गणपति बप्पा के साथ क्यों जुड़ा है ‘मोरया’, इसके पीछे है भक्‍त और भगवान की अलौकिक कहानी

3:42 pm 9 Oct, 2016


‘गणपति बप्पा मोरया, मंगलमूर्ति मोरया’। भगवान गणेश का हर भक्त यह जयकार करते हुए उनकी भक्ति में लीन हो जाता है। लेकिन क्या आप गणपति बप्पा को ‘मोरया’ कहे जाने के पीछे की कहानी जानते है?

यह कहानी है एक ऐसे परम भक्‍त और भगवान की, जहां भक्‍त की भक्ति और आस्था के कारण भक्त के साथ हमेशा के लिए जुड़ गया भगवान का नाम।

भगवान के इस नाम की जड़ें महारष्ट्र से जुड़ी है। महाराष्ट्र के पुणे से 21 किमी दूर बसे चिंचवाड़ गांव में 15वीं शताब्दी में मोरया गोस्वामी नामक एक संत हुआ करते थे, जिनकी भक्ति और आस्था में ऐसी ताकत थी कि उनका नाम गणपति बप्पा से जुड़ गया। माना जाता है कि भगवान गणेश के असीम आशीर्वाद से मोरया का जन्म हुआ था। उनके माता-पिता गणेश के परम भक्त थे, वह भी अपने माता-पिता की तरह गणेश की भक्ति में लीन रहते थे।

प्रत्येक वर्ष मोरया, गणेश चतुर्थी के दिन चिंचवाड़ से पैदल चलकर 95 किलोमीटर दूर मयूरेश्वर मंदिर में गणेश की पूजा करने के लिए जाया करता थे। यह सिलसिला उनके बचपन से लेकर 117 साल तक चलता रहा।

दंतकथाओं में कहा जाता है कि बढ़ती उम्र के चलते वह मंदिर जाने में असमर्थ होने लगे और एक दिन खुद भगवान गणेश ने उन्हें दर्शन दिए और कहा कि गणेश की एक मूर्ति मोरया को नदी से मिलेगी। उसके बाद मोरया उस नदी के स्थान पर गए और जो स्वप्न में आकर गणेश ने कहा था, ठीक वैसा ही हुआ। उन्हें भगवान गणेश की एक प्रतिमा नदी से मिली।

उस मूर्ति को लेकर वह चिंचवाड़ आ गए और इसी स्थान पर उसकी स्थापना कर दी। धीरे-धीरे चिंचवाड़ मंदिर की लोकप्रियता दूर-दूर तक विख्यात हो गई। आज पुणे शहर से 15 किलोमीटर दूर बसा चिंचवाड़ गांव मोरया गोसावी के नाम से मशहूर है।

कहते हैं कि जब मोरया गोसावी की आस्था की चर्चा उस दौर के पेशवाओं तक पहुंची, तो वे भी इस मंदिर की चौखट पर अपना माथा टेकने चले आए। इस मंदिर में प्रवेश करते ही आपको कण-कण में भगवान गणेश की छाप दिखेगी।

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इस घटना के बाद चिंचवाड़ मंदिर में सुबह-शाम भक्तों की कतार लगी रहती। लोग मानने लगे कि अगर बप्पा का सबसे बड़ा कोई भक्त है तो वह हैं मोरया। यहां आने वाले भक्त गणपति बप्पा के दर्शन करने आने के साथ ही विनायक के सबसे बड़े भक्त मोरया का आशीर्वाद लेने भी आते थे। भक्तों के लिए गणपति और मोरया अब एक ही हो गए थे।

कहते हैं जब भक्त मोरया के पैर छूकर ‘मोरया’ कहते थे तब संत मोरया अपने भक्तों से मंगलमूर्ति कहते थे, ऐसे शुरुआत हुई ‘मंगलमूर्ति मोरया’ की।

Morya

यह मोरया की गणपति बप्पा के प्रति गहन सिद्धि ही थी कि उनका नाम भगवान गणेश से जोड़े जाने लगा। जिस जयकारे की शुरुआत पुणे के पास चिंचवाड़ गांव से हुई, अब वह हर भक्त की जुबान पर है।

मोरया गोसावी मंदिर में आने वाले भक्तों की आस्था है कि यहां आने वाले हर भक्त की मनोकामना पूर्ण होती है। भक्त कहते हैं कि गणपति बप्पा ने संत मोरया को वरदान दिया था कि अनंतकाल तक मोरया का नाम गणपति के साथ जुड़ा रहेगा। यही कारण है कि लोग गणपति के साथ मोरया का नाम जोड़कर जयकारा लगाते हैं।

क्या आम और क्या खास, मोरया गोसावी मंदिर में हर भक्त की आस्था है। तभी तो हर साल बड़ी संख्या में देशभर से श्रद्धालु गणपति बप्पा से मनवांछित फल की पूर्ति की कामना लिए यहां आते हैं।

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