भारतीय सेना के इस जवान की अदम्य वीरता के आगे सम्मान से झुक जाएगा आपका सिर

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4:48 pm 22 Aug, 2016

इस साल शांतिकाल के सर्वोच्च वीरता पुरस्कार अशोक चक्र (मरणोपरांत) से सम्मानित शहीद हांगपान दादा, वीरता के उस लहराते परचम का नाम है, जिनकी शख्सियत का लोहा युगों-युगांतर तक अटल रहेगा।

मौसम खराब था, चारो तरफ धुंध, जहां तक नजर जाती कई फुट सिर्फ और सिर्फ बर्फ और ऊंचाई समुद्रतल से करीब 12 हजार फुट। फिर भी वह अपनी जान की परवाह किए बगैर साथियों के साथ डटे रहे। उन्होंने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए आतंकियों से लड़ते हुए सर्वोच्च बलिदान दे दिया।

28 मई, 2016 को  कश्मीर के लाइन ऑफ कंट्रोल के पास तैनात हांगपान दादा ने शमसाबरी रेंज में 12000 फुट की ऊंचाई वाले इलाके में पीओके की तरफ से घुसपैठ की कोशिश कर रहे चार भारी हथियारों से लैस आतंकियों से लोहा लिया।

चौकस सेना के जवानों को आतंकियों की खबर मिली और हांगपान दादा की अगुआई में जवानों ने उन्हें घेर लिया।

अपनी टीम का नेतृत्व कर रहे दादा ने गोलीबारी में घायल होने के बावजूद मोर्चा नही छोड़ा और और अपनी आखिरी सांस तक मैदान-ए-जंग पर दुश्मनों की नापाक मंशा को नेस्तनाबूत करते रहे। उनके साथियों ने बताया कि हांगपान दादा ने तीन आतंकियों को ढेर कर दिया था, लेकिन चौथे को मारते वक्त उन्हें गोलियां लग गई।


37 वर्षीय अरूणाचल प्रदेश के रहने वाले हंगपन दादा 35 राष्ट्रीय राइफल्स में तैनात थे और साथियों के बीच ‘दादा’ नाम से मशहूर थे। यह बल अभी आतंकवाद विरोधी अभियानों में हिस्सा लेता है।

वह अपने पीछे परिवार में पत्नी चासेन लवांग, 10 साल की बेटी रौखिन और 6 साल के बेटे को छोड़ गए।

सेना का यह हवलदार अपनी मर्जी से आतंकवादियों के खिलाफ लड़ने के लिए गया था। उन्होंने करीब दस घंटे से अधिक समय तक आतंकियों से डटकर मुकाबला किया। आतंकियों की ओर से भारी गोलीबारी के बीच, अपने टीम के सदस्यों की जान बचाते हुए वह इस दुनिया को अलविदा कह गए।

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