहसास कराते हुए अपने समस्त पड़ोसी मुल्क से कहती होगी कि ‘अतिथि देवो भव:’ हमारे संस्कार में है, लेकिन अगर इस सत्कार को हमारी कमज़ोरी आंकी तो अपनी मातृभूमि के रक्षा के लिए तुम्हारे घर की नींव भी उखाड़ सकते हैंं।

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