ICSE इतिहास की पाठ्यपुस्तक में दी जा रही है गलत शिक्षा, स्वतंत्रता सेनानियों का ज़िक्र तक नहीं

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7:50 pm 26 Mar, 2016


जब पुस्तक ही तथ्यों को छुपा कर सत्य को झुठलाने का काम करे, तो किस पर भरोसा करेंगे? सोचिए अगर आपके बच्चे को यह न पता हो कि भगत सिंह कौन थे? या भारत का नाम हिन्दुस्तान कैसे पड़ा? तो आप किसे दोष देंगे- खुद को, स्कूल को या वहां पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों को?

मौजूदा हालात में यह खबर आपको परेशान कर सकती है। दरअसल, ICSE बोर्ड के स्कूल में पढ़ाए जाने वाले इतिहास की किताबों में न केवल तथ्यों के साथ छेड़छाड़ की गई है, बल्कि बच्चों के भविष्य के साथ भी जम कर खिलवाड़ हो रहा है।

आर्यों को लेकर इतनी दुविधा क्यों?

प्राचीन भारत के इतिहास की जानकारी के साधनों को दो भागों में बांटा जा सकता है। साहित्यिक साधन और पुरातात्विक साधन। इन साधनों के मुताबिक, आर्य भारतीयों के वैदिककालीन पूर्वजों को कहा जाता है। पर ICSE के किताब में जो उल्लेख है वह आपको असमंजस में डाल सकता है।

शिक्षा को लेकर तथ्यात्मक अशुद्धि?

इस पुस्तक के मुताबिक भारत के प्राचीन इतिहास में शिक्षा के लिए गुरुकुल व्यवस्था थी, जिसका लाभ सिर्फ उच्च वर्ग के लोगों को मिलता था। इसमें कहा गया है कि उस काल में शूद्र अशिक्षित होते थे। तब प्रश्न यह आता है कि क्या बिना शिक्षा-ज्ञान के ही सूरदास, वाल्मीकि और वेद व्यास ने महान ग्रंथों की रचना कर दी थी?

हिन्दू धर्म का अस्तित्व गुप्त काल से पहले नहीं था, क्या आप यकीन कर सकेंगे?

ICSE पुस्तक के अनुसार, हिन्दू 319 ईसवी से पहले भारत में मौजूद नहीं थे।

हिन्दू शब्द का उल्लेख इस पुस्तक में मात्र तीन बार हुआ है। क्या भारत में हिन्दुओं का इतिहास इतना ही संक्षिप्त है?

इस पुस्तक में इतिहास के बारे में जानकारी कम, ईसाई धर्म का गुणगान अधिक किया गया है।

इस्लामिक आक्रमण से पहले भारतीय इतिहास के 500 साल की अवधि को मात्र दो पन्नों में समेट दिया गया है। क्या उस दौरान भारत में कुछ हुआ ही नहीं? शायद यही बताना चाहते हों?

अरब के इस्लामिक हमले को सांस्कृतिक आदान-प्रदान के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है। इसमें कहा गया है कि संस्कृत के पुस्तकों का अरबी में अनुवाद किया गया। लेकिन सच्चाई तो यह है कि इस्लामिक हमलावरों ने न केवल भारत में जी भर कर लूटपाट की, बल्कि यहां की संस्कृति और पुस्तकों को नष्ट किया।

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पुस्तक के अनुसार दिल्ली सल्तनत के इस्लामी शासक उदार और दयालु थे। जबकि सच्चाई यह है कि दिल्ली सल्तनत के मुस्लिम शासक बेहद क्रूर थे। कुतुबुद्दीन ऐबक ने 27 जैन-हिन्दू मन्दिरों को नष्ट करने के बाद कुतुब मीनार का निर्माण करवाया था।

 

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इस किताब के मुताबिक, बाबर ने धार्मिक सहिष्णुता को बढ़ावा दिया। फिर मंदिरों का ध्वंश करवाकर मस्जिद किसने बनवाए? यह बढ़िया मजाक है।

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जाति व्यवस्था को पुस्तक में ऐसे चित्रित किया गया है, जैसे भारतीय समाज में यही एक बुराई थी। और तो और विभिन्न काल के संतों और धर्मगुरुओं ने इनकी आलोचना की। क्या वाकई ऐसा था?

शक्तिशाली जाट, राजपूत और सिख साम्राज्य इतिहास के बारे में चन्द लाइनें लिखी गई हैं।

और तो और, देखिए कैसे भारतीय पुनर्जागरण के अग्रदूतों को अपमानित किया गया है।

क्या आपका बच्चा स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में जानता हैं?

और जब पूरा देश नेताजी सुभाष चंद्र बोस के बारे में बात कर रहा है, हमारे स्कूल के छात्रों के लिए शायद इतनी जानकारी काफ़ी होगी? आपको क्या लगता है?

इस बेतुके इतिहास पाठ्यपुस्तक की रचयिता हैं, रोमिला थापर। पुस्तक के प्रथम पन्ने पर इनका परिचय महान इतिहासकार के रूप में दिया गया है। उनकी इस अद्भुत रचना को समझने के बाद आप कुछ कहना चाहेंगे? मेरे पास तो शब्द नहीं हैं।

 

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