इस भुतहा किले में रात को रुकना मना है; द्वारा आदेश, राज्य सरकार

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5:56 pm 25 Nov, 2015

16वीं सदी में आमेर के राजा भगवंत दास बड़े अरमान और शानो-शौकत से एक किला बनवाया था। बाद में इसका विकास करवाया था, उन्हीं के वंशज माधो सिंह ने।

अब हालत यह है कि इस किले में कोई रहना पसन्द नहीं करता। पसन्द की बात तो दूर, यहां रहने से लोग डरते हैं। जी हां, इस किले को भुतहा किला माना जाता है।

राजस्थान के अलवर जिले में स्थित भानगढ़ के किले के बारे में कहा जाता है कि यहां भूतों का डेरा है। यही वजह है कि एक समय में खूबसूरती की मिसाल रहा यह किला अब धीरे-धीरे खंडहर के रूप में तब्दील होता जा रहा है।

फिलहाल भारत सरकार इस किले की देख-रेख करती है। किले के चारों तरफ आर्कियोंलाजिकल सर्वे आफ इंडिया (एएसआई) की टीम मौजूद रहती हैं।

एएसआई ने सख्‍त हिदायत दे रखा है कि सूर्यास्‍त के बाद इस इलाके कोई भी बाहरी व्यक्त न रुके।


स्थानीय लोग कहते हैं कि यह किला शापित है। यहां प्रचलित एक दन्तकथा के मुताबिक, भानगढ बालूनाथ योगी ने राजा भगवंत दास के वंशजों को इसी शर्त पर किला बनाने की अनुमति दी थी कि किले की परछाई कभी उनकी तपस्या स्थल पर न पड़े। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।

योगी की इस बात पर ध्यान देते हुए किले पर निर्माण कार्य जारी रखा गया। और इस तरह एक दिन किले की परछाई बालूनाथ योगी की तपस्या स्थली पर पड़ गई। इस वजह से योगी ने भानगढ़ को श्राप देकर ध्वस्त कर दिया। किला भले ही खंडहर में बदल गया हो, लेकिन बालूनाथ योगी की समाधि अब भी यहां मौजूद है।

माना जाता है कि 16वीं सदी में भानगढ़ किला का निर्माण शुरू हुआ था और इसे 17वीं सदी तक माधो सिंह के कार्यकाल में इसे पूरी तरह बना लिया गया।

राजा माधो सिंह उस समय अकबर के सेना में जनरल के पद पर तैनात थे। उस समय भानगढ़ की जनसंख्‍या तकरीबन 10,000 थी।

चारो तरफ से पहाड़ों से घिरे इस किले में बेहतरीन शिल्‍पकलाओ का प्रयोग किया गया है। इसके अलावा इस किले में भगवान शिव, हनुमान आदि के बेहतरीन और अति प्राचीन मंदिर विद्यमान है।

इस किले में कुल पांच द्वार हैं और साथ-साथ एक मुख्‍य दीवार है। इसको निर्माण में मजबूत पत्‍थरों का प्रयोग किया गया है, जो अति प्राचीन काल से यथास्थिति में पड़े हुए हैं।

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